Tuesday, October 20, 2026

भट्टप्रहरी

यह आपके शोध-प्रारूप का व्याकरण-सम्मत और अनुक्रमबद्ध परिष्कृत रूप है। मूल भाव, परिकल्पना और मौखिक स्रोतों को यथावत रखा गया है, केवल भाषा, प्रवाह और अकादमिक क्रम को व्यवस्थित किया गया है।

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### भट्टप्रहरी गोत्र या पद : सिरपुर की खड्गधारी भट्टप्रहरी प्रतिमा एवं सतनाम पंथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
**एक पुरातात्विक, वंश-परंपरागत एवं धार्मिक-सांस्कृतिक शोध-परिकल्पना**

**शोध-क्षेत्र:** सिरपुर - प्राचीन श्रीपुर, दक्षिण कोसल, वर्तमान छत्तीसगढ़
**प्रमुख विषय:** भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय परंपरा, खड्गधारी प्रहरी प्रतिमा, बौद्ध सहजयानी परंपरा और सतनाम पंथ
**शोध की प्रकृति:** प्रारंभिक ऐतिहासिक अध्ययन एवं अनुसंधान की रूपरेखा

**शोधार्थी: डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

#### सारांश
छत्तीसगढ़ का सिरपुर प्राचीन दक्षिण कोसल का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा है। महानदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर में बौद्ध, शैव, वैष्णव तथा जैन परंपराओं से संबंधित पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ की स्थापत्य एवं मूर्तिकला प्राचीन मध्य भारत की बहु-धार्मिक सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रस्तुत शोध-पत्र सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले "भट्टप्रहरी" गोत्र के लोगों की मौखिक परंपरा, सिरपुर में संरक्षित एक खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान, तथा सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल करता है।

स्थानीय समुदाय में यह धारणा प्रचलित है कि 'भट्टप्रहरी' शब्द का ही अपभ्रंश अथवा मुख-सुख उच्चारण 'भतपहरी' है। लोक-व्याख्या में इसे रोचक, मासूमियत भरे अथवा व्यंग्यात्मक ढंग से "भात की पहरेदारी करने वाले" के रूप में भी समझाया जाता है। समुदाय में यह भी कहा जाता है कि जो पहर या छरिया में रहे वे भतपहरी और जो ढींढ़ा बन गए वे ढीढी - परन्तु इस लोक-व्युत्पत्ति के आधार पर भी दोनों गोत्रों में आज परस्पर विवाह नहीं होता और वे एक-दूसरे को भाई-बहन मानते हैं।

वस्तुतः 'भट्टप्रहरी' शब्द अपने में एक पद तथा एक कुशल रक्षक के भाव को समेटे हुए है। यही इसका निकटतम अर्थ भी है। भट्टप्रहरी समुदाय में दशहरे पर खड्ग-पूजा करने की परंपरा है। विकट या संकट काल में पूर्वज-देव, गोटानी और खांडा की पूजा तथा गांव के चारों ओर परिक्रमा करने का अनुष्ठान आज भी कई परिवारों और ग्रामों में प्रचलित है, ताकि किसी विघ्न, संकट, शत्रु, हिंसक पशु अथवा रोग के आक्रमण से रक्षा हो सके। कालांतर में समुदाय के लोग सुविधा के अनुसार भारद्वाज, भट्ट, भारती, प्रहरी, प्रहरे आदि उपनाम लिखते रहे हैं।

समुदाय की स्मृति के अनुसार सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र रहा है और उनके पूर्वजों की भूमि सिरपुर में थी। बाद के काल में उनके पूर्वज गुरु घासीदास के विचारों से प्रभावित होकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। स्थानीय परंपरा में गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके का संबंध भी सिरपुर से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को इस शोध में महत्वपूर्ण मौखिक स्रोत के रूप में स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, प्रतिमा की पुरातात्विक पहचान और धार्मिक परंपराओं की निरंतरता को प्रमाणित करने के लिए अभिलेखीय, पुरातात्विक, वंशावलीगत और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन आवश्यक है।

**प्रमुख शब्द:** भट्टप्रहरी, सिरपुर, श्रीपुर, दक्षिण कोसल, खड्गधारी प्रतिमा, द्वारपाल, सतनाम पंथ, गुरु घासीदास, माता सफुरा, बौद्ध धर्म, सहजयान।

### 1. प्रस्तावना
इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजवंशों का विवरण मात्र नहीं है। किसी क्षेत्र के प्राचीन निवासियों, उनके सामाजिक दायित्वों, स्थानीय समुदायों, धार्मिक परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही स्मृतियों का अध्ययन भी इतिहास का महत्वपूर्ण अंग है।

छत्तीसगढ़ का सिरपुर इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। प्राचीन श्रीपुर अथवा सिरीपुर के नाम से विख्यात यह नगर दक्षिण कोसल के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। यहाँ के पुरातात्विक अवशेष लगभग पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित स्थापत्य और धार्मिक जीवन की जानकारी देते हैं।

सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार, अन्य धार्मिक स्थापत्य, मूर्तियाँ तथा नगरीय जीवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि प्राचीन सिरपुर किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं था, बल्कि विभिन्न धार्मिक समुदायों और सांस्कृतिक धाराओं का संगम था। इसी पृष्ठभूमि में सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में रहने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय परंपरा का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस शोध का उद्देश्य किसी पूर्व-निर्धारित वंशगत दावे को प्रमाणित घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों और स्थानीय स्मृतियों के आधार पर उसकी व्यवस्थित जाँच करना है।

### 2. शोध के उद्देश्य
1.  प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, धार्मिक और पुरातात्विक पृष्ठभूमि का संक्षिप्त विवेचन करना।
2.  सिरपुर के संग्रहालय में संरक्षित बताई गई खड्गधारी पुरुष प्रतिमा की संभावित पहचान के लिए शोध की दिशा निर्धारित करना।
3.  भट्टप्रहरी गोत्र की स्थानीय वंश-परंपरा, सिरपुर से संबंध और पूर्वजों की भूमि से संबंधित मौखिक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण करना।
4.  गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर से संबंधित स्थानीय परंपराओं की ऐतिहासिक जाँच के लिए आधार तैयार करना।
5.  सतनाम पंथ तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच संभावित वैचारिक और ऐतिहासिक संबंधों का आलोचनात्मक अध्ययन करना।

### 3. सिरपुर का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व
सिरपुर वर्तमान छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम श्रीपुर अथवा सिरीपुर बताया जाता है। 'सिरी' शब्द पाली और बौद्ध धम्म से संदर्भित माना जाता है।

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार सातवाहन-वंशज भट्टप्रहरी शासकों के काल में गौतम बुद्ध का आगमन हुआ और उन्हें तथा उनके साथ आए भिक्षु-संघ को एक सहस्र कोसा-वस्त्र भेंट किए गए। कहा जाता है कि कोसा के प्राकृतिक रंग वाले यही वस्त्र आगे चलकर भिक्षुओं के चीवर का आधार बने।

ऐतिहासिक रूप से यह नगर सातवाहन, शरभपुरीय और पाण्डुवंशी शासकों के काल में दक्षिण कोसल के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

**सिरपुर से प्राप्त प्रमुख पुरातात्विक अवशेष:**
- लक्ष्मण मंदिर तथा अन्य मंदिर स्थापत्य
- बौद्ध विहार और धार्मिक प्रतिमाएँ
- जैन परंपरा से संबंधित अवशेष
- पत्थर एवं धातु की मूर्तियाँ
- आवासीय, व्यापारिक और नगरीय संरचनाओं के अवशेष
- रायकेरा तालाब के समीप निर्मित गुरु घासीदास मंदिर

सिरपुर में महायान बौद्ध धर्म तथा प्रारंभिक वज्रयान परंपरा से संबंधित कलात्मक साक्ष्यों का भी अध्ययन किया गया है।

**महत्वपूर्ण अंतर:** सिरपुर का प्राचीन और बहु-धार्मिक महत्व पुरातात्विक साक्ष्यों से समर्थित है। इसके विपरीत, किसी आधुनिक गोत्र या समुदाय का उस नगर पर विशिष्ट वंशगत अधिकार अथवा प्रत्यक्ष उत्तराधिकार सिद्ध करने के लिए पृथक प्रमाणों की आवश्यकता होगी।

### 4. भट्टप्रहरी गोत्र और सिरपुर की स्थानीय परंपरा
इस शोध का एक महत्वपूर्ण आधार सिरपुर के समीपवर्ती ग्रामों में निवास करने वाले भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक परंपरा है। समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार:

- भट्टप्रहरी गोत्र के अनेक परिवार सिरपुर के आसपास के ग्रामों में निवास करते हैं।
- ग्रामीणों में यह धारणा प्रचलित है कि सिरपुर भट्टप्रहरियों का प्राचीन क्षेत्र था।
- समुदाय के पूर्वजों की भूमि सिरपुर में होने की बात कही जाती है।
- स्थानीय स्मृति में 'भट्टप्रहरी' नाम का संबंध प्राचीन प्रहरी, द्वारपाल अथवा खड्गधारी सामंत से जोड़ा जाता है।

इन कथनों को सामुदायिक मौखिक इतिहास के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। ऐसी परंपराएँ कई बार उन सामाजिक संबंधों और ऐतिहासिक स्मृतियों को सुरक्षित रखती हैं, जिनका लिखित अभिलेख सीमित होता है।

**ऐतिहासिक पुष्टि के लिए आवश्यक स्रोत:**
- सिरपुर और आसपास के गाँवों की पुरानी भूमि एवं राजस्व संबंधी प्रविष्टियाँ
- परिवारों की वंशावलियाँ, पुराने दस्तावेज तथा ताम्रपत्र या अन्य अभिलेख
- पुराने अभिलेखों, स्थानीय साहित्य में 'भट्टप्रहरी' नाम का उल्लेख
- विभिन्न गाँवों के बुजुर्गों से स्वतंत्र मौखिक साक्षात्कार
- पदवियों के ऐतिहासिक अर्थों का भाषायी अध्ययन

इस चरण में सिरपुर को भट्टप्रहरी समुदाय का प्रमाणित पैतृक नगर घोषित करना उचित नहीं होगा, परन्तु यह समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति और भूमि-संबंधों पर गंभीर शोध का एक महत्वपूर्ण विषय अवश्य है।

### 5. सिरपुर की खड्गधारी पुरुष प्रतिमा: प्रहरी अथवा सामंत की संभावित पहचान
उपलब्ध चित्रों में एक पूर्णाकार पाषाण मानवाकृति दिखाई देती है। समुदाय के प्रतिनिधि के अनुसार यह प्रतिमा लक्ष्मण मंदिर के समीप स्थित संग्रहालय में संरक्षित है।

**दिखाई देने वाली विशेषताएँ:** ऊँचा शिरोभूषण अथवा केश-विन्यास, सामने की ओर उन्मुख शांत मुखाकृति, अलंकृत शरीर, कमर पर वस्त्र और सामने की ओर मुड़े हुए हाथ। हाथों के समीप एक लंबवत आकृति भी दिखाई देती है, जिसकी पहचान केवल चित्र से निश्चित नहीं की जा सकती।

स्थानीय व्याख्या में इसे खड्गधारी सामंत, द्वारपाल अथवा प्रमुख प्रहरी माना जाता है और इसे भट्टप्रहरी परंपरा से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई है।

**पहचान की जाँच के तीन प्रश्न:**

**5.1 क्या यह द्वारपाल प्रतिमा है?**
प्राचीन मंदिरों में द्वारपाल प्रतिमाएँ सामान्यतः प्रवेशद्वारों के निकट स्थापित की जाती थीं। उनमें आयुध, विशेष शारीरिक मुद्रा और रक्षक-भूमिका के प्रतीक मिलते हैं। किसी प्रतिमा को द्वारपाल घोषित करने के लिए उसका मूल स्थापत्य-संदर्भ, हस्त-मुद्रा, आयुध, पृष्ठ-भाग और उत्खनन-विवरण देखना आवश्यक है।

**5.2 क्या यह किसी सामंत अथवा अधिकारी की प्रतिमा हो सकती है?**
प्राचीन मध्य भारत में राजकीय एवं प्रशासनिक पदों से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिमाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भी केवल खड़ी पुरुष-आकृति या हथियार जैसी वस्तु से उसकी राजकीय पदवी निर्धारित नहीं होती। इसके लिए शिलालेख, प्रतिष्ठा-अभिलेख, स्थापना-स्थल अथवा समकालीन कलात्मक तुलनाएँ अधिक उपयोगी होंगी।

**5.3 क्या इसका संबंध भट्टप्रहरी नाम से है?**
यह इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण, किन्तु अभी अप्रमाणित प्रश्न है। यदि किसी पुराने अभिलेख में 'भट्टप्रहरी' नाम, उससे मिलती-जुलती पदवी अथवा प्रहरी-संबंधी पद का उल्लेख मिलता है, तो उसकी भाषायी और ऐतिहासिक जाँच करनी होगी। केवल नाम की समानता से प्रतिमा और समुदाय के बीच संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रतिमा के आधिकारिक अभिलेख, वंशावली और कालानुक्रमिक प्रमाणों का परस्पर मेल आवश्यक है।

### 6. गुरु घासीदास, माता सफुरा और सिरपुर की स्थानीय स्मृति
समुदाय द्वारा बताई गई एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा गुरु घासीदास की पत्नी माता सफुरा के मायके को सिरपुर से जोड़ती है। गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ के सतनाम आंदोलन के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक व्यक्तित्व हैं।

कुछ प्रकाशित विवरणों में माता सफुरा को सिरपुर से संबंधित बताया गया है। इस विषय में विशेष रूप से उनके पैतृक परिवार, पिता के नाम, विवाह-संबंधी परंपरा और मूल निवास से संबंधित स्रोतों की तुलना उपयोगी होगी। समुदाय की यह धारणा कि गुरु घासीदास का ससुराल और माता सफुरा का मायका सिरपुर में था, स्थानीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण अनुसंधान-प्रश्न प्रस्तुत करती है। इसकी पुष्टि के लिए गुरु घासीदास की जीवनियों, सतनामी परंपराओं, परिवारों की मौखिक स्मृतियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की जाँच आवश्यक है।

### 7. सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा: तुलनात्मक अध्ययन

**7.1 सिरपुर में बौद्ध परंपरा**
सिरपुर में बौद्ध विहारों, मूर्तियों तथा धार्मिक गतिविधियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। विद्वानों ने यहाँ महायान और प्रारंभिक वज्रयान की उपस्थिति का अध्ययन किया है। सहजयान का संबंध मध्यकालीन बौद्ध सिद्ध-परंपरा और सहज-अनुभव पर बल देने वाली धाराओं से है।

**7.2 सतनाम पंथ के सामाजिक एवं नैतिक आदर्श**
सतनाम पंथ में सत्य, नैतिक जीवन, मानवीय समानता और जातिगत भेदभाव के विरोध के विचार केंद्रीय हैं। समुदाय की मान्यता के अनुसार माता सफुरा बौद्ध धम्म के अनुयायी महंत अंजोर दास की सुपुत्री थीं और योग-साधना में प्रवीण थीं। उनके लक्षणों के आधार पर ही उनका विवाह गुरु घासीदास से हुआ।

इस संदर्भ में एक प्राचीन पंथी गीत प्रचलित है:
> *सिरपुर नगर के महंत नाव अंजोर दास ग,*
> *ओकर सुघर कइना नाव सफुरा ताय गा।*
> *उज्जर-उज्जर रूप ओकर, जइसे फूल कास गा।*

इन आदर्शों की तुलना बौद्ध धर्म की नैतिक शिक्षाओं, करुणा और अहिंसा की परंपराओं से की जा सकती है।

**7.3 समानता और ऐतिहासिक निरंतरता में अंतर**
दो धार्मिक परंपराओं में समान विचार मिलने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि एक परंपरा दूसरी की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी है। सतनाम पंथ को प्राचीन सहजयानी बौद्ध परंपरा की निरंतरता के रूप में स्थापित करने के लिए बीच की ऐतिहासिक कड़ियों - धार्मिक शब्दावली, प्रथाएँ, ग्रंथ, व्यक्तित्व और सामाजिक समूहों की निरंतरता - के प्रमाण आवश्यक होंगे। अतः इस स्तर पर यह परिकल्पना ही रखी जा सकती है कि दोनों के बीच वैचारिक समानता या क्षेत्रीय सांस्कृतिक संपर्क रहा हो।

### 8. अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक परिवर्तन का प्रश्न
मौखिक परंपरा के अनुसार भट्टप्रहरी गोत्र के पूर्वज गुरु घासीदास के संपर्क में आकर सतनाम पंथ में सम्मिलित हुए। गुरु घासीदास का जीवन अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से संबंधित है।

**शोध के प्रमुख प्रश्न:**
- भट्टप्रहरी परिवारों के सतनाम पंथ से जुड़ने की परंपरा कितनी पुरानी है?
- क्या इस परिवर्तन से संबंधित कोई वंशावली, पत्र या धार्मिक अभिलेख उपलब्ध है?
- क्या विभिन्न ग्रामों में यह परंपरा समान रूप में प्रचलित है?
- क्या समुदाय की धार्मिक पहचान में पुराने रीति-रिवाजों और सतनाम शिक्षाओं के बीच संबंध दिखाई देता है?

### 9. पूर्वजों की भूमि और ऐतिहासिक अधिकार का प्रश्न
यहाँ दो प्रश्नों को अलग रखना आवश्यक है:
1.  क्या समुदाय के पूर्वज सिरपुर में रहते थे अथवा वहाँ भूमि रखते थे? यह ऐतिहासिक और अभिलेखीय जाँच का विषय है।
2.  वर्तमान में किसी भूमि पर कानूनी अधिकार किसका है? यह राजस्व अभिलेखों और लागू कानूनों के आधार पर निर्धारित होगा।
इस प्रकार ऐतिहासिक वंश-परंपरा का अध्ययन और वर्तमान भूमि-अधिकार का निर्धारण परस्पर संबंधित होते हुए भी अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

### 10. शोध-पद्धति
**प्रथम चरण: संग्रहालय अभिलेख -** संग्रहालय प्रभारी से प्रतिमा का आधिकारिक नाम, सूची क्रमांक, प्राप्ति-स्थान, माप, सामग्री, अनुमानित काल और पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना।

**द्वितीय चरण: मौखिक इतिहास -** सिरपुर और आसपास के ग्रामों में भट्टप्रहरी गोत्र के बुजुर्गों से साक्षात्कार, जिसमें गाँव, आयु-समूह, वंशावली का आधार और कथन की पीढ़ीगत निरंतरता दर्ज हो।

**तृतीय चरण: भूमि और वंशावली के अभिलेख -** पुराने राजस्व दस्तावेज, वंशावली और ग्राम-स्तरीय दस्तावेजों का संकलन।

**चतुर्थ चरण: धार्मिक इतिहास -** गुरु घासीदास, माता सफुरा, सतनाम आंदोलन तथा बौद्ध सहजयानी परंपरा पर प्रकाशित शोध की तुलना।

**पंचम चरण: तुलनात्मक विश्लेषण -** प्रतिमा, मौखिक परंपरा और लिखित स्रोतों से प्राप्त निष्कर्षों की तुलना, जिसमें प्रमाणित और अप्रमाणित तथ्यों को स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए।

### 11. निष्कर्ष
सिरपुर का पुरातात्विक महत्व, उसकी बहु-धार्मिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और बौद्ध परंपराओं की उपस्थिति ऐतिहासिक साक्ष्यों से समर्थित है। भट्टप्रहरी समुदाय की स्थानीय स्मृति, पूर्वजों की भूमि से संबंधित कथन, खड्गधारी प्रतिमा के साथ संभावित संबंध तथा गुरु घासीदास और माता सफुरा से जुड़ी परंपराएँ आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण विषय प्रस्तुत करती हैं। सतनाम पंथ और बौद्ध सहजयानी परंपरा के बीच वैचारिक समानताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष ऐतिहासिक निरंतरता स्थापित करने के लिए अधिक ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।

इस शोध का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भट्टप्रहरी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, सिरपुर की संबंधित प्रतिमा का आधिकारिक पुरातात्विक विवरण प्राप्त करना तथा भूमि और वंशावली के दस्तावेजों की जाँच अत्यंत उपयोगी होगी।

### 12. संदर्भ एवं आगे के अध्ययन के लिए स्रोत
1. UNESCO World Heritage Centre, Sirpur Cultural and Archaeological Landscape.
2. Singh, Saurabh. (2021). The Emergence and Spread of the Buddhist Tārā Cult in India...
3. Singh, Saurabh. (2021). Buddhism in Sirpur (Chhattisgarh): An Archaeological Study. Deccan College, Pune.
4. गुरु घासीदास और सतनाम आंदोलन से संबंधित प्रकाशित जीवनियाँ एवं छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय इतिहास-ग्रंथ।
5. सिरपुर संग्रहालय की प्रतिमा-सूची, पुरातत्व विभाग की उत्खनन रिपोर्टें, स्थानीय भूमि अभिलेख और भट्टप्रहरी गोत्र की मौखिक वंश-परंपराएँ - जिनका अगले चरण में संकलन और सत्यापन किया जाना है।

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इच्छुक शोधार्थी इस कार्य हेतु संपर्क कर सकते हैं।
**- डॉ. अनिल कुमार भतपहरी**

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