Thursday, October 8, 2026

संस्कृत कृत्रिम और शास्त्र भाषा हैं

संस्कृत कृत्रिम एवं शास्त्र भाषा है - एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ
1. नाम में ही उत्पत्ति छिपी है

सम् + कृत = अच्छी तरह से गढ़ा हुआ, बनाया हुआ।

दुनिया की कोई भी प्राकृतिक भाषा अपने को "बनाई हुई" नहीं कहती। प्राकृत का अर्थ है जो प्रकृति से जन्मा है, लोगों के मुंह में है। संस्कृत का अर्थ है जिसका संस्कार किया गया है। संस्कार के लिए कच्चा माल चाहिए, और वह कच्चा माल प्राकृत और पाली थी। जैसे कच्चे आम से अचार बनता है, वैसे जनभाषा से प्रयोगशाला में संस्कृत बनी। व्याकरण से ही स्पष्ट है - प्राकृत प्रकृति है, संस्कृत उसकी परिष्कृति है।
अतः संस्कृत एक कृत्रिम राजभाषा हैं राजा, सामंत पुरोहित प्रभुवर्ग या देवगण कहलाते थे और गुरुकुल मे संस्कृत पढ़ा लिखा होने के कारण संस्कृत में वार्तालाप करते थे इसलिए संस्कृत को देववाणी एवं पाली प्राकृत इत्यादि को लोकवाणी कहें गए.

2. शिलालेखीय साक्ष्य: पत्थर झूठ नहीं बोलते

यदि संस्कृत सबसे प्राचीन होती, तो भारत के सबसे प्राचीन अभिलेख संस्कृत में होते। तथ्य उल्टा है।

क. मौर्य काल, 260 ईसा पूर्व: भारत के सबसे प्राचीन पठनीय शिलालेख अशोक के हैं। पूरे भारत में उनकी भाषा प्राकृत, पाली और सीमांत पर ग्रीक-अरामाइक है। एक भी पंक्ति संस्कृत में नहीं। अशोक ने प्रजा की भाषा चुनी।

ख. 400 साल का शून्य: अशोक के बाद शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक राजाओं के सैकड़ों शिलालेख और सिक्के मिलते हैं। भाषा वही - प्राकृत।

ग. पहला संस्कृत शिलालेख, 150 ईस्वी: शक राजा रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख संस्कृत का पहला लंबा काव्यात्मक शिलालेख है। अशोक से 400 साल बाद।

यह क्रम सिद्ध करता है - जो भाषा जनता की थी, वही पहले पत्थरों पर आई। जो दरबार में गढ़ी गई, वह बाद में आई।

3. भाषावैज्ञानिक साक्ष्य: सरल से जटिल की ओर

भाषा सरल से जटिल बनती है।

पाली-प्राकृत में - धम्म, कम्म, सच्च, मुह, पाणी - छोटे, बोलने में आसान शब्द।
संस्कृत में - धर्म, कर्म, सत्य, मुख, पाणि - उन्हीं को भारी, व्याकरण-बद्ध बनाया गया।

12-15 अक्षरों के लंबे समास, इको यणचि, अतो लोप: जैसे गणित के फॉर्मूले - यह जीवित जनभाषा की विशेषता नहीं, कंठस्थ करने की तकनीक है। रोज की बोली में कोई 15 अक्षर का शब्द नहीं बोलता।

पाणिनि ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में अष्टाध्यायी के लगभग 4000 सूत्रों में पहले से चली आ रही लोकभाषा को बाँधा, छाँटा और अपरिवर्तनीय बनाया। वे सृष्टिकर्ता नहीं, संपादक थे।

4. भाषा पर एकाधिकार कैसे बना?

जब किसी भाषा को देववाणी, अनादि, स्वर्ग-बैकुंठ की भाषा घोषित कर दिया जाता है, तो साधारण मनुष्य उसका अधिकारी नहीं रह जाता।

प्राकृत-पाली बौद्धों, जैनों, व्यापारियों, किसानों की भाषा थी - जातक, बुद्ध-उपदेश, लोकगाथाएं सब इसी में।

गुप्त काल में राजतंत्र ने जब इसे राजकीय संरक्षण और राजभाषा बनाया, तब भूमिदान-पत्र, प्रशस्ति, धर्मशास्त्र संस्कृत में लिखे जाने लगे। और फिर प्रचारित किया गया कि प्राकृत तो संस्कृत का अपभ्रंश है। यह उल्टा पाठ था। सच यह है कि मानक भाषा बोली का परिष्कार होती है, जैसे मानक हिंदी खड़ी बोली का परिष्कार है, अपभ्रंश नहीं।

इसी दैवीकरण से ज्ञान की भाषा वर्चस्व की भाषा बन गई और उस पर शैक्षणिक-धार्मिक एकाधिकार स्थापित हो गया।

निष्कर्ष

संस्कृत प्राचीन है, पर आदि नहीं है न ही इनसे भारतीय भाषाएं जन्मी हैं बल्कि लोक भाषाएँ से यह स्वयं विकसित हुई हैं। वह एक लंबी बोली-परंपरा का, बौद्धिक चेतना और राज्य-व्यवस्था द्वारा किया गया अंतिम, सबसे परिष्कृत और कृत्रिम संस्करण है। वह आकाश से नहीं उतरी, धरती पर ही, जनता की बोली से, व्याकरण की प्रयोगशाला में गढ़ी गई है।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
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