Friday, October 16, 2026

चूरी अम्मर रहें

चूरी अमर रहे

जुनवानी के उस पुराने आंगन में आज भी एक खूंटी गड़ी है।

मास्टर जी ने बताया था, इसी खूंटी पर कुटेला वाले तुर्का बाबा अपना कांवर टिकाते थे। एक तरफ टोकनी में लाल, हरी, पीली कांच की चूड़ियां, दूसरी तरफ मनिहारी का छोटा-मोटा सामान। गांव-गांव लगना, यही तो उनकी पौनी-पसारी थी।

बाबा आते तो आंगन भर जाता। आस-पास की सारी बहुएं-बेटियां घेरा बना लेतीं। बाबा किसी का नाम नहीं पूछते थे, बस कहते - "लाओ बिटिया, हाथ आगे करो।" 

चूड़ी पहनाते-पहनाते कलाई पकड़ते, और जब आखिरी चूड़ी कलाई पर खनकती तो औरतें झुक कर उनके पैर छू लेतीं। तुर्का बाबा हड़बड़ा जाते, और हाथ उठा कर एक ही आशीष देते - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

उस आशीष में सुहाग से ज्यादा कुछ और अमर रहता था।

तुर्का बाबा अब नहीं रहे। उनका बेटा रज्जू है। जिसे पलारी का हर लड़का रज्जू भाई कहता है। वही रज्जू जिसे मास्टर जी ने पढ़ाया था, जो उनके लड़कों के साथ एक ही बेंच पर बैठता था। नेक, सीधा, मेहनती। 

इस बार पलारी के बालसमुंद मेले में मास्टर जी की मुलाकात रज्जू से हुई तो वह उदास था। 

"का होगे रज्जू? टोकनी कहां है?"

"धर दिया गुरुजी," रज्जू ने टोपी ठीक करते हुए कहा, "अब कुटेला से जुनवानी तक कोई बुलाता नहीं। शहर से प्लास्टिक की चूड़ी आ गई, और... और अब लोग टोकनी देख के दरवाजा बंद कर लेते हैं। कहते हैं, ये मनिहारी लोग... पता नहीं।"

मास्टर जी कुछ नहीं बोले। विगत कुछ वर्षों से हवा ही ऐसी हो गई है। वही पलारी जो सद्भावना की नगरी थी, जहां 1996 में पेंड्रारोड में नासिर खान साहब इत्र वाले के घर में किरायेदार बनना गर्व की बात थी, जहां बलौदाबाजार में एक मुस्लिम मैडम के घर में बेटे जैसा रखा गया, जहां ईद पर न जा पाने पर दूसरे दिन सुबह-सुबह सेवईं की टिफिन खुद चल कर आती थी - वहीं अब लोग एक-दूसरे को विदेशी कहने लगे हैं।

रज्जू ने कहा, "सोचा था मोबाइल के कवर की दुकान लगा लूं। पर अब्बा की वो बात याद आती है - चूरी अम्मर रहे। तो लगता है, कुछ तो अमर रहना चाहिए।"

उसी मेले में पीछे, जैतखाम के पास एक बुढ़िया बैठी थी - सोनमती। सतनामी बस्ती की। उसके बेटे अंजोर को भी मास्टर जी ने पढ़ाया था। सोनमती के हाथों में चूड़ियां नहीं थीं। सफेद कलाई।

सोनमती ने रज्जू को देखा तो आवाज दी, "अरे रज्जू! इधर आ।"

रज्जू गया। सोनमती ने अपनी बहू को आगे किया।

"पहना दे बेटा। गुरु घासीदास जयंती है कल।"

रज्जू झिझका, "चाची, मेरे पास तो... पुरानी कांच वाली ही हैं। अब कोई लेता नहीं।"

"तो हम का कोई हैं रज्जू? हम सतनामी हैं। हमरे यहां मनखे-मनखे एक समान। हमरे लिए तो कांच ही सोना है। पहना।"

रज्जू ने कांपते हाथों से चूड़ियां पहनाईं। वही खनक। वही आंगन जैसा दृश्य। पहनाने के बाद सोनमती की बहू ने झुक कर रज्जू के पैर छुए।

रज्जू की आंखें भर आईं। उसने वही आशीष दोहराया जो उसने अपने अब्बा से सीखा था - "चूरी अम्मर रहे बेटी।"

पास ही खड़े बाबू खान मुस्कुरा रहे थे। वही बाबू खान, पलारी की शान, जो पत्रकार हैं, और जिन्होंने गुरु घासीदास का जीवन-चरित लिखा है। एक मुसलमान का गुरु घासीदास पर लिखना - इससे बड़ी एकता और क्या होगी?

बाबू खान ने मास्टर जी से कहा, "देख रहे हैं मास्टर जी? जब हिन्दू के बड़े घरों ने दरवाजे बंद किए, तो सतनाम के घरों ने टोकनी के लिए आंगन खोल दिया। क्योंकि सतनाम ने कभी जात नहीं पूछी। और तुर्का ने कभी धर्म नहीं पूछा। दोनों का काम एक ही है - मनखे को जोड़ना।"

मास्टर जी समझ गए।

ये चूड़ी-मनिहारी मुसलमान, ये छुटपुट व्यवसायी, ये कोई बाहर के नहीं हैं। ये इसी मिट्टी के पौनी हैं। जब बाजार ने उन्हें बेकार किया, जब नफरत ने उन्हें अंतर्मुखी किया, तो उन्हें सहारा उसी पंथ में मिला जो खुद हिंदुत्व के समांतर, जातिविहीन, कर्म-प्रिय समाज बन कर खड़ा हुआ था - सतनाम पंथ में।

रज्जू अब हर गुरु पूर्णिमा पर सतनामी बस्ती जाता है। टोकनी लेकर। अंजोर उसकी टोकनी उठाने में मदद करता है। और जब कोई नई बहू चूड़ी पहनती है, तो पूरे बस्ती में वही पुरानी आवाज गूंजती है -

"चूरी अम्मर रहे।"

उस दिन मास्टर जी को लगा, चूड़ी का अमर रहना मतलब कांच का न टूटना नहीं है। चूड़ी का अमर रहना मतलब है, वो हाथ अमर रहे जिसने पहनाई, वो पैर छूने का भाव अमर रहे, वो आंगन अमर रहे जहां हिन्दू, मुस्लिम और सतनामी एक ही टोकनी के चारों ओर बैठते थे।

और जब तक यह आशीष बचा है, पलारी सचमुच सद्भावना की नगरी बची है।

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