Wednesday, January 6, 2021

विचार विन्यास

विचार विन्यास 

       नववर्ष की प्रथम सप्ताह में ‌भोजनोपरांत गुनगुनी धूप में  जुगाली करते यह विचार अक्समात जे़हन में कौंधा कि नववर्ष की स्वर्णिम किरणें  कोरोना से  मुक्ति के पट खोल रहें हैं यह अभिनंदनीय हैं। पहले दिन से ही रोज नई -नई वैक्सीन और उनके माक ड्रील/  ट्रायल का खबर से समाचार गुलज़ार हो रहे हैं। नित नये सकरात्मक समाचार से आमजन में तो नही कह सकते पर अपने में आत्मविश्वास व आत्मबल भी तेजी से बढ़ने लगा है ।हालाँकि अन्नदाता  किसान आन्दोलित हैं ,उन्हे तारिख उपर तारिख मिल रहे हैं। किसान होने के कारण थोड़ी नैराश्य भाव है कि कब इनके दिन बहुरेन्गे ? क्योंकि आजादी के बाद बेचारे अब भी अपनी उत्पाद की कीमत लगाने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं पा सके है।
       बहरहाल बात  एक विचार के जे़हन में कौधने से आरंभ हुआ और वह बात -चित में कही ओझल होने को तत्पर हैं। अनगिनत विचार आते हैं और युं ही चले जाते हैं। कुछ व्यक्त होते हैं कुछ अभिव्यक्त  ,कुछ दफ्न हो जाते हैं। कुछ तो मनो -मतिष्क को  मथते रहते हैं।
    यह विचार व्यक्त नहीं हो पा रहा है न दफ़्न ! अपितु मथे जा रहे हैं  कि अब कोरोना काल के बाद आर्थिक विकास की दर क्या होगी?  धर्म -अध्यात्म का क्या हाल- चाल रहेगा ?  इनके आड़ में दान दक्षिणा से  पलने वाले वर्ग का क्या होगा ?  हमारे करुणा के स्त्रोत तलाशने व उद्गारने वाले कवि  लेखक कलाकार  उनका सार्वजनिक प्रदर्शन तथा उनसे उनकी रोजी- रोजगार  कैसे पटरी पर आएन्गे? और तो और हमारी शिक्षा पर्यटन तीर्थ मेले का क्या होगा ?  सरकारी कर्मचारी तो अपने बिना महंगाई भत्ते इंक्रीमेंट व एरियर वाली  वेतन में जी खा रहे  है।पर नीजि जगत में मंदी के चलते रोजगार विहिन लोग और इन उद्योगों में खप रहे मजदूर जो अपने गांव चले चले वे कब लौटेन्गे ? लाकडाउन में थमे जन जीवन गतिमान कैसे होन्गे ?
       सच कहे यह वर्ष संताप का रहा  बीस वाकिय में मानवता के लिए विष सदृश्य हो गये थे। सही प्रबंधन और व्यवस्थाओं के चलते  हालाँकि उबरे पर लोमहर्षक मंजर रोगटे खडे होने वाला भी रहा । जातिय व धार्मिक उपद्रव भी छिटपुट रहा है। राजनैतिक उठा पटक और रस्साकशी अपेक्षाकृत कमतर रहा पर शह मात का गेम बदस्तूर चल ही रहा है। 
    आम जन जीवन ठहरा सा हैं और उनमें हलचल जारी हैं। बहुत कुछ नई धारणाओं का  विकास हुआ है। खान -पान, रहन -सहन में तेजी से  बदलाव आया और लोगों में लापरवाही या बेफिक्री कम हुई हैं।
   एक बात स्पष्टतः दृढ़ हुई कि जीना महत्वपूर्ण है कैसे जीए यह महत्वपूर्ण नहीं हैं। फलस्वरुप फैशन और दिखावे की जगह अब स्वस्थ जीवन शैली विकसित होने लगा है। सेहत की चिन्ता अब सर्वोपरि हो गये हैं। शिक्षा आन लाइन होकर व्यक्तिक हो गये । सरकारी नौकरियां ही अब प्रथम प्राथमिकता नहीं रहा न मेरिट बल्कि इल्म हुनर और स्वरोजगार व नीजि संस्थान की ओर आकर्षण बढने लगा है हालाँकि यह प्रक्रिया एक दशक से जारी है पर कोरोना काल ने इसे बहुत अच्छी तरह प्रतिस्थापित किया है। 
     रचनाधर्मी लोग बाहर नहीं तो अपने मोबाईल के माध्यम से कक्ष के भीतर और चलते फिरते धुमते सक्रिय हो गये हैं। मोबाईल इस दारुण समय में पथ प्रदर्शक की ही तरह नहीं अपितु अभिन्न मित्र की तरह लोगों के जीवन में स्थान बना लिए हैं। इनके द्वारा वे हर तरह से अपडेट हो रहे हैं। और सतर्क भी।
     विचारों का  विन्यास इसी तरह फैलती जाती हैं भले उनपर अमल हो न हो ।मानव मन विचारों के अजायबघर हैं जहाँ मूर्त -अमूर्त  विचार सागर की  लहरों के मानिंद उठते हैं। झझकोरते हैं अशांत उद्विग्न होकर  उद्वेलित  करते हैं तो यदा कदा  शांत धीर गंभीर भी करते हैं । संतुष्ट असंतुष्ट भाव भी विचार प्रवाह में किसी कश्ती के मानिंद हिचकोलें खाते हैं।
   बहरहाल जो विचार कौंधा वह यह है कि "  अच्छे दिन आएन्गे या युं ही संधर्ष चलता रहेगा । संधर्ष से हार -जीत  मिलती हैं। पर सभी जीत से सुख शांति समृद्धि  मिले यह नहीं कह सकते ।अशोक कलिंग जीत कर अशांत हो गये ! और शांति के लिए सत्य या  बुद्ध के मार्ग का अनुशरण किया। उसी तरह कोरोना को जीत कर क्या व्यक्ति  सुखी होन्गे? हमें ऐसा नहीं लगता हां संकट से राहत जरुर मिलेगी । शांति तो उन्हे  प्राकृतस्थ जीवन यापन करने या सत्य या बुद्ध के मार्ग का अनुशरण से ही संभाव्य हैं। दावा नहीं ।अत एव   यह यक्ष प्रश्न  अनुत्तरित बचा रहेगा। 
     कुछ बचा रहता हैं तभी चक्र चलता हैं।  यह समय चक्र ऐसा ही हैं। उत्थान- पतन ,हार -जीत और  पाना- खोना यह नियति हैं। यह स्वभाविक भी इसलिए निरंतर श्रमण अवस्था में गतिमान रहे हमारी यात्रा गुफा कंदरा से  सैंधव काल की भव्यतम जीवन स्तर से अब पांच सितारा लाईफ तक आ चुके हैं। मैट्रोपोलिश सिटिज़ में सेवन स्टार कल्चर डेवलप हो चुके हैं। अनंत भोग और उनके अनंत आनंद के  पारावर  छलक रहे हैं।  बावजूद एक अतृप्त मन व्याकूल क्यो और किसलिए  हैं? 
           बहिर्यात्रा और अन्तर्यात्रा भी जारी हैं अनगिनत पथिक चल रहे हैं। एक ऐसी मंजिल की ओर जहाँ कुछ भी नहीं हैं। शुन्य गगन बीच बासा हो जहाँ सतनाम प्रकाशा हो कह कर हमारे संतों गुरुओं ने मार्ग निर्दिष्ट किया पर सवाल यह है कि वे लोग भी वहाँ पहुँच सकें ? वे बताए चेताए इसलिये बड़े बुजुर्ग की तरह अपनत्व भाव लिए पूज्यनीय हैं। उन्हे मिथकीय पात्र न बनावें। ताकि उनकी अमृतवाणी सागर मंथन में अमृत की मानिंद सुर- असुर की  झप्पटे और महामोहिनी की नर्तन आदाओं वाली बंटवारे में कही छलक या गिर न जाय ... फिर जुटते रहना तलाशने !  संगमों  के इर्द-गिर्द उन्मत्त । 
        भीड़ मन को रंजित करता हैं । पर भीड़ संक्रमित करने के कारण अब जमवाड़ा को विसर्जित करने होन्गे क्योंकि मनोरंजन से अधिक महत्वपूर्ण जीवन हैं। जीवन के मनोरंजन हेतु  नये विकल्प तलाशने होन्गे  सार्वजनिक सभा जुलुश यात्रा आदि अब सुखद नहीं दुखद और संकटग्रस्त हैं। यह देर सबेर सबको समझना ही होगा। क्योंकि केवल एक कोरोना नहीं है इनके पीछे  उनके अनेक कुनबा हैं । अति सर्वत्र वर्ज्येत या मध्यम मार्ग ही संत का सच्चा मार्ग हैं। यही सतपंथ हैं। सस्टनेलेबल डेवलपमेंट  कहे या संतुलित विकास या जीयो और जीने दो कह ले। हमे वर्चस्व वादी मनोविकार पर प्रभावी नियंत्रण करना ही होना यही असली वैक्सीन है जो दुनियां को केवल  बचाएगी ही नहीं बल्कि और भी खूबसूरत करेगी। 
             हमारी छत्तीसगढ़ी में एक हाना है "एक से एक्काइ हो" एक्काइस मतलब इक्कीस मतलब "एक आगर एक कोरी" इसका अर्थ हैं बरकत/ उन्नति होना ।हमसबके जीवन में  आशा की न ई किरण लाए सबकी उन्नति हो इनके  लिए मंगलकारी  मंगलकामनाओं के साथ नव वर्ष इक्कीस की  मंगलमय बधाई ।
   जय जय ...वंदे भारत !

डॉ॰ अनिल भतपहरी 
9617777514

Saturday, January 2, 2021

कलेचुप

#anilbhatpahari
।।कलेचुप ।।
जुड़जुड़हा जाड़ मं 
सुरुज उथे कलेचुप 
झुंझकुरहा झांकय 
झुंझकुर ले कलेचुप
ओढ़े कथरी खावय घी 
तापय रोनिया कलेचुप 
चुप सरिख सुख नहीं 
बतावय बुदुक कलेचुप
जतन के राखबे मया ल 
तोर अंतस म कलेचुप  
अल्हन जाड़ मं हाथ-गोड़
सकेले पहावय बेरा कलेचुप
     -डाॅ. अनिल भतपहरी

Friday, January 1, 2021

नव वर्ष की मंगलकामनाएं

मंगलकामनाएंं...

प्रात: नवल प्रभात 
आशा की किरण  
सी हुई प्रस्फुटित
महाव्याधि की हनक
अविश्वास की तमस  
वैक्सीन और विश्वास 
से मन मयुर मुदित  
वाणी हुए निःसृत
बीस तो  विष हुए 
इक्कीस हो अमृत 
सितम और संताप 
हो जेहन  से विस्मृत 
मंगलकामनाएं धरा हो 
सत्य प्रेम करुणा से संवृत  

       -डाॅ. अनिल भतपहरी

            ३१-१२-२०२१ शाम ६ .३० बजे

चाह

आपके वास्ते छकड़ी हमरी 

     ।।चाह ।।
नव वर्ष में नव उत्साह 
जगे जे़हन में नव चाह 
मिटें  क्लेश सब स्याह
संवेदनाओं का हो दाह 
एक -दूसरे पर हो  चाह 
सुगम-सरल हो सब राह

 बिंदास कहें डाॅ. अनिल भतपहरी

Monday, December 28, 2020

भंडारपुरी गुरुद्वारा का जीर्णोद्धार

#anilbtapahari 

।।सतनाम पंथ का विश्व प्रसिद्ध मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी ।।

    इस भव्य स्मारक को गुरुघासीदास मंदिर के नाम से भी  जाने जाते हैं। इसे जीर्णोद्धार / नव निर्माण के नाम पर  तीन दशक पूर्व ढहा दिए गये हैं। वहाँ केवल ढाचा मात्र है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि  पुरी एक पीढ़ी इस गौरवशाली दृश्यांकन व दृष्टान्त से वंचित हैं । जब देश भर में महत्वपूर्ण स्मारकों का जीर्णोद्धार व अनेक नव आस्था के नवनिर्माण जारी हैं। तब इसके लिए 
 कुछ भी पहल या हलचल न होना बेहद चिन्तनीय हैं।  
    देश भर के लाखों- करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र इस ऐतिहासिक ईमारत कब अपनी पूर्व स्वरुप में स्थापित होगा? इसका उत्तर संभवतः किसी के पास नहीं हैं। 
               ज्ञात हो कि इसका निर्माण १८२०-३० के बीच गुरुघासीदास के निर्देशन में राजा गुरुबालकदास ने एक दृष्टान्त के रुप में करवाया था ताकि इनके अवलोकन मात्र से सतनाम धर्म संस्कृति की जानकारी जन साधारण को हो सके।  यहाँ से ही पुरे छत्तीसगढ़ और उनके बाहर सतनाम पंथ का प्रचार -प्रसार हुआ। देश के कोने -कोने से श्रद्धालु यहाँ आते और मत्था टेक कर अपनी धार्मिक भावनाओं का इजहार करते थे ।अनुपम ज्ञान प्राप्त कर कृतार्थ होते थे। दूर से दर्शन मात्र से गुरु उपदेशना का भावबोध होता था।  शिखर के चारों कोने पर तीन बंदर और गरजते हुए शेर का शिल्पांकन से युक्त  चौखंडा महल का नीचे भाग तलघर था। संपूर्ण प्रखंड वास्तु व  काष्ठ कला की अनुपम कारीगरी रही हैं । यह मानव जीवन के चारो अवस्था का शानदार व्याख्या था।पुरातत्त्व की दृष्टिकोण से अतिशय महत्वपूर्ण इस ईमारत का राजनैतिक उठापटक ,शासन -प्रशासन की अनदेखी और उचित  प्रबंधन के अभाव में यह जमींदोज हो गया जो कि  अत्यन्त दयनीय व दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति हैं। 
           छत्तीसगढ़ी संस्कृति की अस्मिता और ‌पुरे विश्व के मानव समाज को मानवता का संदेश देने वाली इस भव्य ऐतिहासिक  ईमारत की हुबहु प्रतिरुप में निर्माण अत्यावश्यक है।   
                इस पावन कार्य हेतु  गुरुदर्शन मेला  मे लाखों दर्शनार्थियों की उपस्थिति में प्रबंधन मंडल की ओर से उचित व सार्थक पहल करते हुए नव निर्माण की घोषणा होनी चाहिए।  खास तौर पर अनेक सामाजिक व धार्मिक संगठन है जो सतनाम धर्म संस्कृति के पैरोकार समझते हैं उन्हे चाहिए कि केवल जनप्रतिनिधी एंव गुरुवंशज ही उनके लिए उत्तरदायी नहीं है बल्कि उनके साथ साथ जन समर्थन व सहयोग  कैसे एकजुट हो ? इन पर गंभीरतापूर्वक चिंतन मनन व सकरात्मक  कार्य करें।
         जय सतनाम 
               
          -डाॅ. अनिल भतपहरी / 9617777514

Wednesday, December 16, 2020

काव्य प्रयोजन

मंय काबर लिखथंव ?

लिखत पढ़त मंहु हर आनमन कस अपन काव्य प्रयोजन ल फरिया के 2007 के मोर किताब के छपवा तको डरे रहेंव -

अर्थ नहीं धर्म नहीं 
आत्म प्रशंसा मेरी
नज़र में व्यर्थ सही
जो सच है उसे ढूंढने 
और कहने आया हूँ  
सोये रहोगे कब तक 
तुम्हें जगाने आया हूँ

‌फेर अब जाके पता चलिस 

कोनो जागय त 
झन  जागय 
फेर अपन ल 
जगाय के जुगत सेती 
लिखथंव -पढथंव
ताकि मय  सोय  
झन भुलाव रहंव...

Friday, December 11, 2020

गुरुबालकदास और वीर नारायन सिंह

छत्तीसगढ़ की अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतीक   बालसखा द्वय - "वीर नारायन सिंह एंव राजा गुरु बालकदास" 

        म. प्र. के समय छत्तीसगढ़ राजनैतिक शक्ति के केन्द्र थे। पर विकास के नाम पर शोषित रहा है। सच कहें तो यह  उपनिवेश परिक्षेत्र जैसा ही रहा है। 
   90 विधायकों वाली यह क्षेत्र( अब राज्य )और उनके नेतृत्व बेहद प्रभावशाली रहा है। फलस्वरुप यहाँ से प्रथम सहित  अधिकांश  मुख्यमंत्री बने। क्योंकि अनु जाति /जनजाति के एकमुश्त ४० से ऊपर  विधायकों का समवेत समर्थन मिलता रहा। जो शेष म प्र के नेताओं के ऊपर भारी पड़ता था। उसका प्रत्यक्ष लाभ मिला ।पर दीप तले अंधेरा के भांति यह अंचल विकास से कोसों दूर रहे खासकर सांस्कृतिक पहचान भी शैन शैन छीण होते चले गये। पाठ्यक्रमों में भी यहाँ की इतिहास कला व सांस्कृतिक प्रतिमानों को स्थान नहीं मिला फलस्वरुप यहाँ की बौद्धिक संपदा भाषाई विकास  भी अपेक्षाकृत गौण होने लगा ।
             बावजूद यहाँ के समकालीन स्थानीय  नेतृत्व अनु जाति /जनजाति के नायकों को प्रतिष्ठित करने में कभी रुची नहीं लिए न इन वर्गों को गंभीरतापूर्वक लिए।
फलस्वरुप छत्तीसगढ़ से बाहर  म प्र का जो नेतृत्व हुआ वे जरुर दोनो समुदाय के नायकों को प्रतिष्ठित कर इन समुदाय को मुख्यधारा में लाने का उत्कृष्ट  कार्य किया।
       आजादी के बाद लगभग 40 सालों से उपेक्षित व जमींदोंज करने पर तुले  दो महानायक गुरुघासीदास और वीर नारायन सिंह को 80 के दशक में विध्यांचल परिक्षेत्र के  मुख्यमंत्री  कुंवर अर्जुन सिंह और उनके विश्वस्त इन वर्गों  मंत्रीमंडल के सदस्य  झुमुकलाल भेडिया -अरविंद नेताम  विजय गुरु ,बंशीलाल धृतलहरे और अजीत जोगी    जैसे लोगों के  अथक प्रयास से छत्तीसगढ़ की धरा में दोनो महामानव को सही सम्मान प्राप्त हो सका ।  उच्च स्तरीय नेता गण 18 दिसंबर जयंती में व्यस्त रहते और दूसरे दिन 19 दिसंबर को वीर नारायण सिंह के कार्यक्रम रहते। इस तरह दो दिवसीय  भव्यतम आयोजनों से एक वातावरण बना। इसी आयोजनों से  पृथक छत्तीसगढ़ की बातें होना आरम्भ हुआ।
    विश्वविद्यालय बांध जैसे बड़ी  प्रतिष्ठानों का नामकरण, जयंती पर  सार्वजनिक  अवकाश  और सामाजिक धार्मिक कार्यों में सहभागिता के कारण सही अर्थों में छत्तीसगढ़ी पना का अहसास जनमानस में गहराई से पनपा।
    पृथक छत्तीसगढ़ आन्दोलन के पृष्ठभूमि में भी गुरुघासीदास अभिमंत्रित वीर नारायन सिंह व राजा गुरु बालकदास के प्रदेय आन्दोलन और शहादत ही प्रमुख कारक रहें हैं। 
             इनके साथ साथ राजिम माता , कबीर पंथी धर्मदास पुत्र  चुरामणी नाम साहब , माता कर्मा , गुण्डाधुर , पं सुन्दरलाल शर्मा ,गुरुअगमदास , खुबचंद बघेल मिनीमाता मंत्री नकूल ढीढी , कंगलामांझी , प्रवीणचंद भंजदेव जैसे ऐतिहासिक महापुरुष हुए जो छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान व अस्मिता प्रतिष्ठित करने के प्रेरणा पुंज रहे हैं। वर्तमान में तेजी से विकसित समृद्धशाली छत्तीसगढ़ अप‌ने इ‌न सपूतों को पाकर  सदैव धन्य रहेन्गे।    
                जय छत्तीसगढ़