Thursday, October 25, 2018

ये जीना भी ..

ये जीना भी...
  
शरद पूर्णिमा के कारण आज रतजगा हुआ।वैसे भी पूनम की चांद हमें बचपन से सोने नही देती ।
तस्मई सोंहारी चीला से महकते घर -आंगन , चंद्रमा की दूधियां रंग ऊपर से विविध भारती की छाया गीत अब तो मोबाईल से रात्रि ११ बजे के बाद एफ एम से मधुर फिल्मी गीत सुनते छत पर टहलते रहना एक अपूर्व आनंद व खुशियां मन में भरते रहा है।
गांव में  पिता जी जब बांसुरी से स्वर लहरी बिखेरते तो  हम हारमोनियम से उसे  छूने की प्रयास में‌ गुनगुनाने लगते  चिटिक अंजोरी निरमल छंइहा गली गली बगराए वो पुन्नी चंदा ..या  तुके मारे रे नैना की धुन छिड़ते तो बिधुन हो जाते यब  लगता  कि समय ठहर सा गया है ... गांव के वृहत्त  आंगन  मे सरग उतर रहे है ।
       पर इन दिनों शहर  की बजबजाती नालियों का दूर्गंध मक्खी के आकार का  काले मच्छड़ों की तीखे डंक का आतंक ,आवारा कुत्तों की भौंकते रहने साथ ही घर- घर पल रहे श्वनों की समवेत स्वर से जीना हराम सा हो गये है।भले मनोरंजन सुख -सुविधाओं से लैश है पर हम जैसों प्रकृति प्रेमियों के लिए बड़ा ही क्लेश है।
       सारे सुकून प्रदान वाले कारक शैन: शैन: छरित होने लगे है ।ऐसा लगता है कि सुविधाएं ही सकंट उत्पन्न करा रहे है ।और प्रकृत्स्थ जीवन जो रहा अब दिवास्वप्न सा हो गये है....
क्या अब मोबाइल रखकर भी नो कनेक्टीविटी जोन में रहने  चले जाय   टी वी रेडियों समाचार पत्रों से दूरिया बना ले  .... गांव के लीम चौरा में बैठे फिर वही ददरिया झड़काए ... जब देखेंव पुन्नी के चंदा रतिहा मय उसनिंधा ....
      मन के बात मन म रहिगे प्रात: ६ बजे  मोबाइल में भरे अलार्म बज उठे ... यंत्रवत उठे ब्रश में शेनम पेष्ट लगाए और छत पर चढ़ गये ... गुनगुनाती धूप में धूमते तभी देखते है कि सामने ही  कालोनी के दो पडोसी महिलाएं पालतू  कुत्ते की बीट के कारण लड़ रही है ।और पीछे दो पुरुष कार पासिंग के लिए तू तू मैं मैं हो रहे है। बच्चे वजनी बस्ता थामें कुछ चबाते -खाते चौक में खड़ी स्कूल बस की ओर भाग रहे है। कीचन से जीरा प्याज के छौंक का गंध आने लगे ... तो तंद्रा टूटा । स्नान करने लपका ...बिना स्वाद जाने समझे हलक से तीन रोटियां सब्जी गरमागरम गोंजे और पानी पीते कपड़े  पहिन दांत में बढ़ते  सेंससीविटी के कारण बिन दो लौंग में मुंह मे व कंधे मे  बैकपैंक डाल  यंत्रवत रात्रि ८ बजे तक लौटने के लिए निकल लिए ..स्वयं से ये कहते कि ये जीना ..भी कोई जीना है लल्लू !
   - डा. अनिल भतपहरी

Wednesday, October 24, 2018

सतनामी हिन्दू ही था

सतनामी तो हिन्दू ही है।
     महंत नयन दास महिलांग के कृषि संस्कृति के अभिन्न अंग पशुधन के संरछण हेतु चलाए गये  गोवध आन्दोलन से सतनामियों में नेतृत्व छमता का विकास हुआ।
     फलस्वरुप तत्कालीन( १९२०-३०) कांग्रेस नेतृत्व  सतनामियों आजादी के आन्दोलन मे सम्मलित करने एंव मुख्यधारा मे लाने ७२ संत महंतो को गुरु अगम दास के नेतृत्व मे सम्मानित किए ।
       इस तरह सतनामियों का भारतीय राजनीति मे पदार्पण हुआ।
      जनेऊ करण का  कथित उच्च जातियों (ब्राह्मणों और कथित सवर्णों)   के एकाधिकार को सतनामियों ने ही अपनी जीवटता व सात्विक खान पान रहन सहन से तोड़ा यह भी कम बात नही!
बहुत सी बातें है और युगीन प्रवाह मे सामूहिक नेतृत्व व विशाल काय समाज का संचालन वह भी अलग अलग संस्कृति व मान्यताओं मे विभक्त है उनमें सामंजस्य बिठाए रखना बड़ी चुनौति है।
      आज हम अपने ही घर परिवार को एक नही रख पाते ।ऐसी विषम  परिस्थितियों  मे गुरु घासीदास सतनाम जैतखाम  पालो और गुरु वंशज गिरौदपुरी तेलासी भंडार खडुआ बोडसरा बाराडेरा हमें परस्पर जोडकर रखे हुए है।
      भले हम सब विभिन्न राजनैतिक पार्टियों मतो विचारों और खेमों मे बटे है ।और यह सब होना स्वभाविक है।फिर भी गुरुघासीबाबा   सतनाम  जैतखाम और गिरौद भंडार के नाम पर सभी परिछेत्र के सतनामी एक है।और वे सब मिलकर सतनाम पंथ को धर्म के रुप में प्रतिष्ठापित कराने अपने स्तर पर लगे हुए है।
   मंजिल एक है उसे अर्जित करने के तरीके अलग अलग है। मतभेद है और रहेन्गे पर मनभेद नही हो बस इनका ध्यान रखे। संयम भाषा शैली और परस्पर एक दूसरे को सम्मान दे तब सभी एकमेव होन्गे ।
गुरु घासीदास १७५६-१८५० का कालखंड ले तो महज १६८-७० वर्ष हो रहे है।
   गुरुघासीदास के समकालीन हम सबके पूर्वज रहे है। भंडारपुरी के समीप हमारे ग्राम जुनवानी है और हमारे पूर्वज ऊंजियार बबा जिनके दादा पडदादा के पास चंदखुरी व सिरपुर परिछेत्र मे ३+२ = ५ गांव गोटीडीह  बरछा जुनवानी  उजितपुर सिरपुर  थे जो बौद्ध कालीन शुरवीर भट्ट प्रहरी राज वंशीय लोग थे । जिनके घर द्वार कपाट दरवाजे मे बेहतरीन नक्क्शिया है पत्थर के तराशे हुए २-३ तल्ला हवेली और किलानुमा घरद्वार रहे गुरुघासीदास के  समकालीन रहे है।तेलासी जुनवानी अमसेना डुम्हा कोड़ापार भैसमुंडी सतनामी बाहुल्य साधन सछम लोगों के गांव है।और इन्ही गांव के लोग जो परस्पर रिश्तेदारी मे आबद्ध सुमत सुन्ता मे रहे ने गुरु को जो यहां गिरौदपुरी से निर्वासित होकर आये थे को  यहां बसाए ।उनकी सदप्रवृत्तियो की कहानियां और गुरुवंशजों गुरुओ की प्रदेय के सब साछी है।उन जनश्रुतियों का लेखन हुआ है जो वर्तमान में सतनाम साहित्य के नाम से जाने समझे जाते है। बाहरहाल लेखन एक सतत प्रक्रिया है ।और वह चलता रहेगा।बेहतर से बेहतर चीजे आते ही रहेन्गे .... हम सब और भी अधिक उन्नत और प्रभावशाली बने तथा मिलजुल कर रहे । तथा सतत अध्ययन  अन्वेषण वृत्ति अपनाए  ....
किसी भी धर्म कर्म के आंतरिक बुराई से जो लोग सबसे अधिक उत्पीडित होते है वही उनमें आमूल चूल परिवर्तन की बाते करते है।जन जागरण या आन्दोलन आदि करते है। गुरुघासीदास हिन्दू ही थे  इसलिए जगन्नाथ गये ... मस्जिद स्तुप गिरिजाघर नही गये बल्कि शाक्त मत के देवी मंदिरों की बलिप्रथा रोके .... सत्संग प्रवचन रामत रावटी से सतनाम जागरण चलाए और धर्म कर्म से बहिष्कृत जनो और स्वेच्छा से शरणागत लोगो को नाम पान देकर सतनामी बनाए।
   समकालीन समय राजतंत्र का था और धार्मिक बुराई चरमोत्कर्ष थे।राजतंत्र के विरुद्ध एक अकेला लड़ नही सकते फलस्वरुप धार्मिक बुराई के विरुद्ध जनजागरण चलाए .... और जब लोग उन नव दर्शन से प्रेरित हुए तो अनुयाई बनते गये।इस तरह छत्तीसगढ के सर जमी पर धार्मिक क्रांति एक महान  दार्शनिक तपस्वी व समर्थ गुरु द्वारा हुआ। लोग श्रद्धा व आस्था से जुड़ने लगे....समर्पित अनुयाईयों की बढ़ती संख्या और प्रभाव देते उनके पुत्र को राजा बनाए गांव समर्पित किए ।
   फलस्वरुप उन वैभव से समाज मे स्वाभिमान भी आए।
   
  
    सतनाम

योग की तुरि साधना से तुरतुरिया

आध्यात्मिक साधना एंव योग सिद्धी मे" तुरि" अवस्था को अर्जित करने सुरम्य व एकांत वन प्रांतर अत्यंत उपयुक्त स्थल माने गये है।
      इसलिए मध्य भारत में बौद्धमहानगरी सिरपुर के समीप तुरतुरिया नामक जगह में बौद्ध साधक तुरि साधना में लीन रहा करते थे।
    यह सुखद संजोग है कि सतनाम धर्म संस्कृति में भी साधना और समाधि की संस्कृति प्रचलन में अब भी है।
एक  सतनाम साखी जो पंथी  मंगलभजन के पूर्व गाए जाते है  और वे छत्तीसगढ़ी में है उनमें ध्यान की इस तुरि अवस्था का जिक्र है -
लछ्य कोस म  गुरु बसे, सुरता दिहव पठाय।
  ग्यान तुरि असवार है,  छिन आवय पल जाय ।।
                 विद्जन भावार्थ ग्रहण करे एंव सतनाम पंथ और बौद्ध धम्म में सहजयान की साधना पद्धति की साम्यता को समझे और आत्मसात करे।
गिरौदपुरी  तुरतुरिया व सिरपुर एक ही परिछेत्र में महज २५-३० कि मी दायरे मे अवस्थित है ।
                    ।‌।सतनाम ।।
चित्र - तुरतुरिया में स्थित बुद्ध व भिछुणियों की प्रतिमाएं जो यत्र तत्र बिखरे है में से कुछ  झोपड़ियों में शोभायमान‌ है।

योग साधना में‌ तुरि अवस्था

आध्यात्मिक साधना एंव योग सिद्धी मे" तुरि" अवस्था को अर्जित करने सुरम्य व एकांत वन प्रांतर अत्यंत उपयुक्त स्थल माने गये है।
      इसलिए मध्य भारत में बौद्धमहानगरी सिरपुर के समीप तुरतुरिया नामक जगह में बौद्ध साधक तुरि साधना में लीन रहा करते थे।
    यह सुखद संजोग है कि सतनाम धर्म संस्कृति में भी साधना और समाधि की संस्कृति प्रचलन में अब भी है।
एक  सतनाम साखी जो पंथी  मंगलभजन के पूर्व गाए जाते है  और वे छत्तीसगढ़ी में है उनमें ध्यान की इस तुरि अवस्था का जिक्र है -
लछ्य कोस म  गुरु बसे, सुरता दिहव पठाय।
  ग्यान तुरि असवार है,  छिन आवय पल जाय ।।
                 विद्जन भावार्थ ग्रहण करे एंव सतनाम पंथ और बौद्ध की सहज यान की साधना पद्धति की साम्यता को समझे और आत्मसात करे।
गिरौदपुरी  तुरतुरिया व सिरपुर एक ही परिछेत्र में महज २५-३० कि मी दायरे मे अवस्थित है ।
                    ।‌।सतनाम ।।
चित्र - तुरतुरिया में स्थित बुद्ध व भिछुणियों की प्रतिमाएं जो यत्र तत्र बिखरे है में से कुछ  झोपड़ियों में शोभायमान‌ है।

सुंगध

"सुगंध "
रोज की तरह सुबह की सैर से लौटते नुक्कड़ की सब्जीवाली से ताजी भाजी लेकर घर आने का क्रम चल ही रहा था कि आज घर की दरवाजे पर एक दूसरी सब्जीवाली को भाजी की गठ्ठर सर पर रखी हुई  देखा।
  श्रीमती अंदर से  रुपये देने आई तब तक वे  पहुंच गये और पुछने लगे - क्या ले ली ? पत्नी प्रश्न का उत्तर प्रश्न मे देती कही -
आप क्या लाए ?
"लाल भाजी "
कित्ती जुरी ?
२० की  ११
अच्छा रोज लूटाते हो और ऊपर से एक कि मी बोझ लादे लाते हो।
ये देखो २० की १३
आज से वहां से भाजी लाना बंद।ये बाई रोज लाएगी
वह भी बदल- बदल कर ।
"लाल पालक चौलाई और हां तुम्हारे फेवरेट चेंच भी"एक सांस मे कह गई ।उधर अधेड़ भांजी वाली मुंह मे हंसी दबाई चली गई ये कहते "कालीअतकेच बेर चौलाई लानहू"
   बहुत दिनों बाद खाली हाथ पीछे गली से आए।और जो सम वयस्क भाजीवाली से नेह जुड सा गये थे वह एकाएक टूट गये।
    यह अनुक्रम दो चार दिन चला कि नींद ७ बजे खुलने लगी। धूप चढ़ने और अखबार देख सैर की इच्छा खत्म होने लगे ।तब से छत पर ही थोड़ी बहुत टहलना होने लगा ।अब पहले जैसे उमंग उत्साह भी कमतर होने लगा।
भाजी वाली  की आमदरफ्त से मैडम खुश है ।दूधवाले ,पेपरवाले  लांड्री वाली व कामवाली के बाद और एक नियमित सेवादार के बढ़ जाने उनकी रौब-दाब में बढोत्तरी होने लगे ।भले महगांई व  बाड़ी में लगे पंप की बिल जादा आने लगे कह नई भाजी वाली  कुछ दिन बाद  २० की १० और अब तो ८ जुड़ी देने लगी है।
    अचानक नुक्कड़ की पुरानी भाजी वाली को अपने गली मे फेरी देते देख  छत से उतरने लगे.!तब तक गेट खोल कर पत्नी पुछने लगी क्या भाव?वो बोली बीस के बारा !कम्पीटेसन बहुत हवे औने पौने तको दे ल परथे । एक से सेक चारी-चुगरी म गिराहिक टोरे -जोरे के उदीम चलथे..वो बाजार की तरीका बताने लगी मैडम उनकी बातें सुन मन ही मन "लपहरी "कह भाजी  की क्वालिटी को पंसद कर छाटने लगी।साहब को नीचे सीढी उतरते देख मुस्काती भाजी वाली धनिया की एक जुरी पुरौनी दे गई..नीविया की डियों सेधनियां की सुगंध का अहसास हुआ! आज आफिस की काम काज में दूनी उमंग-उत्साह आने लगा!
     सच कहे तो सडयंत्र और उनके चपेट कम जादा जितना हो किसी को बर्दाश्त नहीं पर पापी पेट का सवाल है ।हर कोई काम- धंधे ,रोजी -रोटी पाने में इनका किंचित उपयोग करते है जो दस्तुर सा तो हो गये है पर इनमें विश्वास और नेह की छौंक ऐसी चीज है जिनकी चमक कभी फीकी  नही पड़ती न धाटे की सौदा होते है।
          डां - अनिल भतपहरी
               9617777514

सुगंध

"सुगंध "
रोज की तरह सुबह की सैर से लौटते नुक्कड़ की सब्जीवाली से ताजी भाजी लेकर घर आने का क्रम चल ही रहा था कि आज घर की दरवाजे पर एक दूसरी सब्जीवाली को भाजी की गठ्ठर सर पर रखी हुई  देखा।
  श्रीमती अंदर से  रुपये देने आई तब तक वे  पहुंच गये और पुछने लगे - क्या ले ली ? पत्नी प्रश्न का उत्तर प्रश्न मे देती कही -
आप क्या लाए ?
"लाल भाजी "
कित्ती जुरी ?
२० की  ११
अच्छा रोज लूटाते हो और ऊपर से एक कि मी बोझ लादे लाते हो।
ये देखो २० की १३
आज से वहां से भाजी लाना बंद।ये बाई रोज लाएगी
वह भी बदल- बदल कर ।
"लाल पालक चौलाई और हां तुम्हारे फेवरेट चेंच भी"एक सांस मे कह गई ।उधर अधेड़ भांजी वाली मुंह मे हंसी दबाई चली गई ये कहते "कालीअतकेच बेर चौलाई लानहू"
   बहुत दिनों बाद खाली हाथ पीछे गली से आए।और जो सम वयस्क भाजीवाली से नेह जुड सा गये थे वह एकाएक टूट गये।
    यह अनुक्रम दो चार दिन चला कि नींद ७ बजे खुलने लगी। धूप चढ़ने और अखबार देख सैर की इच्छा खत्म होने लगे ।तब से छत पर ही थोड़ी बहुत टहलना होने लगा ।अब पहले जैसे उमंग उत्साह भी कमतर होने लगा।
भाजी वाली  की आमदरफ्त से मैडम खुश है ।दूधवाले ,पेपरवाले  लांड्री वाली व कामवाली के बाद और एक नियमित सेवादार के बढ़ जाने उनकी रौब-दाब में बढोत्तरी हुई ।भले महगांई व बाड़ी में लगे पंप की बिल जादा आने लगे कह नई भाजी वाली  कुछ दिन बाद २० की १० और अब तो ८ जुड़ी देने लगी है।
    अचानक नुक्कड़ की पुरानी भाजी वाली को अपने गली मे फेरी देते देख  छत से उतरने लगे.!तब तक गेट खोल कर पत्नी पुछने लगी क्या भाव?वो बोली बीस के बारा !कम्पीटेसन बहुत हवे औने पौने तको दे ल परथे । एक से सेक चारी-चुगरी म गिराहिक टोरे -जोरे के उदीम चलथे..वो बाजार की तरीका बताने लगी मैडम उनकी बातें सुन मन ही मन "लपहरी "कह भाजी  की क्वालिटी को पंसद कर छाटने लगी।साहब को नीचे सीढी उतरते देख मुस्काती भाजी वाली धनिया की एक जुरी पुरौनी दे गई..नीविया की डियों सेधनियां की सुगंध का अहसास हुआ! आज आफिस की काम काज में दूनी उमंग-उत्साह आने लगा!
     सच कहे तो सडयंत्र और उनके चपेट कम जादा जितना हो किसी को बर्दाश्त नहीं पर पापी पेट का सवाल है ।हर कोई काम- धंधे ,रोजी -रोटी पाने में इनका किंचित उपयोग करते तो है पर इनमें विश्वास और नेह की छौंक ऐसी चीज है जिनकी चमक कभी फीकी नही पड़ती न सौदा धाटे की होते है।
          डां - अनिल भतपहरी
               9617777514

Tuesday, October 23, 2018

"जोगनदी "

जोगनदी पलाशिनी
अमृत जल वाहिनी
है बहु व्याधि हरिणी
मन की विकार नाशिनी
इनकी तट पर पावन तपोभूमि
गिरौदपुरी सत्घाम है विराजती
धन्य वन प्रांतर हुआ महिमामय
घासीगुरु के तपबल से गरिमामय
लाखो नर- नारी कर स्नान
अर्जित करते  पुण्य कर आचमन
प्रकृति से पल भर होते मिलाप
मिटते दु:ख सब क्लेश संताप
जीवन प्रवाह में द्वीप सा कठोर भार
विगलित करते सत्संग जड़ता विकार
जल मध्ये प्रकृतस्थ हस्ति प्रतिमा
मन मैगल प्रछालित चमके चंद्र पूर्णिमा
यहां केवल मेल मिलाप नही
हाट बाजार व्रत उपवास नही
होते यहां सभी जन सत साधक
बनकर आते वे सबके लायक
संत सेवक अरु सत्यानुरागी
संकल्पित मन में बनु सतगामी
पंगत संगत का अनुठा महा पर्व
तट पर सम्पन्न अनुष्ठान यह सर्व
भरते हृदय में उमंग अरु उत्साह
पावन सतनाम सरित प्रवाह
गाकर जस प्रफूल्लित हुआ अनिल
सुर मे ताल मिलाकर हर्षित इनकी सलिल ...
    -डा. अनिल भतपहरी