Monday, November 2, 2026

सतनाम धर्म और हिंदुओं के पौनी व्यवस्था

*सतनामी, पौनी व्यवस्था और धर्म पहचान का प्रश्न : 1955 के पम्पलेट के आलोक में*

*- एक दस्तावेजी विवेचन*

छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास में सतनामी समाज की पहचान को लेकर दो धाराएं समानांतर चलती रही हैं। एक धारा इसे हिन्दू समाज के भीतर एक सुधारवादी पंथ मानती है, दूसरी इसे आरम्भ से ही स्वतंत्र सतनाम धर्म मानती है। इस बहस को समझने के लिए 1955 का एक आव्हान-पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।

1. सतनाम पंथ का मूल स्वरूप

संत गुरु घासीदास जी का जन्म 1756 में गिरौदपुरी में हुआ। उन्होंने "मनखे-मनखे एक समान" और सतनाम के सिद्धान्त पर पंथ की स्थापना की। उनका संदेश मूर्तिपूजा का विरोध, निर्गुण सत्य की उपासना, जातिविहीन समाज और जैतखाम की स्थापना था।

ब्रिटिशकालीन जनगणना में सतनामियों का उल्लेख स्वतंत्र वर्ग के रूप में मिलता है। इस संबंध में एक समीक्षा में उल्लेख है कि - "जाति विहिन तथा सत को मानने वालों का एक समाज... वर्ण व्यवस्था के बाहर रहने से तथा अंग्रेजी शासनकाल के जनगणना में स्वतंत्र व पृथक सतनामी का धर्म अस्तित्व में था, अपना नीति-नियम, सांस्कृतिक संस्कार आदि था।" 

आजादी के बाद जनगणना में 6 प्रमुख धर्मों के साथ "अन्य" में लिखने का विकल्प रहा।

2. पौनी-पसारी व्यवस्था : गाँव का आर्थिक तंत्र

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण व्यवस्था को "बारा बलूतेदार / पौनी-पसारी" व्यवस्था कहा जाता था। इसमें दो पक्ष थे -

*जजमान :* गाँव का किसान / जमींदार परिवार
*कामिन / पौनी :* सेवा देने वाली जातियाँ, जिन्हें "servicing castes are called kamins while the castes served are called jajman" कहा गया है।

इन सेवाओं में मिट्टी के बर्तन, कपड़े धुलाई, जूते-चप्पल बनाना, लोहे-लकड़ी का काम, बांस का सूपा-टोकना, केशकर्तन, दोना-पत्तल, पूजन सामग्री आदि व्यवसाय शामिल थे, जिन्हें शासन आज भी "पौनी-पसारी व्यवसाय के रूप में मान्यता" देता है।

यह व्यवस्था आधुनिकता के साथ लुप्त होती गई - "आधुनिकता के साथ छत्तीसगढ़ में प्रचलित पौनी पसारी व्यवस्था लुप्त होते जा रही थी। पहले यह हमारी संस्कृति में समाया हुआ था।"

3. 1955 का आव्हान-पत्र : क्या कहता है?

हिन्दू सतनामी महासभा के महंत नैनदास (MLA) और अजोरदास (MLA) द्वारा नागपुर के आदर्श प्रेस में छपवाया गया यह पर्चा अस्पृश्यता निवारण कानून 1 जून 1955 के लागू होने के तुरंत बाद का है।

*मूल पाठ का सार :*

> "हम हरिजन हिन्दू उच्च श्रेणी के हिन्दुओं व निस्तारी पांचों पौनी से नम्र निवेदन... हमको सर्व स्थान में स्थान दें और कुल रुका-बंदी उठा दें। निस्तारी चीज देहाती क्षेत्र में निस्तार के लिये पांच पौनी, जैसे लोहा र, चमार, रावत, नाई, धोबी, वो भोई ब्राह्मण ये सब भाईयों का निस्तार होता है, वैसे ही हमारी भी निस्तार करने की कृपा करें।"

इसमें आगे लिखा है कि पौनियों को सवर्णों के बराबर दाम, नेंग, जेवर देंगे और सरकार तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कानून अमल में लाने की अपील है।

*इससे दो तथ्य स्पष्ट होते हैं :*

*क) कौन पौनी था, कौन वंचित था :* पर्चे में पौनी के रूप में लोहार, चमार, रावत, नाई, धोबी और भोई ब्राह्मण गिनाए गए हैं। लेखक कह रहा है कि इन सबका तो गाँव में निस्तार होता है, पर हमारा नहीं। अर्थात उस समय सतनामी बस्तियों को इन सेवाओं से वंचित रखा जाता था।

*ख) पौनी में ब्राह्मण भी :* आपने सही इंगित किया कि इसमें ब्राह्मण भी पौनी में है। छत्तीसगढ़ में "भोई ब्राह्मण / महा-ब्राह्मण" पानी भरना, पत्तल उठाना, श्राद्ध का दान लेना जैसे सेवा-कार्य करते थे, इसलिए उन्हें भी जजमानी बोली में पौनी माना जाता था। यह दर्शाता है कि पौनी व्यवस्था केवल शिल्पी जातियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि धार्मिक सेवा देने वाले भी इसमें शामिल थे, फिर भी सतनामियों को इससे बाहर रखा गया था।

4. हिन्दू सतनामी महासभा और हिन्दूकरण का उपक्रम

1955 के बाद का समय संक्रमण का था। एक तरफ अस्पृश्यता विरोधी कानून आया, दूसरी तरफ हिन्दू सतनामी महासभा ने हिन्दू समाज के भीतर ही बराबरी दिलाने के लिए अभियान चलाया। उसका तर्क था कि कबीर पंथ की तरह सतनाम पंथ भी "पंथ" शब्द के कारण धर्म की संज्ञा से वंचित है, पर सांस्कृतिक रूप से हिन्दू परम्परा से जुड़ा है। जैतखाम, पंथी नृत्य, पारिवारिक संस्कार सह-अस्तित्व में रहे।

दूसरी धारा का तर्क है कि पंथ शब्द के कारण ही स्वतंत्र धर्म की पहचान दब गई और पौनी जैसी हिन्दू सामाजिक सुविधाओं के अभाव से यह सिद्ध होता है कि सतनामी आरम्भ से वर्ण-व्यवस्था से बाहर थे।

5. आगामी जनगणना और स्वतंत्र पहचान का प्रश्न

लेखक का प्रश्न है - "तब आगामी जनगणना में स्वतंत्र सतनाम धर्म लिखकर अपनी पहचान स्थापित करने में हर्ज ही क्या है?"

जनगणना की वर्तमान प्रक्रिया के अनुसार :

- भारत में धर्म का कॉलम स्व-घोषणा पर आधारित है। 2011 में लगभग 79 लाख लोगों ने "अन्य" में अपना धर्म लिखा था।
- अगर बड़ी संख्या में लोग "सतनाम धर्म" या "सतनामी धर्म" लिखते हैं, तो यह आंकड़ा "Other Religions" में प्रकाशित होगा और भविष्य में अलग धर्म कोड की मांग के लिए सांख्यिकीय आधार बनेगा।
- इसका SC आरक्षण या संवैधानिक स्थिति पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अनुसूचित जाति का निर्धारण राष्ट्रपति के आदेश से होता है, धर्म कॉलम से नहीं। वर्तमान में सरना, लिंगायत, सतनाम सहित कई समुदाय अलग कोड की मांग इसी आधार पर कर रहे हैं।

*निष्कर्ष*

1955 का यह पम्पलेट इस बात का समकालीन लिखित प्रमाण है कि पौनी-पसारी जैसी ग्रामीण सेवा-व्यवस्था से सतनामी समाज वंचित था, जिसके लिए उन्हें अपील करनी पड़ी। इसमें भोई ब्राह्मण तक का पौनी में शामिल होना यह दर्शाता है कि वंचना कितनी गहरी थी।

इस दस्तावेज को सुरक्षित, ट्रांसक्राइब और डिजिटल आर्काइव में रखना, सतनामी पहचान पर होने वाले किसी भी अकादमिक और जनगणना-संबंधी विमर्श के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत होगा।

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*स्रोत :*
1. पम्पलेट - "हमारे हिन्दू भाईयों से अपील", आदर्श प्रेस, नागपुर, 1955
2. British Census and Satnami Dharma - Review, Amazon
3. Pauni Pasari - Chhattisgarh Govt Scheme and traditional system description
4. Jajmani System definition

 इस आलेख के साथ मूल पम्पलेट का चित्र संलग्न हैं 

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
चित्र: निलेश अनंत के वाल से 
टीप - कृपया शेयर करते हैं यह अच्छी बात हैं इसलिए ही पोस्ट डालते भी हैं परंतु लेखक का हटाकर न करें।
   धन्यवाद

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