सतनाम धर्म के त्रिचरण: संगत पंगत अंगत
सतनाम पंथ भारत वर्ष में एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय है। छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास ने इसे व्यवस्थित स्वरुप देकर 17वीं शताब्दी में प्रवर्तन किया इसके मुख्य तीन चरण इस प्रकार हैं:
संगत
- संस्थापक: सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास बाबा जी हैं, जो छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में पैदा हुए थे. और सोनाखान जंगल के मध्य छाता पहाड़ में 6 माह तक कठोर साधना करके "सतनाम के सप्त सिद्धांत" का प्रतिपादन फागुन शुक्ल सप्तमी को गिरौदपुरी में अपने प्रिय स्थल औरा धौरा तेंदू पेड़ के समक्ष समतल मैदान में एकत्र हजारों लोगों की उपस्थिति में किया। उन्होंने सतनाम के प्रमुख सप्त सिद्धांत एवं वाणी को जनमानस श्रद्धापूर्वक श्रवण किए यह प्रथम संगत था। फिर रामत रावटी करते संगत करते रहें।
इस तरह उन्होंने धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध सतत सतनाम जागरण चलाए। उनमें मुख्यत: जातिगत भेदभाव के खिलाफ: गुरु घासीदास ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। वे "मनखे मनखे एक "कह अनेक जीवनोपयोगी उपदेश दिए। वे अपने सिद्धांत और उपदेश को जनजीवन को श्रवण की आजीवन रामत रावटी किए यह प्रथम चरण संगत का था।
पंगत
रामत रावटी में उपस्थित जनसमूह को अलग अलग जातिय समूह थे और उनके रहन सहन खान पान में विविधताएं थी फलस्वरूप कभी संग साथ भोजन नहीं करते उन्हें सामूहिक रुप से एक ही पात्र में पके सात्विक भोजन प्रसाद को एक ही पात्र बड़ा थाल या गंज में परोस कर तेलसीपुरी महासंगम स्थल में जहां अनेक जातियों के लोग स्वेच्छा पूर्वक सतनाम धर्म को अंगीकृत किया उन्हें खिलाएं गए।उसे पान प्रसाद कहते हैं। यह पान प्रसाद खिलाना ही सतनाम संस्कृति में पंगत हैं। जब सब संग साथ में ,संगत में कही गई बातें सुन समझ लिए और सब संग साथ में पंगत में परोसे गए पान प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दूसरा चरण पंगत के नाम से प्रसिद्ध हैं।
श्रद्धालु आज भी गुरुद्वारा में जाकर मनौति मांगते हैं कि " हे सत्पुरुष साहेब तोर असीस ले मोरो घर शुभ कारज होय चार संत मोर अंगना म पंगत करय मय अपन हाथ म पतरी उचावव।"
अंगत
इस तरह सतनाम पंथ में 65-70 जातियों का समागम हैं जो कि गुरुघासीदास के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनी मूल जाति और मान्यताओं को छोड़कर सतनाम को अंगीकृत कर लिया हैं। ऐसा करना ही सतनाम संस्कृति में अंगत प्रथा हैं। अनेक जाति के लोग प्रेम विवाह इत्यादि के कारण बहिष्कृत हो जाने पर यहां आकर शरण लेते हैं। गुरुगोसाई चार संत की उपस्थिति में उन्हें सतनाम धर्म में मिला लेते हैं।
एक प्राचीन मंगल भजन इसी प्रक्रिया हेतु सृजित हैं -
बीच गंगा बहत हे मँझधारा हो मिले बर होही संतो मिल जहु न ...
समानता बराबरी और प्रेम सौहार्द भाव के कारण निरंतर सतनाम धर्म में अन्य धर्म जाति के लोगों को सहजता से आत्मसात या समागम करने की विधि विधान हैं। यह सतनाम धर्म का तीसरा चरण हैं।
- जैतखाम:
सतनामी समाज में जैतखाम की मान्यता बहुत होती है, जो सतनामी पंथ के ध्वज का नाम है। इसे एक चबूतरे या प्रमुख स्थल पर खंभे में सफेद झंडा लगाकर पूजा जाता है.
- जीवनशैली:
गुरु घासीदास ने अपने अनुयायियों को मांस खाने, शराब पीने, धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने से दूर रहने को कहा। उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के बजाय पीतल के बर्तनों का उपयोग करते हैं।
- संगठनात्मक संरचना:
गुरु घासीदास ने गुरुओं की एक वंशावली निर्धारित की जो उनके बाद संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे। एक दो-स्तरीय संगठनात्मक संरचना विकसित हुई जिसमें गुरु सबसे ऊपर थे और उनके नीचे कई ग्राम-स्तरीय महंत साटीदार भंडारी पदाधिकारी हैं।
- वर्तमान स्थिति:
सतनामी अब एक तेजी से मुखर राजनीतिक ताकत बन गए हैं और छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जाति आबादी पर उनका प्रभाव है। अपनी पुरुषार्थ से अनेक विकास के आयाम स्पर्श कर विविध क्षेत्रों में अवसर मिलने से देश दुनियां में सम्मानित होते आ रहें हैं।
सतनाम धर्म के अनुयायी को सतनामी कहें जाते हैं जिनकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक क्रियाएं हैं। यह समाज अपनी विशिष्ट सात्विक जीवन शैली और आदर्शों के लिए जाने जाते हैं।
डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514
फागुन शुक्ल सप्तमी , मंगलवार तदानुसार दि 23-2-2026
नारायणपुर छत्तीसगढ़ प्रातः 7.25
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