Monday, December 9, 2019

गुरु अगमदास गोसाई

🙏जगत गुरु अगमदास जी🙏

जीवन परिचय- गुरू घासीदास बाबा जी से गुरू आगरदास (तृतीयपुत्र) श्री गुरूआगरदास से गुरू अगरमन दास, श्री गुरू अगरमनदास जी व कनुका माता से चौथा वंशज गुरू अगमदास जी का जन्म ग्राम तेलासी में सन् 1895 को हुआ था । गुरूगोसाई अगमदास जी का जीवन चरित्र समस्त मानव समाज के लिए प्रेरणादायी है। गुरूगोसाई का प्रथम विवाह पूर्णिमामाता 1915, द्वितियविवाह सुमरितमाता 1927,तृतीय विवाह ममतामयी मिनीमाता 1932 व चतुर्थ विवाह रतिराम मालगुजार की सुपुत्री करूणामाता के साथ 1935 में हुआ था। गुरूगोसाई ने चार विवाह वंश विस्तार समस्या (पुर्व पत्नीयों के निसंतान होने )के चलते किया। काफी लंबे समय के अंतराल के बाद सतपुरूष गुरू घासीदास बाबा के असीम कृपा आशीर्वाद के फलस्वरूप गुरूगोसाई अगमदासजी व राज राजेश्वरी करूणामाता के गोद में सत्यांश का विजयगुरू उर्फ अग्रनामदास जी के रूप में इस धरती में अवतरण हुआ।

सामाजिक कार्यो में सहयोग - गुरू अगमदास जी अपनें पिता श्री गुरू अगरमनदास जी के सामाजिक राजनैतिक व समाजोत्थान के कार्यो में सहयोग के साथ ही समकालिन ब्रिटिश शासन, तथा सामंतवादियों के जुल्म अत्याचार के खिलाफ सतनामी समाज के युवाओं को जोड़कर सतनामी सेना को मजबुती प्रदान किया गया। एवं अपनें पिता के निर्देशानुसार समाज के योग्य मेहनती व विवेकी लोगों की सुचीबद्व विवरण तैयार कर 108 मंहतों की नियुक्ति प्रदान कर उन्हे सामाजिक व्यवस्था संचालन व कर्तव्य पद पालन की जिम्मेदारी दिया गया। साथ ही कण्ठी जनेऊ और चंदन तिलक सतनामियों की पहचान है,सफेद झण्डा समाज की शान है को गुरूगोसाई अगमदास जी ने चरितार्थ किया।

समाज संचालन व राऊटी -  गुरू अगरमनदास जी की सतलोक गमन के पश्चात समाज संचालन/पथप्रर्दशन की संपूर्ण जिम्मेदारी जुलाई 1923 से गुरू अगमदास जी के उपर आ गया। गुरूगोसाई अगमदास जी पदग्रहण के बाद ही भण्डारपुरी में सतनामी समाज के राजमंहतो भण्डारीयों, छड़ीदारो, राजनैतिक, सामाजिक कार्यकताओं के साथ सभी सतनामधर्म के अनुयायीयों की विशाल आमसभा का आयोजन कर पूर्व गुरूओं के अधुरे सभी कार्यो को पुरा करनें के अलावा समाज के विकास हेतु अनेको निर्णय लिए गये। कुछ दिन बाद राऊटी में गुरूगोसाई अगमदास जी ममतामयी मिनीमाता को साथ लेकर समाज को संगठित करनें सफेद ध्वजा अपने गाड़ी में बांधकर सभी राजमंहत प्रमुख रूप से राजमंहत रतिराम, दिवान नरभूवनलाल, भूजबलमंहत, भण्डारीयों, छड़ीदारो, राजनैतिक, सामाजिक कार्यकताओं को साथ लेकर राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यदशा सुधार करनें, शासन प्रशासन से सभी स्तर पर अधिकार पाने व दिलाने का संवैधानिक कार्य किया गया।

गौहत्या बंद व कानपुर में गुरूगोसाई सम्मान - गुरूघासीदास बाबा जी के जीवन आदर्शों को आत्मसात कर गुरू अगमदासजी ने सतनाम धर्म के व्यापक विस्तार एवं कुरितियों के दमन करनें में अभूतपूर्व योगदान दिया, गुरू अगमदास जी अपने साथ नई नियुक्ति हुए राजमंहत नयनदास सहित 108 मंहतों को लेकर गोहत्या कर रहे अंग्रेज शासन के विरूद्व जनआंदोलन किया तथा कोर्ट में केस दायर किए गया, विरोध को दबाने की मंशा से अंग्रेजी शासन के द्वारा राजमंहत नयनदास सहित अनेको गौ भक्तों को जेल में बंद कर दिये। इसके पश्चात सतनामी समाज और उग्र  करनें लगा,लम्बी पेशी चलने के बाद केस को जीत गया और आदेश लिखा लिया कि जहा जहा पर सतनामी समाज के लोगों का निवास स्थान है, वहा कोई कसाई खाना नही होगा। इस प्रस्ताव को अंग्रेज शासन नें सन् 1922 में स्वीकार किया। उसके बाद भी कलकत्ता के बुचड़खाना संचालको के द्वारा बलौदाबाजार तहसील के ग्राम करमण्डीह व ढाबाडीह में कसाईखाना खोल रखा था इन कसाईखानों में रोजाना हजारो की सख्या में गौवध किया जाता था जिसका गुरू अगमदास जी ने पुरजोर विरोध कर बुचड़खानों को हमेशा के लिए बंद करवाया। सन् 1924 को कानपुर में आयोजित कांग्रेस राष्टीय महासभा में देश के महानतम विभूतियो पंडित मदनमोहन मालवीय,लाला लाजपतराय,मोतिलाल नेहरू,डाॅ. मूजय ने गुरू अगमदास जी का सम्मान कर जनेऊ भेट कर गुरूगोसाई नाम से अलंकृत कर गुरूगोसाई अगमदास को केवल सतनामधर्म ही नही वरण सभी वर्ग के लोगो का गुरूगोसाई, समाज सुधारक व गौ माता का सच्चा सपूत कहा जाता है।

सतनामी जाति की मान्यता - गुरू अगमदास जी ने ही सतनामी समाज से संबधित सज्जनों को सतनामी नाम से सम्मान पुर्वक संबोधन,जानने,पहचान हेतु सी.पी.बरार तत्कालीन के गर्वनर को सन् 1924 पत्र लिखा था जिसे गर्वनर स्वीकार करते हुए 1926 में सतनामी जाति / सतनाम समुदाय के मान्यता पर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया तथा कानूनी वैधता मिलने से सतनाम धर्म के मानने वाले लोगों को अपनी जाति सतनामी नाम का पहचान मिला। गुरूगोसाई अगमदास जी के द्वारा सवैधानिक रूप से कराये गये कार्यो में यह कार्य समाज को एक सुत्र में बाधने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ।

मान. सांसद की उपाधी - गुरूगोसाई अगमदास जी गुरू घासीदास बाबा जी के बतलाये हुए विचारो का अनुशरण करते हुए सत्य, दया, धर्म, करुणा,प्रेम परोपकारी गुण के साथ स्वाभीमान की भाव को बनाये रखा, छत्तीसगढ़ सहित पुरे मघ्य भारत में गुरूगोसाई की ख्यााति एक प्रखर आंदोलनकारी,समाजसुधारक के रूप में फैली। 1923 में अंग्रेज शासन के खिलाफ झण्डा सत्याग्रह आंदोलन नागपुर में पं.सुन्दरलालषर्मा, पं.रविशंकर शुक्ल व ठाकुर प्यारेलालसिह के साथ संयुक्त नेतृत्व किया। गुरू अगमदास जी सर्वसमाज को साथ लेकर जनजागृति व सामाजिक समानता की स्थापना हेतु राष्ट्रीय स्तर पर जन आंदोलन कर अपने सतनाम उद्देश्य योजना में सफलता हाषिल किया। तत्कालिन ब्रिटिश षासन गुरूगोसाई के नेतृत्व क्षमता व उत्कृष्ट प्रदर्शन तथा लोगो का अपार जनसमर्थन देख सन् 1925 में सी.पी. बरार कौशिल के अंग्रेज शासन काल में मान. सांसद की उपाधी प्रदान किया। गुरू बालकदास जी को राजा की उपाधी के बाद ब्रिटिश शासन काल में ही गुरू अगमदास जी को मान. सांसद की उपाधी मिलना सतनामधर्म के अनुयायीओं के लिए ऐतिहासिक पल रहा।

मानवकल्याण - गुरूगोसाई अगमदास जी ने अपंग,अनाथ बेसहारा, महिला और बच्चों के कल्याण हेतु निज खर्चो से अनेको आश्रम, सेवाकेन्द्रो की स्थापना कर उनकी भोजन, कपड़ा, शिक्षा, आवास के अन्य बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध करवाया। इसके साथ ही सन् 1924 से लेकर 1938 तक देश की स्वतंत्रता, सामंति शोषण का विरोध व औद्यौगिक श्रमिकों के हित के लिए छत्तीसगढ़ मध्यप्रांत के अलावा पुरे देश भर में चल रहे द्वितीय,तृतीय किसानों श्रमिको व मजदूरों के आंदोलनो में भाग लेकर आंदोलन को मुखर नेतृत्व दिया । उस समय काल में विविध वर्गो के आंदोलनकारियो जिनमे प्रमुख रूप से श्रमिक व सहकारिता के सुत्रधार ठाकुरसाहब, पं.सुंदरलाल शर्मा, बाबू छोटेलाल,नत्थूराम (धमतरी), नरसिंहअग्रवाल, सरयूप्रसाद अग्रवाल, वासुदेव देशमुख, पं.रत्नाकर झा (दुर्ग) सहित अनेको नेतृत्वकर्ताओ के साथ किसानो का लगातार प्रर्दशन व धरना का लाभ यह हुआ कि शासन ने ग्रामिणों के निस्तारी अधिकार को एक सीमा में स्वीकार किया और इस संबध में कानून निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ हुई व आगे चलकर निस्तार नियम बनाए गये।

सामाजिक संविधान का विस्तार - गुरूगोसाई अगमदास जी ने बलिदानी राजागुरू बालक दास जी के द्वारा बनाये सामाजिक नियमों /सतनामधर्म के संविधान को पुनः विस्तार करते हुए मानव समाज के सर्वागीण विकास हेतु सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक, शिक्षा,स्वालम्बी,न्याय व्यवस्था,जातिमिलावा सहित अन्य जन कल्याण कार्यो के पालन /संचालन का विस्तार किया। जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सतनामी समाज के द्वारा अंगीकार कर सभी क्षेत्रो में विकास की गाथा सतनामी समाज के साथ ही सर्वसमाज के लिए आज भी पथ प्रदर्शक है, जो संक्षिप्त सात सुत्र निम्न है-

1.सामाजिक नियम - परम पुज्य गुरू घासीदास बाबा जी के सतनाम धर्म के राह पर चलना,बाबा जी के जीवनचरित्र, संदेश, विचार,वाणी का जीवन में अनुशरण कर गुरू प्रधान सतानामी समाज के मुलमंत्र “मनखे मनखे एक समान व सत्य ही मानव का आभूषण है“ को चिरकाल तक अस्त्वि में बनाये रखना प्रत्येक सतनामधर्म के अनुयायियों की जिम्मेदारी है, क्योकि सतपुरष के विधाननुसार समाज में कोई वर्ण व्यवस्था नही है, गुरू बाबा घासीदास जी के प्रति आस्था तथा सतनामधर्म को तन,मन व कर्म पूर्वक जीवन में अपनाने वाले कोई भी जाति/धर्म के लोग सतनामी समाज में शामिल किया जा सकता है। लोग अपने स्वार्थ के चलते उच्च-निच छोटा-बड़ा का भेदभाव बनाये है।
2.आर्थिक - समाज के लोगो को मुल रूप से खेती के साथ बखरी,बाग,बगीचा,गौपालन व व्यपार कर स्वालम्बी बने,अनावशयक खर्च न करे, छोटी छोटी बचत करने तथा व्यपार व्यवसाय करने से आपकी अर्थ व्यवस्था में सुधार आयेगा। अर्थ व्यवस्था की मजबूती से दैनिक जीवन में सभी जरूरत की आवश्यक है वस्तु, पदार्थ, मकान,जमीन आदि के पुर्ती में आसानी होगी। समाज के संपन्न लोगों को जरूरतमंद गरीब, दीन-दुखियो,लाचार-बिमार तथा अपंगों की तन मन व धन से मदद करे जिससे परिवार व समाज विकास में आपका महत्वपूर्ण भूमिका का सम्मान सदैव बना रहेगा। क्योकि बिना अर्थ मजबुती के लोग / समाज की सेवा करने अथवा जीवन जीनें में अनेको कठिनाईयो का सामना करना पड़ता है।
3.राजनैतिक - सतनामी अपनी गुरू,समाज,और धर्म के प्रति अटूट श्रद्वा के कारण ही समय कालीन शासको के गलत नियमो के खिलाॅफत,मानव व पशुओं पर जूल्म अत्याचार तथा अपने स्वाभिमान की रक्षा के साथ अपने संवैधानिक अधिकारो को पाने के लिए राजनिति में सहभागिता लेना अति आवश्यक है। क्योकि संवैधानिक कई मानव अधिकारो की प्राप्ति हमें धर्मगुरूओं के कुशल राजनिति नेतृत्व के चलते मिला है। समाज के सार्वजनिक विकास हुए तथा अधिक से अधिक लोग राजनिति के चलतें अनेको उच्चे पदों पर निर्वाचित / मनोनित हुए। बिना किसी को नुकसान पहुुचाये समाज व देशहीत में राजनैतिक जीवन से समाज के साथ क्षेत्र व देष का चहुमुखी विकास होता है।
4.धार्मिक,सांस्कृतिक व नैतिक - भारतवर्ष धर्मो का भण्डार है, जिसमे हिन्दू सनातन, इस्लाम, सिख, बौद्व जैन, इसाई व सतनामधर्म प्रमुख है, सब धर्मो में अलग अलग संस्कृति का समावेश है,जिसमें अर्थ,धर्म,कर्म व मोक्ष का प्रमुख स्थान है। इन्ही में सतनामधर्म जो कि हिन्दू धर्म में ( संविधान के आरक्षण का अधिकार नियम के चलते ) समाहित होने के बावजूद अपना स्वतंत्र वजूद है, सतनामधर्म एक जाति या समुदाय के लिए नही वरण समस्त मानव व प्राणी जीव जगत के लिए है जिसका.धार्मिक,सांस्कृतिक व नैतिक नियम कल्याणकारी सादा जीवन उच्चविचार के है सतनामधर्म सभी धर्मो का सार है। गुरू घासीदास बाबा जी के समय से लेकर वर्तमान समयकाल के सभी गुरू वंशजों के जीवनी सदेंश,विचार व किये गये कार्यो से मिली सतनाम संस्कृति - सत्य, प्रेम, सौहाद्र, अहिंसा, समानता, दया व उदारता जैसे मानवीय गुणों से परिपूर्ण है। जिसमे सतनाम सांस्कृतिक विरासत,पवित्र जैतखाम, विशाल गुरूद्वारा, गुरूदर्शनन मेला, सुख-दुख जीवन के रिति-रिवाज, व्यक्तिगत व सामाजिक नियम, पंथी गीत, नृत्य, व्रत, गुरूपर्वो, त्योहारों व मेलों की परंपरा है जो अनवरत पूरे वर्ष चलती रहती है, गुरूगद्वीनसीन गुरूद्वारा सतनामी समाज की सामाजिक,धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों के मुल केन्द्र है जो सतनामधर्म के अनुयायियों में आस्था व विश्वाश का प्रतिक है। सतनाम के धरोहरो को समृद्व करनें की नैतिक जिम्मेदारी प्रत्येक सतनामी समाज जनों की है।
5.शिक्षा - सामंतवादी वर्ण व्यवस्था,जमीदारी प्रथा के चलते समाज के अधिकांश लोग शिक्षा से वंचित देख जगतगुरू अगमदास जी नें समाज के विकास व अधिकार की प्राप्ति के लिए शिक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण बतलाया तथा जगतगुरू जी तत्कालिन ब्रिटिश शासन व कांग्रेस संगठन को पत्राचार कर देश भर के संचालित शिक्षण संस्थानों में समाज के सभी बालक,बालिका व युवाओं को शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रयास किया एवं अंग्रेजी हुकुमत से अनुमति मिलने पर समाज जनों तक संदेश पहुचाने जन जागरूकता अभियान चलाया। शहरो में अच्छी शिक्षा के लिए सुदुर अंचल में रहने वाले गांव के सामाजिक बच्चों को आश्रमो/अपने निवास में आश्रय प्रदान कर समाज को शिक्षित किया। क्योकि शिक्षा प्राप्ति से समाज के लोगों की प्राकृतिक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक जीवन में सुधार व समृद्वि तथा योगयतानुसार निजि या शासन के विभिन्न पदो/अधिकार को प्राप्त कर सकते है। सतनामी समाज के शिक्षा नियम में मातापिता - सतनाम संस्कार, शिक्षक- अध्यापन बौधिक विकास व धर्मगुरू - जीवन का महत्व व कर्तव्य का बोध कराता है।
6.स्वालम्बन - समाज के लोगो को अपनी यहा उपलब्ध संसाधनो व वित्तीय वयवस्था के अनुसार कृषि, बाड़ी, फुलवारी, व्यवसाय, तकनिकी कार्य, लघु या कुटीर उघोग लगाने के साथ ही गौ पालन के कार्य को करने कहा गया जिससे समाज में स्वालम्बन आये व धन कमाने के साथ ही समाज के साथ अन्य लोगो को भी रोजगार मिल सकेगा। जगतगुरू अगमदासजी के बतलाये स्वरोजगार के मार्ग पर चलते हुए सतनामी समाज के लोग देखते ही देखते अपनी हिम्मत व मेहनत से सैकड़ो एकड़ कृषि जमीन के मालिक व बड़ी सख्या में मालगुजार बन गये थे । समाज जन अपना योग्यता व क्षमतानुसार शासन के योजनाओं का लाभ लेते हुए छोटी बड़ी परियोजनाओं का सफल संचालन से श्रेष्ठ कार्य कुशलता का प्रर्दषन कर धन व सम्मान अर्जित कर सकता है।
7. न्याय व्यवस्था - जगतगुरू अगमदास जी भारत के संविधान निर्माण समिति के अहम सदस्य थे। राष्ट्रीय स्तर से लेकर अतिंम छोर में बसे गाव स्तर के समाजिक न्यायायिक कार्य हेतु गुरू गदद्वीनसीन जगतगुरू अगमदास जी नें सतनामी समाज के लिए भी सामाजिक लोगो के जाने / अंजाने सभी प्रकार के निजि, पारीवारिक, सामाजिक, आर्थिक, परीस्थैतिक, अपराध, प्रसशनीय कार्य सहित अन्य समस्याओं के समाधान,दण्ड,माफी व पुरस्कार हेतु ग्राम स्तर पर समाज, पंचकमेटी, छड़ीदार व भण्डारी /अठगंवा स्तर पर समाज,पंचकमेटी,छड़ीदार भण्डारी व मंहत / जिला स्तर पर समाज पंचकमेंटी, छड़ीदार, भण्डारी,मंहत व जिलामंहत /राजस्तर पर समाज पंचकमेंटी,छड़ीदार, भण्डारी, मंहत,जिलामंहत व राजमंहत आदि की नियुक्ति किया तथा न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ कर पिडि़त को न्याय दिलाने तथा अपराध को रोकने निति बनाई गई। ग्राम,अठगंवा,जिला,राज्य व राष्ट्रीय स्तर के बैठको या सभा पर किसी भी पक्ष या विपक्ष के समस्या/ समाधान / फैसला पर विवाद या संतुष्टी नही होने की स्थिति में जगतगुरू गुरूगद्द्वीनसीन सतनामी समाज के द्वारा दिये जाने वाले निर्णय अतिंम व सर्वमान्य होगा।

गिरौदपुरीधाम में गुरूदर्शन मेला का शुभारंभ (सन्1935) - जगतगुरू अगमदास जी सतनामधर्म व सतनामी समाज के पुज्यनीय प्रथम प्रणेता गुरू घासीदास बाबा जी के वाणी,विचार,संदेश तप,सतकार्यो व संतजीवन की यषकिर्ती को संसार में प्रकाशवान करने, गुरूदर्शन का लाभ मिले साथ ही सामाजिक,धार्मिक व संस्कृति प्रचार प्रसार हो समाज के लोगों में सतनाम संस्कार का संचार हो तथा समाज में एकता सदैव बना रहे,जगतगुरू अगमदास जी ने पावन तपोभूमि गिरौदपुरीधाम में सन् 1935 को गुरूदर्शन मेंला का शुभारंभ किया। गुरूदर्शन मेंला कार्यक्रम में सभी राजमंहतो के साथ सतनामधर्म के समाज जनों ने हजारो की सख्या शामिल होकर सतनामधर्म के ऐतिहासिक पल के साक्षी बने।

गिरौदपुरीधाम का विकास में जगतगुरू के योगदान - गिरौदपुरीधाम का मेंला का संचालन गुरूगद्द्वीनसीन, गुरू घासीदास बाबा जी के चौथा वंशज उत्तराधिकारी जगतगुरू अगमदास जी ने सन् 1935 से 1952 तक किया तत्पश्चात ममतामयी मिनीमाता व राजराजेष्वरी करूणा माता संयुक्त रूप से सन् 1960 तक गुरूदर्शन मेंला में संतो की बढ़ती हुई सख्या को देखते हुए उनके लिए समुचित व्यवस्था जैसे पानी, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य,आवास आदि मुलभूत सुविधाओं को लेकर 1976 में गुरू व राजमहंतो एवं समाज के द्वारा मेंला में शासन की सहयोग की आवश्यकता महसूस की गई। तत्कालीन म.प्र.शासन के द्वारा समाज के आग्रह को स्वीकार करने के पश्चात राज्यपाल के आदेशानुसार सन् 1976 में ही  गुरू घासीदास मेंला व्यवस्था समिति का गठन कर लिया गया। समिति में राजमंहतो व सर्ववर्गीय सदस्यों की नियुक्ति की गई।समिति का सयोंजक कलेक्टर, नामिनि स्थानीय अधिकारी को बनाया गया। आज वर्तमान में गुरू  घासीदास बाबा जी के चौथा वंशज गुरूगोसाई अगमदास जी के सुपुत्र जगतगुरू विजयकुमार जी मेंला समिति के अध्यक्ष है। जिनके मार्गदर्शन में गिरौदपुरीधाम का मेंला निरंतर व्यवस्थित व विकास की ओर आगे बढ़ते अग्रसर है।

अगमधाम खडुवापुरी का निर्माण - जगतगुरू अगमदास जी सतनामी समाज /सतनामधर्म के विकास हेतु चारों दिशाओं में राऊटी दौरा करने से सतनाम धर्म पर जनमानस का विश्वाश को जीतने में अधिक सफलता पायी और अन्य समुदाय के लोगो का झुकाव सतनामधर्म में बिना किसी भेदभाव के साथ हुआ। जगतगुरू अगमदास जी ने सन् 1925 / 1937 में खडुवा ग्राम को खरीदा और क्वार दषमी के रोज संतसमाज की मौजूदगी में गुरूदर्शन मेंला लगाकर सतनाम धर्म के विधि -विधान अनुसार पवित्र जैतखाम गड़ाकर गुरूगद्वी स्थल का निर्माण किया गया। तब से लेकर आज भी प्रतिवर्ष विजयदषमी के दिन गुरूगद्वी स्थल अगमधाम खडुवापुरी में तीन द्विवसीय गुरूदर्शन झाकी, गुुरूगद्वीस्थल, समाधीस्थल, गुरूद्वारा के साथ में जगतगुरू विजयकुमार जी, जगतगुरू रूद्रकुमार जी, अपने लाखो संतो को दर्शन व आशीष प्रदान करते है। और अपार जनसमूह को गुरू उपदेश सतनाम वाणी से जगत के संतों को जीवन व कर्तव्य पालन का बोध कराते है।

जगतगुरू की उपाधी सन् 1935 - हिन्दू समाज के माथे पर लगा अस्पृष्यता का कलंख को धोने व एकता को बचाने महात्मागांधी के द्वारा पूरे भारत भर में लगातार नौ महिने का दौरा करने के बाद भी धर्मातरण के सर्मथन व विरोध करने वालों का दो गुट बन गया एक गुट दलित महार समुदाय के डाॅ.बी.आर.अम्बेडकर येवला अमहदाबाद के सम्मेलन अक्टूबर 1935 में करीब 7 हजार दलितमहार को साथ लेकर बौद्वधर्म में धर्मातरण कर लिया। जबकि दुसरा गुट सतनामी समाज सतनाम धर्म के जगतगुरू अगमदास जी सतनाम धर्म के अधीन  संवैधानिक,सामाजिक,आर्थिक, एवं राजनैतिक क्षेत्रो में सतनाम धर्म व समाज का वर्ग आरक्षण लाभ, विकास हेतु हिन्दूधर्म में यथावत रहे,धर्मांतरण नही किये जगतगुरू के द्वारा लिए गये फैसले का सतनाम धर्म के अलावा अन्य धर्म के लाखो लोगो द्वारा समर्थन/स्वीकारिता की चलते हिन्दूधर्म के लोगों का धर्मान्तरण / हिन्दूधर्म का विभाजन रूका। उक्त कार्य के लिए हिन्दू महासभा द्वारा महाराष्ट्र में 18 दिसंबर 1935 गुरूगोसाई अगमदास जी को हिन्दूधर्म के सर्वोच्च पदवी जगतगुरू की उपाधी से नवाजा गया।

संविधान निर्माण समिति के सदस्य 1947- जगतगुरू अगमदास जी के राष्टीय कृषक आंदोलन,नशामुक्ति,मानवउत्थान,
स्वदेशी और स्वतंत्रता के आंदोलन में सहभागिता तथा समाज में व्यापत रूढिवाद, अंधविस्वास, अस्पृष्यता, कुरीतियां, गौवध बंद कराना, मानव समाज का विकास व भेदभाव को दुर करने में किया। जगतगुरू अगमदास जी को जुलाई 1947 को कांग्रेस के सर्मथन से भारत के संविधान निर्माण समिति में शामिल किया गया। जगतगुरू नें समाज के सभी मौलिक व संवैधानिक अधिकार पर के नियम कानून बनवाया जिससे सभी समाज के लोगो को विना किसी भेदभाव के शिक्षा, नौकरी,स्वरोजगार व न्याय मिले तथा सम्मान के साथ जीवनयापन कर सके।

स्वतंत्र भारत के प्रथम चुनाव 1951 में निर्वाचित सांसद - जगतगुरू अगमदास जी स्वतंत्र भारत के प्रथम आम लोक सभा चुनाव में मध्यप्रदेश राज्य के बिलासपुर दुर्ग रायपुर सामान्य सीट से चुनाव लड़कर लोकसभा क्रमांक 3 से कांग्रेस पार्टी से निर्वाचित होकर 1951 में सांसद बने। शासन से समन्वय बनाकर समाज के लोगो का निजि व सार्वजनिक जीवन को मुल विकास की धारा में जोड़ने अनेको लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रस्तावित/समर्थन कर नियम बनवाया।

जगतगुरू अगमदास जी सत में विलिन होना - गुरू गोसाई अपना सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा व मानव उत्थान में लगा दिया। जगतगुरू जीवन भर सतनामी समाज के लोगो को सामाजिक, राजनैतिक व शासन-प्रशासन से सभी दर्जो पर अधिकार को पाने व दिलाने के लिए लगे रहे,सन् 1952 में जगतगुरू गोसाई अगमदास जी सत में विलिन हो गया। जगतगुरू की सत में विलिन होने की खबर पाते ही पूरा मानव समाज शोकमय हो गया। जगतगुरू अपने पीछे सत्यांषु युवराज जगतगुरू विजयकुमार (पुत्र) ममतामयी मिनिमाता व राजराजेशवरी करूणामाता (दोनो पत्नि) के साथ विशाल सतनामी समाज के अनुयायियों को छोड़ चला गया। जगतगुरू अगमदास जी द्वारा राज्य की उन्नति,जगतकल्याण,सामाजिक आंदोलनो के नेतृत्वकर्ता और सतनाम धर्म को अजर अमर बनाने तथा राष्टीय कृषक आंदोलन, नशामुक्ति, दलित उत्थान, स्वदेशी और स्वतंत्रता के आंदोलन में सहभागिता तथा समाज में व्यापत रूढिवाद, अंधविस्वास, अस्पृष्यता, कुरीतियां, गौवध बंद कराना व भेदभाव को दुर करने में किया गये प्रयास एवं लाखो लोगो द्वारा आपके नेतृत्व की स्वीकारिता के चलते के चारो दिशा में आपका कार्य प्रयास अनंतकाल तक याद किये जायेगे।

सत-सत नमन💐साहेब गुरु सतनाम🙏
स्रोत www.gagatgurusatnamdharm.com
सनत सतनामी,सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद।

नई सोच नई उमंग

"नई सोच नई  उमंग"

प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी जयंती हर्षोल्लास पूर्वक मनाएन्गे और रात्रि ४० कलाकारों से सजे -धजे सुप्रसिद्ध छालीवुड एएचआर्केस्ट्रा का आयोजन होगा।
       मुख्य अतिथितत्व के लिए मंत्री को लाने  की तैयारी जोरों से  चल रहा है। और लगभग पूरी समिति आयोजन को सफल बनाने में लगे हुए हैं।
    बस आप जैसे समाज के महत्वपूर्ण लोगों से सहयोग की अपेक्षा हैं। चंदा लेने आए दल के मुखिया बिना सांस रोके बोल गये।
     सभी आगंतुकों के जल ग्रहण करने के उपरान्त
     सौंप -ईलायची  परोसते वे विनम्रता से कहने लगे - " अच्छी बात हैं आयोजन हो पर वह ज्ञान -वर्धक और प्रेरणीय हो तभी  सार्थकता हैं। इस तरह ये नाच पेखन क्या धन और समय की बर्बादी नहीं हैं?"
      नाच वाली कार्यक्रम में भी प्रेरक नाटक  व प्रहसन मंचित किए जाते हैं।
      " सो तो है  ,पर  अधिकतर द्विअर्थी बोल युक्त गाने तेज रोशनी में फूहड़ नृत्यादि एक महान प्रर्वतक के जन्मोत्सव में शोभा नहीं देता।"
थोड़ी दृढ़ता से वे कहें। पर उनसे  लाउड और लगभग धमकाते  उनमें से एक ने कहें - साफ कहो चंदा नहीं देन्गे ? यदि ऐसा हैं सोच लो !चार का निर्णय हैं नहीं मानोगे तो सामाजिक बहिष्कार झेलेने होन्गे!
  गैर लोग भी उत्साह पूर्वक  चंदे दे रहे हैं बल्कि कौन कौन से नाच होन्गे यह सुझाव भी दे रहे हैं।
    वे तो कहेन्गे और एक के जगह दस देन्गे ।क्योकि ऐसा करके गुरु के संदेश  को डायवर्ट करेन्गे और समाज की उच्च संस्कृति को भी विकृत करेन्गे ।
   अच्छा  सब जगह हो रहे हैं क्या उनको रोक सकते हैं? नही न तो यहाँ क्यो?  फिर चलो समाज सुधारने मै स्वयं आपके साथ चलता हूं। कहते एकदम से उठ खड़ा कहे लगभग हाथ पकड़ खीचते कहा - चलो चले !
  हतप्रभ सा उसने  कहां - "भई  जब जगों तब सबेरा !दूसरों को रोकने से  पहले अपना  तो रोक लो,यदि ऐसा हुआ तो उदाहण बनेन्गे । एक सदी बीत ग ई नाच पेखन करते और उनमें लाखो - करोड़ों गाढ़ी कमाई फूंकते । उसे बचाओं और समाज हित में उनका उपयोग करों। भाषण देते सा कहते हाथ लहराने लगे ।
      कुछ लोगों को  बातें समझ में  आई और वहीं तय हुआ कि इस बार विशुद्ध धार्मिक कार्यक्रम भजन- कीर्तन' व  संगत -पंगत ही होन्गे।  शेष पैसे बैंक खाते में जमा करेन्गे। और उनका रचनात्मक कार्य करेन्गे ।
    कुछ महत्त्वाकांक्षी छुटभैय्ये नेता टाईप  लोग खुसुर- पुसुर करते कहने लगे कि मुख्य अतिथि हेतु मंत्री महोदय ... बीच में उनके साथी बात फाकते कहे - अरे भजन- कीर्तन सुनने लोग थोड़े आएन्गे? और मंत्री क्या खुर्सी टेबल को भाषण सुनाएन्गे ?
         मतलब भीड़ एकत्र करने  के लिए नाच पेखन एक प्रयोजन हैं। और इसीलिए इनके लिए अनुदान व सिफारिशें होने लगे हैं।
     अरे भई सांस्कृतिक कार्यक्रम सरकारी अनुदान में आ रहे।वह भी गंवारा नहीं ... चलों भाई ।एक के कहने से हमारी वर्षों की परंपरा नही बदल सकती। ४-५ अलग हो लिए!
       सरकारी अनुदान तो किसी दूसरे काम को मिलना चाहिए। ये नाचा -पेखन को अनुदान जो कला संस्कृति के नाम पर  समाज में प्रदूषण फैला रहे हैं। और समाज इतना कृपण कि अपने मनोरंजन के लिए भी अनुदान मांगते फिरे।
             आयोजकों की स्थिति बड़ी विचित्र सी हो गई  दो फाड़ होने लगे । एक पक्ष कह रहा है। धार्मिक कार्यक्रम होन्गे दूसरा सांस्कृतिक कार्यक्रम ।
  बस देखने और समझने का नजरिया हैं।
   जहां देखे  शामिल भजन और ददरियां हैं।
  एक कवि दृष्टि पाए व्यक्ति कह उठे ।
     उनके कहने से उत्साहित एक नवयुवक बिंदास बोले - "क्या भजन भाजन सब ढकोसला हैं। होगा तो डांस म्युज़िक नहीं तो कुछ नहीं ।"
         बहरहाल वर्ष में एक बार जयंती मनाकर चंदे की हिसाब- किताब करते  साल भर झगड़ने वाली आयोजन समिति में पद- प्रतिष्ठा पाने होड़ लगे हैं। और जो इस वर्ष नया अध्यक्ष बने हैं उनके प्रतिष्ठा का सवाल हैं। जो अध्यक्ष रहते चुका है,वह प्रतिरोध में हवा  बना रहे हैं भले मांग जायज हो या नजायज ...
      तभी वह व्यक्ति चंदे के नाम प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार  विजेता पंथी नृत्य दल को देने घोषणा किए ।   उनके घोषणोरान्त एक ने द्वितीय पुरस्कार की धोषणा अपने ओर किए ... फिर ओ चंदे समिति में जोश आ गया ... तृतीय व सत्वना तक की स्व धोषणा हो गये।
         अब केवल मंच और भोजन व्यवस्था की बाते रह गई ।  पर इनका भी शीध्र समाधान हुआ ।  शाम को  सहभोज होगा मतलब किसी घर खाना बनेन्गे नहीं सो दो टाईम का खाने की चंदा ५०० रु प्रति परिवार। इस तरह ५००× ५०= ५०००० युं ही एकत्र हो जाएन्गे । इतना पर्याप्त हैं। फिर थोड़ा बहुत होन्गे वह सहज इन्तजाम हो जाएगा। एक न ई सोच व न ई उमंग लोगों को रोमांचित करने लगे। वे कहने लगे सोचों दो दिन लगातार सहभोग होगा और लोगों के भोजन नहीं बनेन्गे तो महिलाओं को कितना अच्छा लगेगा।पुरा गांव मोहल्ला आनंदोत्सव में मग्न रहेन्गे। भई वाह शानदार आइडिया हैं।

   शानदार दो दिवसीय सहभोज और पंथी प्रतियोगिता बीच -बीच में गुरु वचन व संदेश। सामाजिक सौहार्द और परस्पर प्रेम भाव से रहने के अप्रतिम महाआयोजन 
संगत - पंगत  की नींव पड़ गई।

प्रात: मोहल्ले की शानदार मंजर देख सुखानुभूति हुआ - लोग दूने उत्साह से अपने  अपने घर- द्वार एंव  गलियों  व जैतखाम परिसर की सफाई में जुटे हुए हैं।
      कुछ प्रतिनिधि मंडल आस पास के गांवो के पंथी दलों को आमंत्रित सुबह सुबह निकल पड़े ।    
  जनमानस में  जयंती महोत्सव को लेकर विगत वर्ष से एक अलग तरह के  माहौल और उत्साह दर्शनीय हैं।

   -डा. अनिल भतपहरी

वीर नारायण सिंह

।।वीर नारायण सिंह द्वारा  जेल ब्रेक व पनाह
              एक संस्मरण ।।

गुरु घासीदास द्वारा अभिमंत्रित और उपचारित वीर नारायण सिंह जन कल्याणार्थ  बलिदान देकर अमरत्व प्राप्त किए आज उनकी  शहादत दिवस पर उन्हे सत सत नमन  !
            अधिनायक वाद और सामंतवाद के विरुद्ध समानता व  स्वाभिमान के लिए "जनक्रांति का  मशाल " प्रज्ज्वलित करने वाले वीर नारायण सिंह और राजा गुरु बालकदास व्यक्ति  स्वतंत्रता  के दो महानायक है। संयोगवश दोनो  सोनाखान- गिरौदपुरी निवासी  पड़ोसी व बालसखा भी रहे हैं। जिनकी  बलिदान से आज  भारत वर्ष एंव छत्तीसगढ़ समानता और  समृद्धि के पथ पर अग्रसर हैं। 
         यह संयोग और सौभाग्य की बात हैं कि वीर नारायण सिंह  की पहली गिरफ्तारी के बाद वे रायपुर सेट्रंल जेल की दीवार फांद कर  फरार हो गये ।दौड़ते - भागते ३० मील दूर अपने मित्र राजा बालकदास के गढ़ी भंडारपुरी आए। उनकी खातिरदारी कर उसे छुपाने व सुरक्षित सोनाखान पहुचाने अपने विश्वस्त सहयोगी व सतनाम सेना प्रमुख माखन साय भतपहरी के ग्राम जुनवानी  के घर पनाह लिए और  दूसरे दिन यहाँ के निवासी उन्हे ससम्मान महानदी पार कराकर बार अभ्यारण होते सोनाखान पहुँचाए ।
             ग्राम  जुनवानी  के वयोवृद्ध ग्रामीण जन उक्त रोमांचक धटना का संस्मरण सुनाते गौरवान्वित होते हैं कि हमारे पूर्वज लोक कल्याण के महान कार्यों में आरंभ से ही  गुरुघासीदास गुरुबालकदास वीर नारायण सिंह  जैसे विभूतियों के साथ दिए। एंव आजादी के आन्दोलन व डा अम्बेडकर के अभियान से जुड़कर सक्रिय सहभागिता निभाते आ रहे हैं। 

    हम जैसे नये पीढ़ी के लोग यह सुनकर रोमांचित व गौरवान्वित होते हैं कि हमारे छोटे से ग्राम  जुनवानी जो तेलासी -भंडार  से लगा महानदी तट पर सिरपुर के समीप स्थित है की बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि हैं। यहाँ साक्षात् गुरुघासीदास गुरु बालकदास वीर नारायण सिंह  के चरणरज पड़े मंत्री नकूल देव ढ़ीढ़ी व महंत नंदू नारायण भतपहरी एंव  एड मनोहरलाल भतपहरी सतनाम संकीर्तन कार सुकालदास भतपहरी  जैसे विभूतियों की जन्म व कर्म स्थली रहा हैं। 

              संस्मरण - सतलोकी अमोलदास भतपहरी  सतलोकी रामदयाल धृतलहरे ग्राम जुनवानी ।

Monday, December 2, 2019

चौक चौराहे पर

चौक चौराहे मोड़ पर ..

रविवार के बावजूद आज चुनावी ड्युटी के चलते आराम हराम हो गया और बोनस स्वरुप  रास्ते में बाल-बाल बचा!
       हुआ युं कि वीकेन्ड अवकाश के आदत पड़ जाने से  एकाध धंटे बाद नींद खुली ।हड़बहाट में जल्दी निकले क्योकि  निर्वाचन  काल में  नौकरी करना नही बचाना जो पड़ता है।
    बाहरहाल जैसे चौंक में मोटर साईकिल पहुंची कि स्मृत हुआ मोबाइल घर में छूट गये ... "दुब्बर बर दु असाढ़" जैसे स्थिति एक पहले से लेट दूसरे और भी लेट करने होन्गे !खाना पानी यहां तक परीचित से रुपये मिल भी सकते है पर मोबाइल  नही! और आज डिजिटल युग मे इनके बिना गुजारा मुश्किल ... लत आदि तो नही.. बल्कि पल -पल सुचनाओं के लिए यह आवश्यक है।
      वापस घर की ओर मुड़ना ही हुआ कि चौक में मंदिर के पास  एक घरघराती कार पीछे से टक्कर दे मारी  तिलक लगाए  हाथ में मौली सूत्र बांधे वह शख्स  धार्मिक और जल्दी में लगा .. और हम भी ... कहां-सुनी का समय ही कहा?  जो हुआ सो हुआ ! बस में बैठे मोबाइल के सिवा यदा -कदा ही यात्रियों में आज कल वार्तालाप हो पाते है डेली अप -डाउन वाले तो इनके चलते अब दुआ सलाम तक छोड़ दिए जिसे देखों सम खोए और इसी मे उलझे  है ... हम भी ।सफर काटने का यह नया और सर्वोत्तम तरीका भी तो है।
   अब रेल्वे ,बस स्टेण्ड मे पत्र- पत्रिकाएं की बुक स्टाल नही अपितु मोबाइल चार्जर ,इयर फोन  ,पावर बैंक  सेल्फी स्टीक मेमोरी कार्ड  की दुकानें सजे- धजे है।
      येशुदास की गोरी  तेरा गांव बड़ा प्यारा ... हो या चांद जैसे मुखड़े पे ... कितनी बार सुन लो मन नही अधाते ... और और सुनने का मन करता है ... इसलिए हर बस वाले जिनके पास स्टोरियों सिस्टम है जरुर बज जाते है । क्योकि बस ड्राइव्हर प्राय: मैच्योर ड्राइव्हर है और इस देश के मैच्योर लोग चाहे किसी कम्पनी या शासकीय  आफिस का डायरेक्टर हो या बस कंडक्टर सबको ७०-८० के दशक का फिल्मी गीत ही प्रिय है। हां यदा -कदा लोक गीत गर्मी में बारिश की फुहार की मानिन्द या ठंड मे चुभती -चिरती हवा में गर्म झोंके सा बज उठते है। एक परीचित के ड्राइव्हर को चंदैनी गोंदा के गीत रखने कहा ... पर राजधानी के बस ड्राइव्हर व कंडेक्टर छत्तीसगढिया नही है और डायरेक्टर का तो होने का सवाल पैदा नही होता।  गर भूले भटके हो गये तो छत्तीसगढी गीत गुनगुनाने की भूल मात्र से देहाती हो जाएन्गे। वैसे डायरेक्टर कला प्रेमी हो गये तो प्रशासन कैसे कर पाएन्गे। उन्हे जानबुझ कठोर और चेहरे पर गंभीरता तो लादना है ताकि जीनियस और धीर गंभीर लगते भले घर जाकर वह जो हो जाय।
बहरहाल  ये लोग छत्तीसगढिया सवारी से  उनके गंतव्य के किराया लेने और स्टेशनों के नाम याद कर लिये  पक्के छत्तीसगढ़िया जैसे दाई -माई गोठिया ले पर है यु पी बिहारी  और यहां रोपा बिसाई निंदाई छोड़ सब काम करने में माहिर हैं। यदि इनके भी मसीन आ जाए तो काम करते पर प्रातिंक नजर आएन्गे और चौरे पर तास फेटते माखुर गुटका के पीक थूकते या भट्टी से लड़भडाते आते छत्तीसगढ़िया दिखेन्गे।
   बहर हाल आजकल कठोर अकुशल श्रमिक छत्तीसगढ़िया है और वे केवल लेवर गिरी के लिए बना है जान पड़ते है। दीवाली व चुनाव समीप आने से देश भर के शहरों में राजमिस्त्री लेवर व  ईट भठ्ठे में ईट बनाते परिवार उछाहित झुंड के झुंड बाल- बच्चों सहित लौट रहे है।इनकी भीड़ व आव्रजन-पलायन देखा तो वह मंजर याद आने लगे जब हम कोसरंगी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे।तब एक रात्रि खरोरा से आगे पेंड्रावन जलाशय के समीप पाइटेक इंजीनियरिंग  कालेज के पास पर सिमेन्ट से भरा ट्रक और उन पर बैठ कर जीविकोपार्जन हेतु पलायन करते मजदूर सहित  रात्रि में  मुरामोड़ पर उलट गये और४-६  लोग दब कर मर गये व  गंभीर रुप से धायल हो गये । दूसरे दिन  राजदूत से तीन सवारी हम मित्रगण यहां वह मंजर देखने आए ट्रक उलटा पड़ा और सिमेन्ट की बोरियां यत्र- तत्र बिखरे खुन से सने मिले ।लोमहर्षक दृश्य देख हृदय द्रवित हो गये।कुछ दिन बाद वहां मंदिर बन गये हर नवरात्रि व अवसर पर जोत जवारा भजन पूजन चलने लगा  वह शक्ती पीठ जैसे चर्चित होने लगे मनोकामना कलशों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज उसी मोड़ पर बस पहुचते ही अचानक जोर से ब्रेक पड़ा । और  खड़े हुए यात्री गण एक दूसरे पर लद भिड़ गये।बैठे हुए लोग सामने सीट से टकराए ... मेरा तो ऊपरी ओठ सामने सीट मे लगे हाथ रखने के हत्थे से टकरा चोटिल हो गये .रुमाल से खून पोंछा ..नीचे गिरे मोबाइल उठाया और  फ्रंट कैमरे से देखा  सूज गये है दर्द से हाल-बेहाल रविवार है और नौकरी बचाना है और लोगों को गंतव्य की ओर जाना है। यह नौबत तब आया जब एक मोटर साईकिल चालक मंदिर के आगे हेंडिल छोड़  हाथ जोडने लगे  व लड़खड़ाकर गिर गये उसे बचाने बस चालक ब्रेक लगाए  ओ गाडी वाला चमत्कार मान और लेट गये ।बस ड्राइव्हर व पीड़ित यात्रियों का समवेत स्वर  उसे गालियों का आशीष देते आगे बढ़ गये ।
     हर गली चौक- चौराहे ,तिराहे मोड़ पर धार्मिक स्थलों की निर्माण और जनमानस की उनपर आस्था , वाहन चालकों का हैंडिल छोड़कर दोनो हाथ से प्रणाम व  पल भर आंखे बंद कर ध्यान भक्ति  कौन सी नवीन भक्ति अराधना की  विधी है!  जिससे अराध्य की कृपा मिलते है? यह जरुर धर्म अध्यात्म व दर्शन साहित्य जगत में अन्वेषण का विषय है।और यातायात विभाग वालों की कैसी रहमों- करम है नमकयह भी विचारणीय है ।
      लोग कहते है कि सड़क किनारे शराब दूकान के कारण दुर्धटनाएं धटती है ,आज हमे लगा वह जो हो पर इन सड़कों के किनारे ,मोड़,चौक- चराहों पर शेष भाग -३
लोग कहते है कि सड़क किनारे शराब दूकान के कारण दुर्धटनाएं धटती है ,आज हमे लगा वह जो हो पर इन सड़कों के किनारे ,मोड़,चौक- चराहों पर धार्मिक जगहों के कारण बड़ी -बड़ी दुर्धटनाएं धट रही  वह क्यो लोगों को नजर नही आते ?
  धार्मिक कार वाले से बच कर बस में बैठ हुए मोटर साइकिल वाले की अन्यय भक्ति से धायल अनिल सच में विवश और बेबश है कि इन सबका क्या किया जाय
      -डा. अनिल भतपहरी

Saturday, November 9, 2019

क्या सतनाम ईश्वर है?

क्या सतनाम ईश्वर हैं ?
सत्नाम प्रसाद संभु अबिनासी।साजु अमंगल मंगल रासी।
सुक सनकादि सिद्धमुनि जोगी।सत्नाम प्रसाद ब्रम्हसुख भोगी।।
तुलसी कृत यह चौपाई का आरंभ नाम से हैं - यथा नाम प्रसाद संभु अबिनासी .... हमें लगता हैं कि यह केवल नाम नही होगा। यदि नाम हैं तो वह क्या और किसकी नाम होन्गे?
सिव किस नाम का जाप किए ? और पार्वती को अमर कथा सुनाए वह किस नाम से आरंभ हुआ होगा? प्रायः अधिकतर विद्वान  उसे ( शिव को )  सत्य स्वरुप कहते यानि की वह सत्य के अराधक थे ।शैव मत के नाथ और सतनाम संस्कृति में सिद्ध सहजयोगियो ने  सतपुरुष या  निरंजन या काल निरंजन के आराधक बताते हैं ।यह बात तुलसी के पूर्व से ही प्रचलन में रहा और वे इस तथ्य या सतनाम  से भलीभांति परिचित भी रहे। फिर सीधा सीधा रामचरितमानस की इस चौपाई में सतनाम क्यों नहीं लिख सके? या लिखना मुनासिब नहीं समझा? यह जरुर विचारणीय है।
   हमें लगता हैं कि यह दो कारणो से हुआ होगा।पहला कि सतनाम के आराधक निर्गुण मत वाले सिद्ध नाथ  संत कवि उनके परवर्ती बुद्ध  सहरपा गोरखनाथ मत्सेन्द्रनाथ कबीर रैदास इत्यादि  थे और वे  सतनाम के साधक और प्रचारक थे उनमे अधिकतर अवतार वाद  वेद शास्त्र आदि के प्रतिरोधी थे।अत: वे सीधा सीधा उनके द्वारा व्यहृत  सतनाम का उल्लेख नहीं किया।दूसरा कि सत्नाम प्रसाद..लिखते तो चौपाई की मात्रा १६ से १८ हो जाते और काव्य शिल्प से बाहर हो जाते ।
    अत: वे नाम लिखकर काम चलाये।परन्तु व्याख्या करने पर यह नाम रामनाम तो हो ही नही सकते क्योंकि तब शिव कैसे रामनाम जपते?जबकि राम का जन्म नही हुआ था। हरिनाम भी नही क्योंकि यह उनके भाई विष्णु के लिए प्रयुक्त होते।वे सतनाम के उपासक थे।
   बाहरहाल यह नाम केवल सतनाम ही हैं जिसके आराधक बडे-बडे संत गुरु महात्मा सिद्ध- मुनी योगी  तपस्वी थे और उनकी साधना से वे समर्थवान हुए। सतनाम की राह पर चलने से साधक को एक अप्रतिम सुखानुभूति होते हैं। उसे तुलसी ने ब्रह्मसुख कहे हैं। मतलब सतनाम ब्रम्हसुख प्रदान करने वाले कारक हैं ।इस तरह वे नाम या सतनाम  को सीधा सीधा ईश्वरीय तत्व से जोडे।  जैसा कि संतो गुरुओ सिद्धो नाथो ने सतनाम को ही ईश्वर खुदा करतार मालिक सतपुरुष  स्वरुप में मानकर ही सिद्धियाँ प्राप्त की  अपनी बाते जनमानस के बीच लाए।
सत्य ही ईश्वर हैं आजकल यह श्लोगन बहुत ही लोकप्रिय हो गये हैं।
  इस तरह हम देखते है कि प्राचीन काल से ही सतनाम सत्यनाम सचुनाम सच्चनाम सतिनाम सत्तनाम शतनाम की सुमिरन जाप और साधना पद्धतियां रही है।
पर क्या सतनाम ईश्वर हैं सवाल यह हैं? ...यदि नही तब वह क्या है?और उनकी साधनाए प्रचार प्रसार बुद्ध से लेकर गुरु घासी बाबा तक किसलिए आम जनमानस के बीच किए गये... और वे किसे प्राप्त करने  पथ प्रदर्शक हुए।सतनाम की प्रसाद या कृपा से  ब्रम्हसुख मिलते हैं,जिसे परमानंद मानते हैं।मतलब ब्रम्ह या ईश्वर से अप्रतिम व श्रेष्ठ है।
     सतनाम
डा. अनिल भतपहरी
हंसा अकेला सतनाम - संकीर्तन जुनवानी

Tuesday, October 1, 2019

पाना अउ ढेला

मया मं मितान बदिन पाना अउ ढेला
गर्रा संग पानी दमोरिस घुरगे से ढेला
नोहर भ इगे राम पाना उडि़यागे  ....
दु दिन के बारी दु दिन के कोला
कोन दिना झिकत रे ले जाही तोला
ए ज उहर भ इगे राम नारी जुड़ागे...