जगराता
प्रातः सैर, सरोवर तट पर,
बैठा तरु की शीतल छाँह,
भीगे नयनों से एक पुरुष
देख रहा जीवन-प्रवाह।
उद्वेलित युवा, असहिष्णु,
क्यों अशांति इस महादेश में,
आसुरी शक्तियों के जाल
फैल रहे हैं सर्वत्र देश में।
नेट-नशे के जाल हैं,
छद्म धर्म-कर्म भेड़-चाल है,
प्रदर्शन की होड़ सर्वत्र,
आचरणहीन भीड़ विकराल है।
दिशाहीन, सद्भावहीन,
छल-छद्म की भगदड़ है,
संसाधनों पर कब्जा,
जन बेदखल, बड़ी तिकड़म है।
खेल रहे हैं सभी यह खेल,
बड़ा ही मनोरंजक है, वाह,
अपनों में मगन हैं हम सब,
पड़ोसी से बेपरवाह।
खुद-सुख, बेपरवाही का
अंतिम लक्ष्य अलगाव है,
उसी में सब उलझे हुए,
तंत्र-जाल में भटकाव है।
हे आद्ये, सुलझा इन्हें,
भव का अंध तमस हरो माता,
भटकाव, अलगाव से बचाओ,
यही मेरी है जगराता।
- डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
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