Sunday, October 26, 2025

किस्सा बहराम चोट्टे का

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किस्सा बहराम चोट्टे का 

उक्त उपन्यास का लोकार्पण समारोह का आमंत्रण पत्र और शीर्षक देख मुझे "चरणदास चोर "स्मृत हुआ कि कही "महंत जुगुलदास गाथा" जैसा  छत्तीसगढ़िया रॉबिन हुड किरदार तो नहीं होगा? जिसे  नाचा गम्मत से लेकर हबीब साहब ने सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से अमर हुए पात्र को "चरणदास चोर" बनाकर  प्रतिष्ठित एवं सम्मानित कराया। एक तरह से उन्होंने नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी कला ,संस्कृति ,धर्म और मान्यता को वैश्विक मंच प्रदान किया। उसी चरणदास को पिताश्री के निर्देशन में  नवरंग नाट्य कला मंच 1975 से हम लोग भी करते रहे हैं। इस कारण भी बिलासपुर की अनिवार्य सा प्रवास को स्थगित कर कथानक के मोह वश भी जाना हुआ।

बहरहाल कार्यक्रम के उद्बोधनों में जाना कि यह तो एकदम से अलग पात्र हैं एक ऐसा बहराम जो लोगों को खूबसूरती से लूटते रहा / उनका हर चीज यहां तक विश्वास /मत चुराते रहे ,नेतृत्व करते रहा. पर वह अपना सा लगा और जाना भी तो चाहकर विद्रोह भी नहीं कर पाया।
    समीक्षक प्रथम वक्ता डॉ सुधीर शर्मा पते की बात कहे कि ऐसे बहराम अब छत्तीसगढ़ में लाखों की संख्या हैं। जो हर क्षेत्र में मौजूद हैं। सचमुच उपन्यास बिना पढ़े प्रासंगिक लगने लगा।

   आज़ादी के महज 10 साल बाद 1958 में मोहभंग से ऊपजे मनोदशा कथानक के रुप में ,पहले धारावाहिक  आया। उसके 4 साल बाद 1962 में  प्रकाशित " किस्सा बहराम चोट्टे का" संभवतः हिंदी के प्रथम हास्य व्यंग्य उपन्यास हैं जो "राग दरबारी "की पूर्व पीठिका सा हैं।
   उक्त उपन्यास के लेखक विश्वेन्द्र ठाकुर के  परिजनों ने 65 वर्ष बाद लगभग विस्मृत कर चुके और बमुश्किल लतीफ घोंघी जी के घर उनके सुपुत्र प्रो करीम साहब के सौजन्य से एक प्रति मिले । इस प्रसंग को महासमुंद से पधारे लेखक  शर्मा जी ने रोचक आपबीती बताते भावुक होते ऐसे बताए कि परिजन खो चुके पुस्तक की एक प्रति को दिवंगत "पिता के अस्थि कलश " प्राप्त करते हुए सा कंपकपी हाथों से धारण किए... खचाखच भरा विमतारा हाल भाव विह्वल हो उठे।
 उनके समकालीन वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव ने उपन्यास की एक पंक्ति सुनाते कहे कि बहराम किसी नदी  के बाढ़ की तरह बस्ती में चढ़ा जा रहा हैं। क्या विलक्षण उपमान हैं। ऐसा तो आजकल गांवों को निगलते अनेक भू माफिया और कॉर्पोरेट घराने के लोग सर्वत्र मिलने क्या दिखने लगे हैं। नव धनाढ्यों की बढ़ती बाढ़ से तबाह होते गांव और जनजीवन सहज ही द्रष्टव्य हैं।

इस महत्वपूर्ण उपन्यास को उनके सुपुत्र संकेत/ सरल ठाकुर एवं अन्य सभी मिलकर पुनर्प्रकाशित कर साहित्य जगत के लिए अप्रतिम व स्वागतेय कार्य किया हैं।
   सतलोकी लेखक विश्वेंद्र ठाकुर जी को विनम्र श्रद्धांजलि सहित परिजनों को बधाई कि उन्होंने मिलकर  पिताश्री की कृति और उन्हें चीर स्मरणीय बनाएं हैं। यह उपलब्धि हमारे छत्तीसगढ़ राज्य और कथानक क्षेत्र महासमुंद के लिए ही नहीं बल्कि हिंदी जगत के लिए गर्व का विषय हैं। अनेक साहित्यिक और स्वनाम धन्य लोगों के साथ मुझे आमंत्रित कर इस ऐतिहासिक  पल का साक्षी बनाने के लिए ठाकुर परिवार के प्रति आभार।

   जय हिंदी जय भारत 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, October 21, 2025

दीपावली

#anilbhattcg 

दीपावली की हार्दिक बधाई 

दीपावली का आशय अनेक दीपों की पंक्तियां हैं जिसे कतारबद्ध रखा गया हो।  ऐतिहासिक तथ्य यह है कि सम्राट अशोक अपने अधिकार वाले इस महादेश जिसकी सीमाएं सुदूर कंधार (गंधार)कजाकिस्तान से लेकर श्याम देश बाली सुमात्रा तक नेपाल से सिंहल द्वीप श्रीलंका तक 84 हजार बौद्ध स्तूप बनवाए और एक ही तिथि कार्तिक अमावस्या को इन स्तूपों में दीप प्रज्वलित करवाकर उद्घाटन कराए। 
  रामायण महाकाव्य के अनुसार भगवान राम वनवास से अयोध्या लौटे उनकी स्वागत में लोग अपने घरों में दीप जलाएं। 
पौराणिक वृतांत के अनुसार समुद्र मंथन में धनवंतरी और लक्ष्मी प्रगट हुई उनके स्वागत में दीप जलाएं।
      छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति का यह पावन पर्व हैं फसलों  के खासकर धान का घर, कोठी,खलिहान में आने उनके स्वागत में ग्राम देवताओं में दीप जलाने, रात्रि को पशु पालक भैंस के कोठे में सुअर, गाय के कोठे में मुर्गा कबूतर आदि के बलि चढ़ाने, मांस मदिरा पान कर सामूहिक नृत्य गान करते खुशियां मनाने का प्राकृतिक पर्व हैं ।
 रात्रि में गौरा गौरी विवाह उत्सव का भी आयोजन बड़ी धूमधाम से किए जाते हैं। इसके लिए सुवा नृत्य कर पंद्रह दिनों तक महिलाएं तैयारी करती हैं।प्रातः विसर्जन कर सुख संपदा की कामना की जाती हैं।

जब से मानव समाज में कृषि संस्कृति विकसित हुईं गांव बनाकर एक जगह बसाहट हुई  तब से यह प्रथा प्रचलन हैं। कालांतर में इस दिन लोग अपनी अपनी धर्म मत की कथा कहानियों को जोड़ दिए गए। फिर मूल बातें विस्तृत कर कथाओं को ही सच मानने लगे।

१सुरहुत्ती / देवारी= ग्राम देवताओं में दीप चढ़ना/ बलि देना 
 २गोवर्धन  पशुओ को खिचड़ी खिलाने कोठी में टीका देना धन की बढ़वार की कामना का पर्व।

३ मातर भूदेवी की पूजा लोग सामूहिक नृत्य गान करते गौठान में एकत्र होते हैं और खेल शौर्य का प्रदर्शन करते हैं। मातृका पूजन का अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलती है।
यह लोक पर्व हैं न कि शास्त्रीय पर्व।
व्यापारियों/ धार्मिकों/ ने इसे अपने अपने ढंग से व्याख्यायित कर इस लोक पर्व को अपना लिए हैं और उसी तरह प्रचार प्रसार करते हैं।
मुगलों ने बारूद से तोप पटाखे फोड़े कर परीक्षण किए आवाज से हर्ष प्रगट किए , बिजली आई तो रौशनी करने बल्बों की झालर बने। 
। पुष्य नक्षत्र में सोने चांदी  खरीदी हेतु शुभ मुहूर्त घोषित किए गए। बर्तन लेने धन तेरस गढ़े गए इस तरह अनेक चीजें जुड़ती गई। इस तरह यह दीपोत्सव देश का  महापर्व हो गया।
  
सबके अंत: करण में परिव्याप्त अज्ञान अभाव रुपी कष्ट कलुष कटे, सर्वत्र उजियारा फैले। मंगलकामनाएं ।

डॉ .अनिल भतपहरी/9617777514

फ़कत

आपके वास्ते छकड़ी हमरी
        "फ़कत"
खेल रेखाओं का नही
और न तक़दीर का है
भाग्य,भगवान-खुदा
न कोई पीर-फ़कीर का है
ये तो 0फ़कत आपके चुनाव
और उनकी ज़मीर का है...

बिंदास कहें- डा.अनिल भतपहरी

Friday, October 10, 2025

बीरन माला

Gopikrishnasoni Soni 
मुखड़ा 

रुप तोर मोहिनी मोर मन झाला हो मन झाला 
मैं तोर बर भेजव बीरन माला ओ बीरन माला...
मोरो मन भाए तय बतावव काला ग बतावव काला 
महु तोर भेजहु बीरन माला ग बीरन माला 

डोंगरी तीर म तितुर बोले ओ तितुर बोले 
तोर आरो ल पाके मोर मन डोले ओ बीरन माला 

सेमी के मड़वा  अबड गहिदे ग अबड गहिदे 
तोर बोली बचन म मोर अरिझे 


Sunday, October 5, 2025

गुनान गोष्ठी

#anilbhatpahari

छत्तीसगढ़ी साहित्यकार सम्मेलन म गुनान गोष्ठी

राज मिले २५ बछर होगे बड़ उछाह हे !
फेर इहां के भाषा,कला संस्कृति
अउ अस्मिता के संगे संग
जल जंगल जमीन ख़िरात हे!
छत्तीसगढ़ी गीत संगीत सनीमा संग
पठन पाठन लेखन म छत्तीसगढ़ नदात हे!
ये संसो कि खरही लेसत अउ कोठी के धान हेर
हमरे छानी म होरा भुजंत हमीं ल बिलेर मिझेर
अतेक मान देवन  कि उन ल डरान
चिटकोन नइये कोनो ल काही भान
का संत भूमि के रहैया संते कस संतई करत रही जाबोन
तियाग तपस्या करतेच रहिबोन कि कभू राजपाट पाबोंन
मंद माखुर के निशा पानी,देव धामी के पूजई आनी बानी
यहीच मोकाय बोकाय जम्मो जिनीस ल लुटाय नंगाय
का मुड़ी धर गुनत रहि जाबोन सरी जिनगी ल पहाबोन

कइसे कही कछु कहत नइअस ग सियान
चीटिक मने मन भंजा ले कब होही बिहान

   डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Friday, October 3, 2025

अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप

।।अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप।।

   सोशल मीडिया प्रायः पोस्ट/ पेस्ट/सर्च कर्ता ,लेखक एवं पाठक के मिजाज़ का अध्ययन कर उनके रुचि अनुरुप सामग्री पेश करते हैं ।इसलिए प्रायः हर व्यक्ति को यह माध्यम सम्मोहक लगता हैं। जितना वे जानते समझते हैं ,उसे और भी बेहतर करते हैं। इस कारण उनके मायाजाल में  लोग फंसते जा रहे हैं । 
     यह आपका  समय,संसाधन( डेटा)स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहे हैं। हालांकि खाली बैठे लोगो में बहस परिचर्चा कर टाइम पास के लिए भी यह बेहतर माध्यम हैं। शासन -प्रशासन  के लिए भी राहत की बात हैं कि बेरोजगारी भी बेरोजगारों के लिए  बोझ नहीं रहा ,बल्कि किसी के पास काम मांगना, हक अधिकार के लिए संघर्ष या हड़ताल आदि करना तो दूर ये सब करने के लिए समय ही नहीं हैं। 
बीवियों/बच्चों भी इसमें इतना इंवॉल्व हैं कि पतियों का जेब मोबाईल रिचार्ज कराने के सीमित खर्च में ठाठ से चल रहे हैं। अब फरमाइश पूरा करने की रोना धोना और टेंशन से मुक्ति सी ही हैं।
    बाहर हाल यह मीडिया विहीन लोगों के लिए वरदान जैसा हैं। हथेली में पकड़े मोबाइल और की बोर्ड में चलते अंगुली से कई कमाल भी हो रहे हैं। इसमें उपलब्ध फेसबुक, वाटशाप मैसेंजर जैसे सोसल मीडिया , रिल्स, इंस्टाग्राम, ट्यूटर, यूट्यूब इत्यादि लोगों तक पहुंचने अपनी बातें रखने और विविध कलाओं के प्रदर्शन से प्रसिद्धि पाने और रुपए कमाने तक का साधन बन चुके हैं। 
    एक अकेला मोबाईल मोबाईल रेडियो,टार्च, घड़ी पोस्ट,ऑफिस,चिट्ठी,पत्री,बैंक, और बाज़ार से हर वस्तु की खरीददारी या कोई और अन्य सेवा लेने का विश्वनीय माध्यम हो चुके हैं। भले मनुष्य का सार्वजनिक जीवन एकांतिक हो रहे हो, परन्तु मानव जीवन में "अनावश्यक रुप से आवश्यक हस्तक्षेप "हो गए हैं। 

कितने ही कह ले पर अब ,कोई नहीं रहा हैं सुन 
सोचा नहीं यह जीवन होंगे ,इनके बिन  सब सून 

डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Wednesday, October 1, 2025

सामाजिक/ राजनैतिक चेतना का 110 वा वर्ष

एक सौ दस वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की सामाजिक/ राजनैतिक चेतना

सतनामियों का गौरक्षा आंदोलन सर्वप्रथम 1915 में राजमहंत नयन दास महिलाँग और गुरु गोसाई अगमदास साहेब के नेतृत्व में आरम्भ हुआ. यह आंदोलन इतना उग्र और प्रखर था कि जिस सत्ता की सूर्य नहीं डूबती उस ब्रिटिश हुकूमत की चूले हिल गई.उनकी दो बड़े बुचड़ खाने करमन डीह और ढाबाडीह बंद हो गये जहाँ से सेना के लिए मांस और चमड़े की आपूर्ति होती थी. कृषको के लाखों पशुधन कटने से बच गये.
   आंदोलन और उनकी सफलता  से देश भर में खलभली मच गई. कलांतर मे तीन बातें घटी- 

1 हिन्दू महासभा वालों ने सतनामियों का सम्मान किया और हिन्दू सतनामी महासभा का गठन कर सतनामियों का हिन्दुकरण करने की दिशा मे अनेक कार्यक्रम आरम्भ हो गए.

 2. महात्मा गाँधी का सतनामियों के बीच आगमन और स्वतंत्रता आंदोलन के  साथ  कांग्रेस से जुड़ाव.
 
  3.1924 में डॉ अम्बेडकर का इंग्लैंड से वापसी और उनका सामाजिक क्रन्तिकारी कार्य और उनके प्रतीकार हेतु  1925 में आर एस एस का अभ्युदय इतिहास का महत्वपूर्ण घटना हैं.
110वर्ष के इस काल खंड पर विचार विमर्श होनी चाहिए.

डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514