गुरु घासीदास पर रसेल अंग्रेज सह लेखक हीरालाल राजस्व अधिकारी पहले भारतीय थे। इनके रिपोर्ट वाहियात और सांप्रदायिक हैं।
प्रायः हिंदू लेखक द्वेषपूर्ण और निंदनीय लेखन ही करते रहें हैं।
प सुंदरलाल शर्मा जी प मिलाऊ दास कोसरिया के साथी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे के पहल से सर्वप्रथम सतनामी पुराण 1907 में लिखे हैं ।ऐसा जिक्र मिलता तो हैं पर आज पर्यंत देखने नहीं मिला और न ही उनकी कोई पंक्तियां उपलब्ध हुई हैं।
फिर मनोहर दास नृसिंह के बाद अनवरत लेखन का सिलसिला चला और महज 50-55 वर्षों में छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक लेखन सतनाम पंथ और गुरुघासीदास पर हुआ।
उनके उपदेश अमृतवाणी जगजाहिर हुआ तथा भारतीय बौद्धिक जगत ऐसे मनीषी से परिचीत हुआ जो बुद्ध के बाद सबसे अधिक प्रखर और परम सत्य के उद्घोषक और प्रवर्तक हैं। उनके वाणी में कोई भ्रम नहीं कोई ऊहापोह नहीं और न ही परिकल्पना हैं बस सत्य का सीधा साक्षात्कार हैं।
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