Monday, February 23, 2026

सतबोधिया गुरु घासीदास जिसके सतनाम सिद्धांत की विशेषता "सत्य सनातन " हैं।

सतबोधिया गुरु,सेत गुरु , सतगुरु 
 
         उक्त विशेषण घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा था। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध नाथ जोगी जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात सतनाम ही सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय

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