सतनाम धर्म संस्कृति पर केंद्रित छत्तीसगढ़ एवं छत्तीसगढ़ी में साहित्य सृजन तो सद्गुरु घासीदास के सतनाम पंथ की प्रवर्तन एवं सप्त सिद्धांत की प्रस्तुति 1790 और निरंतर रामत रावटी में उपदेशना के समय ही प्रचलन में आ गए। उनकी बातों को लयात्मक गीतात्मक रुप देकर गाने एवं कंठस्थ करने की कलाएं समाज में प्रचलित हो गए। साथ ही छत्तीसगढ़ी को साहित्यिक एवं कलात्मक रुप मिला। उनमें जीवन दर्शन की बातें आई आध्यात्मिक चेतना जगी इस तरह सद्गुरु घासीदास के श्रीमुख से नि:सृत छत्तीसगढी देव भाषा कही जाने वाली संस्कृत पाली जैसी महिमामय हुई।उनके सुपुत्र गुरु अमरदास एवं संत महंत ने समाज में प्रतिबद्धता पूर्वक संपूर्ण छत्तीसगढ़ में प्रचार प्रसार किया।
कालांतर में जब शिक्षा आई तो गुरु उपदेश एवं अलग अलग परिक्षेत्र में प्रचलित लोक कथाएं संत मंहत की प्रेरक संस्मरण, वृत्तांत जीवनी इत्यादि का लेखन आरंभ हुआ। फलस्वरूप मानवता एवं करुणा से आप्लावित लोक कल्याण की उच्च आदर्श का स्वर सतनाम साहित्य में समादृत हैं।
उच्च शिक्षित एवं राज्य में उप सचिव (राजस्व) जैसे उच्च प्रशासनिक अधिकारी रहे सेवक राम बांधे "सवेरा" जी अनेक जगहों पर लोक सेवक थे। वे जनमानस की समस्याओं एवं उनकी संघर्ष एवं पीड़ा के विगत 60 वर्षों के चश्मदीद गवाह भी हैं। उनका लेखा जोखा सतनाम दर्शन से प्राप्त दृष्टि से किये हैं वह अभिनंदनीय हैं।
विषय पर उनकी दृढ़ पकड़ और सहजता से प्रभावी प्रस्तुति उनके व्यक्तव्य एवं लेखन में दृष्टिगोचर होते हैं। आपकी प्रथम चर्चित निबंध संग्रह पाखी पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं।
अब यह उनकी दूसरी कृति हैं जिसमें वे गुरु उपदेश और वाणी की प्रतिध्वनि पर रची गई अनुपम कृति है। जिसे वह प्राचीन किस्सागोई शैली में आखीन देखी कानन सुनी रोचक दास्तान हैं।
सेवानिवृती उपरांत समाज सेवा हेतु समर्पित बाँधे साहब राज्य में गठित प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज के महासचिव हैं और सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के प्रणेता आध्यक्ष हैं। जिनके प्रयास से गुरु घासीदास के सभी 9 रावटी स्थलों पर परिक्रमा यात्रा की अवधारणा विकसित हुई। यह यात्रा अनेक परिक्षेत्रों पर वर्गीकृत समुदाय में सांस्कृतिक एवं धार्मिक एकीकरण हेतु अत्युतम प्रयास हैं।
इसी तरह वे समाज में प्रचलित व्रत त्यौहार उत्सव इत्यादि व्याप्त विभिन्नता में एकता लाने सतत सक्रिय हैं। ताकि सतनाम संस्कृति स्पष्टत: पृथक नजर आए और कोई भी हो सहजता से जान समझ सके कि सतनाम संस्कृति क्या हैं?उनमें व्याप्त धर्म,दर्शन साहित्य के अवयव मानव के लिये कितने उपयोगी हैं?
इन्हीं प्रश्नों के उचित समाधान और हल हेतु वे सतत् साहित्य सृजन और व्यापक आयोजन में सतत सक्रिय हैं। नई कृति हेतु आपको एवं पारिवारिक सदस्यों को हार्दिक बधाई!
उम्र के इस पड़ाव में भी आपका साहित्य सृजन एवं सांगठनिक योगदान प्रेरक और अविस्मरणीय रहेगा । उक्त स्तुत्य कार्य के कारण विमल यश कीर्ति के आप प्रतिभागी बनेंगे,ऐसी दृढ़ विश्वास हैं।
आप सतत सृजनशील सुखी एवं दीर्घायु रहें। मंगलकामनाएं ।
जय सतनाम
डॉ अनिल कुमार भतपहरी
9617777514
प्राध्यापक
वीरांगना रमोतीन माड़िया आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़
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