Sunday, October 29, 2023

मंगल असीस

।।मंगल असीस ।।

उतरिस चंद्रयान चंदा म त,
 देखत मन भाइस 
उन्चालिस बछर पहली लिखे,
 कविता के सुरता आइस 
सोला बछर के रहेंव 
जब देखेंव  पुन्नी के चंदा  
मन में भारी उथल - पुथल
काटेंव रतिहा उसनिंधा 
चित्र भारती म पढ़न  स्पेस स्टार्स 
रोचक विज्ञान कथा 
चकमक ,पराग, सरिता,मुक्ता 
सरस सलिल ,चंदा मामा 
कत्कोन रहस्य रोमांच तिलस्म 
सब मन म भरे रहय 
आनी- बानी के जिनिस ल 
जाने- समझे के सउक रहय 
खाए- पीए जिनिस छोड़ 
पाकेट मनी म पत्रिका बिसावन 
कोर्स के किताब तिरिया के  
सनन भर पढ़त रहन 
बिन्दू मिला के छुपे हुये  ल खोजन 
 दू समान चित्र म चूक ल निकालन 
पढ़त खेलत खात मजा से 
अध्धर साइकिल चलावन 
पूल घाट म मारत छलांग 
नरवा म ससन भर नहावन 
बड़ उछाहित मन हमर 
सिरतोन अगास म किंजरय 
फिटिक चंदेनी देखत रतिहा 
कुटॆला , खटिया सुकुवा मन ल चिन्हन 
नवबज्जी रतिहा  पतालू नरवा के
बंधानी घाट म बइठे 
भैया चरन संग पढई -लिखई 
गोठ मन ल गोठियाते 
ऊपर सरग ले  मोर मुड़ म आइस 
टार्च मारे कस  गोर घेरा अंजोर 
देख दुनो सुकुड़दूम 
भागेन पल्ला छोर 
लीम चौरा ब इठे सियान मन सो 
ये घटना ल सोरियायेन 
कुछु अनहोनी प्रेत बाधा होही 
सुन बहतेच डराएन  
शिक्षक बाबू जी हर हमन ल समझाइन 
उल्का पिंड खगोलीय घटना ल बताइन 
उड़न तश्तरी के तको चिंता मन बियापिन 
कछु अनहोनी झन होय सतपुरुष ल सुमरिन 
तभो ल सियान मन के मन नइ माढिस 
अउ गांव के देवालू -चुकनू बइगा करा झरवाइस 
पता नही अगास म मन बिचरत रहय 
बने बर वैज्ञानिक हमरो मन करय 
फेर गणित कापी म ज्यामिति  के जगा
 कविता लिखा जाय 
गुप्ता सर खिसियावत 
अउ कापी ल प्रिसिपल बाबु ल देखा दय 
स्कूल म सब झन  तीर तो 
अबडेच  खिसियाय 
फेर घर आवय त कविता
 ल देखे पढ़े  बर मंगाय 
कुछ अक्षर ल जोड़य 
अउ कुछ मन  ल सुधारय 
साहित्य संगीत प्रेमी 
पिता श्री के असीस  दुलार मिलय 
बिग्यानिक तो बनेन नही 
फेर बनगेयन  कवि 
बरनन करत रहिथन आनी बानी
 गढ़त रथन छवि 

आज अगास के चंदा म उतरिस चंद्रयान 
देख मन मगन हमर बाढिस देश के मान 
उछाहित मन म सिरतोन  नव उमंग भरगिस 
चौवन साल के ये तन म मन  सोला साल होगिस 
बधाई सब झन ल अउ हवय मंगल कामना 
मिलते रहय उपलब्धि बढ़वार सदा शुभकामना

          - डां . अनिल भतपहरी / 9617777514

चंद्रयान ,चांद पर  उतरने की खुशी में 23- 24 8-1923 रात्रि 11 से 1 बजे के मध्य ।

Sunday, October 22, 2023

तुरते ताही ( छत्तीसगढ़ी मे याचिका को अरजी कहते है )

तुरते- ताही 

।।याचिका ल छत्तीसगढ़ी म अरजी कहिथे  ।।

   
छत्तीसगढ़ी माध्यम से शिक्षा पर लगी जनहित याचिका पर सुनवाई के समय  हुई जिरह में छत्तीसगढ़ी की अक्षमता के ऊपर टीप अनुचित हैं।
  याचिका को क्या कहते है ? पर वकील साहब को जवाब नही सुझा । ऐन वक्त भाषा के अनुप्रयोग न करने से उचित शब्द स्मृत भी नही होते यह स्वभाविक हैं।
   असल में याचिका शब्द अंग्रेजी के पीटिशन के विधिक हिन्दी शब्द है , जो याचक से बना है ।  इसके पर्याय प्रार्थना , विनती , अर्ज़ आदि है। देश  मुगलों के शासन से कचहरी ,वकील ,अर्जी, अर्जीनिवेश, मोहर्रिर , दफ्तरी पटवारी तहसीलदार जैसे शब्द लोक भाषाओं में आया। इस तरह याचिका को छत्तीसगढ़ी  "अरजी"  कहते है। 

   हर क्षेत्रिय भाषा  रिजनल लेंगवेंज विस्तारित होकर राजकीय  और सक्षम भाषा बनती  है।उसमे मूल शब्द प्राय,: कम ही रहते हैं । आगत और तस्सम तद्भव शब्दों से वह समृद्ध होती और इनके अनेक वर्ष लगते है।
 छत्तीसगढ़ी के अनेक मूल शब्द न  अंग्रेजी मे है संस्कृत मे है न हिन्दी । इसके मतलब इन भाषा को  अक्षम कहे या माने जाय  ?  क्या यह  सही हैं? नही । 
  सावा ,बदौरी ,करगा ,ओगन , ठुलु  ,गासा ,पखार , जुड़ा सुमेला पंचाली आदि  का कोई पर्याय अंग्रेजी संस्कृत मे हो तो बतावे?
     दर असल शब्द आवश्यकता  प्रयोग और प्रवृत्ति आदि के बनती हैं और व्यवहृत होती है। मनुष्य का दायरा जितना विस्तारित होगा उनकी भाषा उतनी ही विस्तृत और समृद्ध होंगे। 
     पाठ्यक्रम लागू करके देखे महज एक दशक में जो परिणाम आएगा चौकाने वाला होगा। छत्तीसगढ़ी हिन्दी की कृत्रिम व नवीन भाषा नही यह प्राकृतिक रुप से विकसित हजारों वर्षों की यहां तक विक्रम खोल , चितकबरा डोंगरी , सिंघनमाड़ा से प्राप्त आदिम चित्र से प्रमाणित आदिम मानव द्वारा बोली जाने वाली जनभाषा हैं।
     स्कूली शिक्षा के  इतिहास में आरंभ से इसे पढ़ाए जाते तो यहां भी उडिया मराठी बंगाली तमिल‌ तेलगु जैसे परिस्थियां और प्रतिभाएं विकसित होती । पर दुर्भाग्यवश जो समझी और व्यवहृत नही की जाती ऐसी तीनों भाषाएं  हिन्दी संस्कृत और अंग्रेजी पढाये जा रहे हैं।  इस भाषा में छत्तीसगढ़ी दैनंदिनी में उपयोग आने वाली शब्द ही नही हैं। फलस्वरुप लोग अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को विस्मृत करने की अवस्था में पहुच गये हैं। यह बेहद चिंतनीय हैं। 
    यदि आधुनिक ज्ञान- विज्ञान के चलते कोई शब्द न भी हो तो अन्य भाषा के शब्द को ज्यों की त्यों तत्सम रुप या ध्वनि प्रवर्तित कर तद्भव रुप में अंगीकृत की जाती है। तो छत्तीसगढ़ी में इस तरह आत्मसात करने की बेहतरीन व्यवस्था हैं। छत्तीसगढ़ सात राज्यों की सीमा से लगा हुआ हैं।  आजादी के पूर्व म प्र  उप बिहार उडीसा महाराष्ट्र मारवाड़ आदि  से साक्षर लोगो को बुलाकर मालगुजारी , रैय्यतवाड़ी  में कर्मचारी नियुक्त किये  वे स्थायी रुप से बसते गये। उस दृष्टि से भॊ  भाषाई वैविध्य है। आजादी के बाद पंजाबी सिंधी बंगलादेशी एंव तिब्बतियों को बसाये गये। भिलाई कोरबा जैसे नवरत्न श्रेणी के उद्योग के चलते पुरा लघु भारत इन जगहों पर बसा हुआ हैं।
   उन सबके शब्द छत्तीसगढ़ी में आत्मसात होते गये अब भी यह जारी है। कहने का तात्पर्य अन्य भाषा के शब्दों को  ग्राह्य करने अपूर्व  क्षमता हैं। इसलिए अधिक या अनावश्यक या कहे " बरपेली संसो न इ करना चाही।"
    राज के  नान्हे नान्हे लरिका बच्चा मन ल अपन दाई- ददा अपन दादा- दादी , नाना - नानी  के भाखा म पढाय- लिखाय अउ समझाय के तुरते बेवस्था होना चाही। नइते ओमन अपन भाषा के संग अपन संस्कृति तको ल भुला जही ।  वैसे भी विगत सवा सौ साल के स्कूली शिक्षा के चलते तथाकथित शिक्षित अउ रोजी - रोजगार पाए  शहर पहर धरे मनखे मन ही प्राय: छत्तीसगढ़ी ल गांव- गली खेत - खार ,मजदूर- श्रमिक‌ की बोली समझ आत्महीनता से ग्रसित कन्नी काट लिये हैं।इनकी संख्या महज कुछ हजार या लाख से अधिक नही‌ है। इनकी बिना परवाह किये आठवी सदी में समृद्ध दक्षिण कोशल ( पुरा वैभव सिरपुर मल्हार तुम्मण आदि )  की वैभव को पुनर्स्थापित करने का अब वक्त आ गया हैं। और वह हमारी प्यारी छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति से ही संभाव्य होगा ।
    उधारी -बाढ़ी के जिनीस ह कतेक ल पुरही अउ काबर फुटानी मारबोन  । अपन ल जतनव अउ उपजाव ।
          ।।जय छत्तीसगढ़ी जय छत्तीसगढ़ ।।
     - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, October 20, 2023

बाबू खान

जनाब बाबू खान साहब 
 
     बालसमुंद स्थित गुरु घासीदास मंदिर के समीप पुष्पवाटिका के पास अपने धुन में बिधुन  एक लंबा पतला सा अघेड़ पुरुष  कुर्ता पैजामा और सलुखा पहिने राजपुरुष सा छवि वाले एक शख्स से मूलाकात हुई।
दुआ -सलाम के बाद , बात  आगे बढ़ी । उनसे मिलने के  पूर्व उनके नाम से परीचित था। क्योकि उनकी एक छोटी सी पुस्तिका गुरुघासीदास चरित की चर्चा से भी वाकिफ़ रहे हैं। पता चला कि यही जनाब " बाबू खान " हैं जो पलारी क्षेत्र की विभिन्न सूचनाओं  एंव समस्याओं को नवभारत समाचार पत्र के माध्यम से उठाते रहे हैं।
  शा कन्या महाविद्यालय पेड्रारोड  से स्थानांतरण के बाद 10 जून 2000 को शा महाविद्यालय पलारी में  कार्यभार ग्रहण कर  हीरा सेठ व्यवसायी के घर किराये पर रहता था। और प्राय: आदतन शाम को भ्रमण हेतु नगर के सुप्रसिद्ध जलाशय जिसमें 8 वी सदी के  प्राचीन सिद्धेश्वरनाथ मंदिर  , राधा कृष्ण, सीता- राम एंव गुरुघासीदास मंदिर तथा द्वीप मे नव निर्मित शारदा मंदिर स्थापित हैं, जाया करता क्योकि यहां के महौल हमें प्रेरित करते और सृजन के कुछ सूत्र मिलते।
     कमल पुष्प से अच्छादित अत्यंत मनोरम बालसमुंद पूरे प्रदेश भर में चर्चित हैं। यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन और गुरुघासीदास जयंती दिसबंर माह में मेले लगते हैं।  आस-पास के हजारों श्रद्धालू एकत्र होते हैं। मेले के बाद  रासेयो पलारी के छात्रों द्वारा मंदिर व मेला परिसर की साफ -सफाई नियमित गतिविधी कार्यक्रम में करते रहे हैं। एक तरह से  बालसमुंद पलारी कालेज के  रासेयो ईकाई  का स्थाई परियोजना स्थल हैं । जहां पर 2003 से 2019 तक हमें कार्यक्रम अधिकारी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। साफ- सफाई , पौधारोपण , रोपित पौधे मे पानी तराई इत्यादि गतिविधियां हेतु महाविद्यालय के स्वयंसेवक जाते ही रहते थे‌। 
    बहरहाल बाबू खान साहब के आकर्षक व्यक्तित्व व सधे हुए धीर-गंभीर आवाज के हम कायल हो गये और उनकी शेरो- शायरी, गीत -ग़ज़ल के दीवाने भी। खान साहब एक तरह से सच्चे मानवतावादी इंसान थे। शा महाविद्यालय में प्राय: सभी साहित्यिक / सांस्कृतिक आयोजन में सहभागी होते और महाविद्यालयीन कार्यक्रमों के  फोटोग्राफर /रिपोर्टर भी। हमारे सभी दस व सप्त दिवसीय  रासेयो कैम्प  पलारी के लगभग सभी बडे ग्रामों में उनकी  कवि और रिसोर्स परसन के रुप मे दो तीन दिनों तक आम दरफ्त होते । वे इस तरह महाविद्यालयीन बच्चों के साथ धुल-मिल जाते। उनका स्नेह  सदैव मिलते रहा हैं। वे महाविद्यालय मे आयोजित कार्यक्रमों में सहज ही उपलब्ध होते थें।
          साहित्यिक मनीषी और प्रशासनिक अधिकारी डा देवधर महंत जी तब पलारी में तहसीलदार थे और उनसे हमारी मित्रता महाविद्यालय के ग्रंथपाल भट्ट जी माध्यम   हुई ही थी कि  समन्यय परिवार  पलारी का गठन हुआ। उसमें बाबू खान , रामकुमार साहू , टेसूलाल धुरंधर , रामनारायण यादव , पोखनलाल ,पुरनलाल , नेहरुलाल , बाबुलाल गेंड्रे , रविशंकर चंद्राकर  जैसे नवांकुर लोग सम्मलित रहें। प्राय: प्रत्येक गोष्ठी जो गायत्री मंदिर प्रांगण , मेरे निवास या रामकुमार साहू के निवास में होते और परिक्षेत्र मे साहित्यिक कारवां आगे बढ़ती गई । 

2004 में हमारे संपादन में पलारी क्षेत्र के होनहार कवियों की साझा संग्रह  - "परसन "  नामक स्मारिका प्रकाशित हुई। परिणाम स्वरुप बलौदाबाजार , महासमुन्द , भाटापारा नेवरा तिल्दा आरंग , खरोरा,  सारागांव क्षेत्र के साहित्यकारों के बीच हमारे अंचल के साहित्यकारों का आव्रजन होने लगा। इसमे प्रमुखत: मीर अली मीर  रामरुप वर्मा , संदीप पांडे , सुरेन्द्र शर्मा , हितेन्द्र ठाकुर ,  ताराचंद अग्रवाल , द्वारिका मंडल , डा आर एस जोशी , नरेन्द्र वर्मा , सुमन बाजपेई , सरिता तिवारी , दत्तात्रेय अग्निहोत्री , सालिकराम सेन , अनिल जांगड़े गौतरिहा , कृपाल पंजवाणी  नेहरुलाल यादव ,डां. उमाकांत मिश्र , डां  अनिल भतपहरी जैसे साहित्य प्रेमी साधक गणों ने साहित्य सुमन ,  समन्वय साहित्य परिवार व छत्तीसगढ़ी राजभाषा साहित्य समिति गठित कर विगत 20-25 वर्षों से इस ट्रांस महानदी परिक्षेत्र साहित्य की लौ  जलाई जिससे नव पीढी आलोकित हैं। 
         उनमें खान साहब की गरिमामय उपस्थिति उनकी  मां सरस्वती की वंदना, फिर उनके लोकप्रिय गीत  जिसमे हमर गांव बलावत हवय.. और अनेक शेरो.- शायरी नज्म ग़ज़लो से महफिल में शमा बंध जाते। उनकी  घोष स्वर के हम सभी दीवाने थे। 
   खान साहब सामाजिक सौहार्द्र के मिशाल थे वे जन्मजात कांग्रेसी थे लेकिन भाजपा के गढ़ और कर्णधार समझे जाने वाले बृजलाल वर्मा पूर्व केबिनेट मंत्री के गांव में  हर वर्गों के बीच बेहद लोकप्रिय थें। सोसल मीडिया से पता चला कि  खान साहब नही रहें। मन एकदम सा उदास हो गया और उनके साथ बिताये बेहतरीन  लम्हों की याद में खो गये।
     खान साहब का जाना परिक्षेत्र के अपूर्णीय क्षति हैं। साथ ही सामाजिक सौहार्द्र व गंगा जमुनी तहजीब के एक अध्याय का पटाक्षेप हैं। खान साहब के व्यक्तित्व व कृतित्व के ऊपर " स्मारिका " आदि का प्रकाशन अब वहां के साहित्यिक जनों की नैतिक दायित्व हैं। उक्त कार्य में जो भी सहयोग की अपेक्षा होगी करने सदैव तत्पर हैं।
    पलारी - बलौदाबाजार  अंचल के  साहित्यिक बिरादरी द्वारा यह कार्य यदि भविष्य में संपादित होता है  तो नि:संदेह खान साहब के लिए  सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनकी मातमपुर्सी होगी। आजीवन क्वारे खान साहब सामाजिक साहित्यिक व अपनी पार्टीगत गतिविधियों सदैव सक्रिय थे। वे साफ- सुथरे छवि के मालिक और सादगी पूर्ण जीवन शैली के संवाहक थे।
     इंशा अल्लाह ! खुदा उन्हे जन्नत बक्खे!  और उनके कुनबा आबाद रखें।
     
       - डां. अनिल भतपहरी / 9617777514

Thursday, October 19, 2023

अथ भट्टप्रहरी कथा

।।अथ भट्टप्रहरी कथा ।।

    प्राचीन भारत  के बुद्धकाल में नगर ,संस्थान, महल ,चैत्य विहारों  एंव चौक चौराहो के प्रहरी के प्रमुख   भट्टप्रहरी थे।‌:सिरपुर के निकट जुनवानी जैसे पांच गाव में वंशज आबाद हैं। बडे -बुजुर्ग पांव छूते ही असीस देते है - "पांच गांव के गौटिया बन "  !
वैसे इस गोत्र की उत्पत्ति को भारतीय संस्कृति अनुरुप देखे तो सबके मूल में कृषि व ऋषि संस्कृति जान पड़ता हैं। इस आधार पर इसे भारद्वाज की परंपरा से जोड़ते हैं। क्योकि अधिकतर धर्म - कर्म विचार की दृष्टि से  संत महंत साटीदार पं कडियार  कलावंत  इत्यादि वृत्ति वाले अधिकतर हैं। 
    दक्षिणापथ या दक्षिण कोसल के राजवंश सद्वाहों या सत्यवंतों में  "भट्टप्रहरी " यही लोग रहे हैं। सिरपुर संग्रालय मे प्राप्त सजीले रौबदार प्रस्तर प्रतिमा  खड्धारी  ही वहां की "भट्टप्रहरी " शासक हैं।  प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों  से सिरपुर का  भठ जाने पर लोक  कैसे किस्से गढ़ते है कि ये लोग जहां जाएन्गे भठा देंगें? ये भठा देने वाले भठपहरी है जिनके आकार भी ब्रज भटरी जैसे हैं। ये सब तांत्रिक- मांत्रिक सिद्ध टाइप के लोग भी बच के रहे ।
      

    वैसे कहे तो यह अवधारणा है कि  भट्टप्रहरी का अपभ्रंश मुख विश्रांति हेतु  भतपहरी कहे जाने लगे। यही देशज छत्तीसगढ़ी ध्वनि हैं। इसकी व्याख्या भी भात रखवार टाइप सारल्य भाव  भात ह पहर गे  ओ भतपहरी जेन ढीड़ा परगे वो ढ़ीढ़ी वाह ! कहां भट्ट और कहां भात ?
  पर लोग इसी भाव पर मुग्ध है । 

  गुरुघासीदास के अभ्युदय और उनके  सतनाम पंथ प्रवर्तन में यही लोग  बढकर हिस्सा लिया क्योकि निराकार उपासाना और सत्यवंत संस्कृति के ये लोग ध्वजवाहक अपने उद्भव काल से  रहे । सिरपुर महानदी तट पार स्थित जुनवानी  वालों के पैतृक काम कृषि के साथ पत्थर खदान रहा है - जहां सतपुरुष की असीस और कृपा  छाहित है - 
  काट के देखाएन पथरा ल जइसे कतरा ।
   संसार मे परसिद्ध हे जुनवानी के पथरा ।।
    कठोर पत्थर को मुलायम कतरे के मानिंद काटने की हुनर और शौर्य के अधिपति यही लोग श्रद्धापूर्वक भंडारपुरी - तेलासी में भव्यतम बाडा महल गुरुद्वारा अपने खदान के पत्थरों से बनाये । 
      सतनाम संस्कृति से  इतर लोगों का उच्चारण भटपहरी ही  रहा । फलस्वरुप भट्ट या भट हो गये। कही -कही भारद्वाज और भारती भी लिखने । जब स्कूल मे आये तो शिक्षक आदि  " भट्ट प्रिय " या " प्रिय भट्ट" हो गये।
      प्रिंट मीडिया में सदैव मेरे नाम 1989 से अब तक प्राय: त्रुटिपूर्ण ही लिखते गये जैसे - भट्टहरी , भतपहरि , भटरी , भट्टपट्टरी  ,भतपट्टरी , भृतपहरी , भृतहरी  आदि छपने और आपत्ति दर्ज करते ही  रहे पर नक्कार खाने में तुती। कु़छ संपादक का दो टूक- " छप रहा है गमीनत समझो।" अन्यथा भेजा मत करो। कुछ तो ऐसे कि सीधे मुंह बात तक नही ।  नाम के पीछे मेरी रचनाओ की प्रशंसक हमारे  आध्यापिका  मैडम व मित्रों के आग्रह पर  अशांत  और उद्वेलित करती रचना कर्म के चलते तखल्लुश  "  अनिल अशांत " होकर अमन शांति खोजते रहे । खरी खरी और फरी फरी कहने के चलते जो सफलताएं मिलनी  चाहिये वह बाधित रहा । क्योकि तब और अब इस तरह की बाते अब तक अग्राह्य ही हैं।
       बहरहाल थोड़ी प्रखरता और यथास्थितिवाद के विरुद्ध नव प्रवर्तन वाले स्वर को नापसंद करने वालों की धमक कि "शांत कर दिये जाओगे !" तब गांव मे नजरबंद या भूमिगत टाइप रहा । संपादक महोदय बेहद तनाव मे रहे ।मित्र बताये कि वह अस्पताल मे भर्ती हो गये गुर्गो की आतंक भी कम नही हुए इस जमाने मे तब ओ जमाना था कि शान मे कुछ गुस्ताखी कर दिखाए कोई ?
    सचमूच इसी वर्ष सरकारी सेवक बनते ही कदाचार के लिए शांत रहना आवश्यक समझ लेखन  डायरी तक रह गये। पिता श्री की समझाइस साहित्य अंत: सलिला है वह  भिगोती है और ऊपजाती है ।बाढ़ की तरह बहाती नही।और न फसलों को तबाह करती हैं। वे विगत 23 वर्षो से नही पर सीख और उनके संस्कार सदैव छत्र बना हुआ हैं।
    
 
    इस तरह 1996 के बाद की चुप्पी पिता श्री के आकस्मिक अवसान 2000  से टूटी!  पर स्वर संयत और जिम्मेदारी बोझ से विनयावनत हो गये और वह स्वर  परसन के संपादन मे प्रस्फूटित हुई।  यदा -कदा नव शिल्प हाइकू आदि साधते वह तेवर सम्हाले ही रहा पर 2007 में सद्य: प्रकाशित कब होनी बिहान "की मुहाखरा मे आक्रोश और विवशताएं साथ- साथ रहें। कुछेक बड़ी साहित्यिक हस्तियों ने भी इसे सदैव प्रासंगिक‌ शीर्षक युक्त भीतर  पन्नों की  स्वर को मुखर सुघड़ व अवगढ़  कहे । 
    मोबाइल और  सोसल मीडिया में ब्लाग लिखने की शुरुआत 2008 से हो गये और  पेन से थीसीस लिखने की‌ परिश्रम से मुक्ति पाने मोबाइल की कीबोर्ड से लिखकर विश्राम करते रहे ।  
     तब तक पी-एच.डी. होकर महामहिम राष्ट्रपति‌‌ प्रणव मुखर्जी  के समक्ष गौरवान्वित हुये। पर पद मर्यादा शास सेवा के सुख भोगते कभी वंशधारी सहिनाव भाट हो नही सके। पता नही क्यों प्रशस्ति गान मे गुंगे हो जाते हैं? इस बीच  पावन पिरीत के लहरा , हंसा अकेला , गुरुघासीदास  और उनका सतनाम पंथ ,  The value of a cup of tea , ठोस विचारों की कीमागिरी ,   6 पुस्तकें छप गई । और कुछ सम सामयिक रचनाएं पत्र  -पत्रिकाओं में छपती रही । साथ ही दूरदर्शन व आकाशवाणी मे प्रसारण भी ।
   कोरोना काल के लाकडाउन मे ऊपर कमरे में गुरुदेव गुणवंश व्यास द्वारा सुराना स्टोर्स रायपुर से  हारमोनियम मनमोहिनी  रखी पड़ी थी वह धो पोछ कर टेबल में आई।
 और फेसबुक मे स्वर लहरिया बिखेरनी लगी। तो एक संगीत प्रेमी हमे जिद करके स्टूडियो तक ले गये फिर छत्तीसगढ़ी के वे चुनिंदे गीत रिकार्ड होने लगे जो कभी नवाकिरन और मनमोहिनी लोकमंच के आधार गीत होते थे। सत श्री म्यूज़िक अनिल भतपहरी चैनल युट्युब में भी बना लिए  गये। पर नाम  मोबाइल वाइस या स्मार्ट टी वी मे  सर्च करो तो पसीने निकल आते है  जुबान  लडखड़ा जाते है पर  नाम नही। भतपहरी लिख ही नही पाते ।तो 
फिर चैनल चलाने नाम  Anilbhatt किये गये ।
       अभी अभी एक समाचार पत्र अनिल भारत पहाड़ी नाम छाप कर मुझे यह लेख लिखने विवश किया कि इस 53 वर्षो में मेरा एक अदद नाम  हिन्दी  पत्रकारिता जगत ने क्यो नही दे पाया ? लोग दो चार लिखकर नाम कमा लिए । यहां ठीक से अनिल भतपहरी लिख नही पाया ।
  क्या यह प्राचीन भाव प्रवण सरनेम वाकिय मे उच्चारण के लिए क्लिष्ट व दुरुह हैं? क्योकि मेरे शिक्षक और  प्रोफेसर  हाजरी के समय कक्षा में प्रथम (अल्फाबेटिकल मेरा ही ) उच्चारण ही दोष पूर्ण अटके सटके टाइप होते यह शिकायत बच्चो का भी रहा पर वंश प्रेम व विरासत के मोह से कोई परिवर्तन नही किये भले लोगो को तकलीफ हो । और  आजकल  तो कर्मचारी अधिकारी भी अनिल जी कहने में अधिक  अपने आप को सहज महसूस करते हैं। बजाय भतपहरी कहने में।
   कुछेक कहते है कि साहब जोड़ने पर ही उच्चारण सही होता है। मैने मन ही मन मुदित जहा - चलो सभी न ई पीढी इस बहाने साहब बन कीर्तिमान हो जाए अपने पूर्वजों के मानिंद ... हा हा हा हा ! 
  
   कथित संस्कृत और संस्कृति प्रेमी जन समरसता को  समर सता कहते है वैसे ही इस पंचाक्षरी को भतप हरी कहकर आनंदित होते है ।ये है हमारे हिन्दी प्रेम जो अब तक सध नही पाए।
  पर  सच तो यह है बंदा 1981-82   आठवीं   से लिख पढ रहा है।1989 से  अब तक सैकड़ो छप छुप चुका हैं। 8 वी  किताब  "सुकवा उवे न मंदरस झरे "   विमोचित हो गई और  मेरे ब्लाग में  " हड्डी की जीभ नही कि न फिसले "  2022  छापते अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान  वन एलिगन ने 2200 पेज को 10 पुस्तको के रुप मे  समसामयिक लेख ,कविता लघु कथा, कहानी  के रुप मे प्रकाशित करने एम ओ यु कर लिये हैं।
   तब तक पेज और बढते ही जा रहे हैं। पर डाक्टर अनिल कुमार भतपहरी था वह अब  "अनिल भट्ट " छोटे होते जा रहे हैं। यु ट्युब और सोसल मीडिया में फिलहाल यही शार्ट नाम चलेगा ।  क्योकि यह तो वाइस टाइप में  भतपहरी रीड कर  सर्च कर ही नही पाता सो मजबुरन यह करना पड़ रहा हैं। और लोग है कि अंग्रेंजी Bhatpahari लिखे a लेटर कही न कही खा जाते है या अंतिम ri के जगह re लिख डालते है ।ऐसे ढूंढते रह जाओगे ... कही मिलेगा नहीं।
    वैसे हम पहले ही लिख चुके है -
  
    अब तो कोई भट्टप्रहरी न रहा ...
     शेष कविता पढ़ने मेरे ब्लाग या किताबों की सैर तो करना ही पड़ेगा ... इतनी सहज सरल उपलब्ध नही करा सकते । हा किताबो का लिंक जरुर अमेजान फिल्पकार्ट गूगल प्ले स्टोर्स मे मिल जाएगा ।

विगत ढाई हजार वर्षो की निर्बाध यात्रा युं ही नही गुजरे ।
इस परिक्षेत्र मे प्राप्त अवशेष और बोली - भाषा में व्यवहृत शब्द जींवत साक्ष्य हैं ।कोई अन्वेषक आये और इन तमाम रहस्यों को उजागर  करते छत्तीसगढ़ की ऊंजियार को सर्वत्र फैलाएं 

     ।।जय छत्तीसगढ़ जय भारत जय भतपहरी ।।
  
       -डा अनिल भतपहरी / 9617777514

Wednesday, October 18, 2023

सिरपुर का पुरा वैभव

#anilbhatpahari 

।। सिरपुर का पुरा वैभव ।।

        सिरपुर मुगल काल तक आबाद था । वहां उत्खनन से प्राप्त चांदी  के  सिक्के औरंगजेब ने  ढ़लवाए थे। जिसे  मथुरा -नारनौल परिक्षेत्र  के सतनामियो ने औरंगजेब से युद्ध  के बाद 1662 के आसपास  लाए। सिरपुर परिक्षेत्र महानदी के इर्द - गिर्द सतनामियों की  बसाहट हुई। वे लोग अपने साथ लेकर यहां आये , ऐसा प्रथम द्रष्टया लगता हैं।  
        रुपया को महिलाएं गले में  हार आभूषण‌ की मानिंद पहनती भी रही है।यह प्रथा अब भी है, उक्त आभूषण का नाम रुपिया ही है , का दास्तान बता भी रहे हैं । 
   यानि कि छटवीं सदी से लेकर मुगलकालीन 16 वी सदी तक एक हजार साल का उन्नत सभ्यता का केन्द्र सिरपुर समकालीन छत्तीसगढ़ की वैभव का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। जिसे जानना -समझना और उन तथ्यों‌ पर लेखन की आपार संभावनाएं  विद्यमान हैं। बौद्ध धम्म के सहजयानियो , सत्यवंत प्रजाति  की सतवाहनो या  सद्वाहों और वर्तमान सतनामियों की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं में जो एकरुपता या सम्यता दिखाई पड़ती है।वह अनेक विषयों के लिए अन्वेषण का मार्ग प्रशस्त करती हैं । 
      आध्यापकों , अन्वेषकों , इतिहासकारों और साहित्यकारों को  इन पर गंभीरता पूर्वक  कार्य करना चाहिये ताकि  छत्तीसगढ़ की स्वर्णिम कालखंड और पुरा वैभव व सांस्कृतिक प्रतिमानों  से देश और दुनिया  अवगत हो सकें  ।

ज्ञात हो कि आरंभ से लेकर अठ्ठारहवीं सदी तक सिरपुर आबाद था जहां पर विजयस इंद्रभूति महाशिवगुप्त बालार्जुन  सम्राट हुये । बुद्ध नागार्जुन आनंद प्रभु महंत अंजोरदास जैसे शास्ता व धम्मादेशक हुये। अंजोरदास की पुत्री का विवाह गुरुघासीदास से हुआ । 5 कि मी दूर ही सुप्रसिद्ध तेलासी बाड़ा  एंव मोती महल गुरुद्वारा भंडारपुरी अवस्थित हैं। यह परिक्षेत्र शैव शाक्त बुद्ध जैन व सतनाम पंथ का समन्वय अंचल भी रहा हैं। राजभाषा पालि और छत्तीसगढ़ी के शब्द और उच्चारण इस अंचल में देखे- सुने जा सकते हैं।
   

   - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Friday, October 13, 2023

समानता की सुसंस्कृति

#anilbhatpahari 

।।समानता की सुसंस्कृति ।।

सत्य और प्रेम सनातन हैं 
वैसे फरेब और नफ़रत भी 
तो सनातन ही  हैं 
उनकी सहचरी की तरह 
ठीक उजाला -अंधेरा 
या कहे,
दिन और रात की तरह 
सुख और दु:ख 
धूप और छांह की तरह 
तब उनकी दुहाई क्यों 
वहाँ जाने की ढिठाई क्यो 
क्योंकि यह तो
सदा से सर्वत्र  हैं 
हां सत्य , प्रेम 
उजाला, छांह 
और सुख ही 
क्षरित होते रहे हैं
तुम्हारे प्रबंधन से 
चिंतन मनन सृजन से 
तो मिथ्या और धृणा 
अंधेरा और फरेब 
दु:ख और नफ़रत 
ही फैले हुए है 
तुम्हारे धर्म संस्कृति में
राष्ट्र की नीति में...
 चाहते हो अगर अमन  
तो सुधारों धर्म संस्कृति 
और राष्ट्र की नीति 
कलुष हो चुके राजनीति 
व्याप्त हो रहे विकृति को 
मिटाओ विभेदकारी कृति को 
स्थापित करो 
समानता की सुसंस्कृति को
क्योंकि समानता ही संवाहक हैं
सनातन की 
आरंभ से ही विद्यमान 
करती आई गुणगान 
शाश्वत पुरातन की 
पर भले मानुष 
यथास्थितिवाद को 
पिलाने पीयुष 
गढे समरसता 
पाते रहे सुख -सत्ता 
होते रहे न्योछावर 
ये जन गण मन 
पर अब जनतंत्र में 
समता का हो चलन 
बहे सुरभित पवन 
विमल  विष्णन मन 

      - डॉ. अनिल भतपहरी / 9617777514

सत्य सनातन

#anilbhatpahari 

।।सत्य - सनातन ।। 

देख दुनिया 
रीत -नीत 
फैले हुए है 
द्वेष - प्रीत 
अगणित शत्रु
अगणित मीत 
कोई नही 
कबीरा एक 
उठते हृदय में 
भावातिरेक 
राग अनेक 
अनुराग अनेक 
पर विराग से 
आते विवेक 
होते एकाग्र 
चित्त-मन 
जागृत अन्तर्मन 
आहर राग है 
सब राग के
अधिपति शिव है 
बिन आहार 
जीव निर्जीव है 
राग ही  शक्ति  
बिन शक्ति 
शिव शव है 
राग-विराग के
द्वंद्व में पलते  
भ्रम-भव है
विगता गत के 
वही तथागत 
वही अभ्यागत 
वही बुद्ध 
वही संत गुरु 
वही मेधा प्रबुद्ध 
राग त्याग 
वैराग्य लेकर 
प्रणय कैसे 
यह जीवन 
बिन प्रणय 
चलेगा कैसे 
जीर्ण -शीर्ण 
त्यज पुरातन 
जिस से हो 
जन कल्याण 
और इसी से 
स्व कल्याण 
होगा तब  यह 
धरा स्वर्ग 
ढहे द्वेष  मोह  
हो नव विमर्श 
जगति तल का 
हो उद्धार 
प्रिये कांधे पर 
यह विकट भार 
राग विराग युक्त 
कर्म नित्य नूतन 
कल्याणक हो 
हर चिंतन- मनन 
यही तो है शाश्वत 
सत्य सनातन 

- डा. अनिल भतपहरी / 9617777514