गुरु घासीदास की वाणी ही इसका मूल समाधान है -
मनखे मनखे एक - दान नहीं, समानता चाहिए
इस महादेश का सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, अकर्मण्यता को सम्मान मिल जाना है। यदि यह सम्मान परिश्रम ईमानदारी, गुणी सदाचारी को सम्मान मिलने लग जाय तो लम्पट और ऐय्यास अमीरों की सम्मान विरासत से मिले दौलत और उनके नशे से जकड़ा सामंतवाद का खात्मा हो जाय।
यह नहीं होने और देश में घोर पूंजीवादी सामंती व्यवस्था के कारण ही ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की आबादी के तीन चार गुणा बड़ी आबादी गैर बराबरी व्यवस्था के अधीन होकर दान-दक्षिणा के भरोसे मुफ्तखोरी जी रहे हैं। देश के विकास में उनकी कोई भागीदारी नहीं। परिश्रमी समुदाय को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं, और साधन-सक्षम लोग अजगर करे न चाकरी वाला अधूरा दोहा ओढ़कर सबका दाता राम कहकर अकर्मण्य बैठे हैं।
इस भ्रम को सबसे पहले काटा था देश के प्रथम जाति-वर्ण विहीन मानव समुदाय सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास ने।
उनकी पहली दिव्योक्ति है - **"मनखे मनखे एक समान"**। इस एक वाक्य में वसुधैव कुटुम्बकम् से लेकर समस्त मानव प्रजाति को समानता से देखने की नैतिक सीख है। जब सब मनखे एक हैं तो कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं, कोई दाता बनकर अहंकार करे और कोई याचक बनकर खुद को छोटा समझे, यह व्यवस्था ही अधर्म है।
इसीलिए उनकी दूसरी अमृतवाणी मन को मथ देती है - **"दान के देवैया पापी, दान के लवैया पापी"**। गुरु ने कहा, दान को पुण्य से मत जोड़ो। क्योंकि पुण्य कमाने के लोभ में लोग अनैतिक ढंग से धन जुटाकर दाता बनने के दर्प में जीते हैं, और जो याचक है वह उन्हें अन्नदाता, मालिक, स्वामी कहने लगता है। यहीं से गैर-बराबरी पैदा होती है। दान-दक्षिणा वृत्ति समानता के पथ का सबसे बड़ा रोड़ा है। हमारी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि कोई याचक ही न रहे, तो दाता बनने की जरूरत ही न पड़े।
और समाधान क्या दिया गुरु ने? मंदिर-मूर्ति-गुरुद्वारा के प्रदर्शन से हटकर सार्वजनिक कल्याण का मार्ग -
"मंदिर मूर्ति गुरुद्वारा झन बना, तोला बनाएच बर हवय कुआँ तरिया बना, सराय पाठशाला दवाखाना बना, ये जिनगी कठिन ओला सरल बना।"
मतलब साफ है। अगर बनाना ही है तो ऐसी चीज बनाओ जो किसी की व्यक्तिगत संपत्ति न हो। अस्पताल, स्कूल, सराय, तालाब, कुआँ, सड़क। गुरु ने कहा इसे बरार से बनाओ। जिसके पास धन है वह चंदा या बरार दे, जिसके पास धन नहीं वह श्रमदान करे। तब वह निर्माण सबका होगा और सबकी भागीदारी होगी।
यही कसौटी आज के परमार्थ पर भी लागू होती है।
एक परमार्थ वह है जो बरार और श्रमदान से स्कूल अस्पताल चलाता है, वह इस देश की आत्मा है, उसका सम्मान अक्षुण्ण रहना चाहिए।
दूसरा वह दिखावे का परमार्थ है जहां बड़े आश्रम, संस्थान और धार्मिक स्थल काले धन को पचाने-खपाने का केंद्र बने हैं, शासकीय अनुदान और बेशकीमती जमीनों पर कब्जा भी है, और भीतर चमत्कार के नाम पर ढोंग और परलोक सुधारने के नाम पर डर बेचा जाता है। यही वह जगह है जहां धर्म-कर्म और सनातन जैसे पवित्र शब्दों को ढाल बनाकर भावनात्मक शोषण होता है।
और सबसे बड़ा पाखंड यह है कि यही मुफ्तखोरी का उपभोग करने वाला, ईश्वर-खुदा-गॉड-सद्गुरु के नाम पर छप्पन भोग उड़ाने वाला और शातिर ढंग से सम्माननीय बना बैठा वर्ग, वंचित तबके को मिल रहे आरक्षण का सबसे तीव्र विरोधी भी है। जो खुद बिना श्रम के सब लेना चाहता है, वह दूसरे को हक का अवसर मिलते ही न्याय की दुहाई देने लगता है।
इसलिए अब प्रशासन से अपेक्षा है कि वह दया को योजना में बदले।
पहला, किसी भी अनुदान प्राप्त ट्रस्ट की पवित्रता उसकी पारदर्शिता से तय हो। सार्वजनिक सोशल ऑडिट हो।
दूसरा, याचक-मुक्त व्यवस्था बनाई जाए। सहायता को कौशल, शिक्षा और श्रमदान से जोड़ा जाए। मुफ्त के साथ काम जुड़ेगा तो सम्मान भी लौटेगा।
तीसरा, भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की शिक्षा दी जाए। लोगों को मनोवैज्ञानिक मोटिवेशन मिले कि परलोक बाद में सुधरेगा, पहले इस लोक को कर्म से सरल बनाना है।
गुरु घासीदास का सत्य ही परम सत्य है। मनखे मनखे एक मानकर जब धन वाला बरार देगा और निर्धन श्रमदान, तभी कोई याचक नहीं रहेगा, कोई शोषक नहीं रहेगा।
देश को दानवीरों की नहीं, कर्मवीरों की जरूरत है।
जय सतनाम।
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