"श्रीराम के भारतीय संस्कृति पर प्रभाव"
-डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक (हिंदी)
मानव जीवन निर्वाह के विविध पक्ष है वे सब संस्कृति के अधीन हैं परंतु भारतीय संस्कृति श्री राम के विराट व्यक्तित्व के अधीन हैं कहना या समझना कतई अतिशयोक्ति नहीं हैं।
सच में देखा जाय तो भगवान राम भारत के उत्तर से सुदूर दक्षिण तक पूज्यनीय हैं। जन जीवन ही नहीं पशु पक्षी और प्रकृति के अनेक सुरम्य स्थलों, जिसमें नदी नाले पर्वत झरने आदि पर उनके स्पष्ट प्रभाव दर्शनीय हैं। उनके सहचरो/ सहयोगियों के स्मृतियों को जनमानस आज भी सहेजे हुए हैं ।जहां पर मेले उत्सव आदि के आयोजन होते हैं। जिससे जनजीवन युगों से प्रेरित होते आ रहे हैं। यह बातें किसी भी देश समाज के लिए अत्यंत गौरव की बात हैं। श्री राम का प्रभाव इतना व्यापक हैं कि जैसे निर्गुण भक्ति में परमात्मा चराचर व्याप्त हैं उनके अनुरुप ही सगुण भक्ति में महाकवि तुलसी लिखते हैं -
सियाराम मैं सब जग जानी, करहूं प्रणाम जोरी जुग पानी। (1)
प्रभु श्रीराम भारतीय संस्कृति में एक आदर्श पुरुष "मर्यादा पुरुषोत्तम"के रूप में पूजित हैं। उनके जीवन का प्रभाव इतना गहरा है कि आज भी समाज को दिशा देने में उनकी कहानी एवं जीवन के विविध प्रसंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आइए जानते हैं कि श्रीराम का भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव है:
आदर्श पुत्र और भाई के रूप में
बालक राम घर परिवार सहित नगर वासी के लिय भी प्रिय हैं उनकी मोहक छवि का वर्णन द्रष्टव्य हैं - ठुमकी चलत रामचंद्र बाजत पैजनियां( 2)
श्रीराम ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए 14 वर्षों का वनवास स्वीकार किया, जो कर्तव्य और नैतिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके भाई लक्ष्मण और भरत के साथ उनके संबंध प्रेम और समर्पण की मिसाल देते हैं। वनवास काल में उनकी धर्मपत्नी सीता और लघु भ्राता लक्ष्मण तीनों तपस्वी स्वरुप में वनवासियों के मध्य 12 वर्षों तक रहकर उन्हें बेहद गहराई से प्रभावित किया।
वन में वनवासियों के बीच रमकर आर्य पुत्र राम हुए।(3)
आदर्श पति और राजा के रूप में
श्रीराम ने सीता के प्रति अपने प्रेम और सम्मान के साथ-साथ एक राजा के रूप में न्याय, समानता और सुरक्षा का परिचय दिया। उनका शासन "रामराज्य" के नाम से जाना जाता है, जो आदर्श शासन प्रणाली का प्रतीक है। सीता वियोग से व्याकुल अवतारी समझे जाने वाले राम का मानवीय रुप बेहद प्रेरक और संवेदनशील हैं -
हे खग हे मधुकर श्रेणी
तुम देखि सीता मृगनयनी (4)
समरसता और एकता के प्रतीक:
श्रीराम ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने वनवासी, गिरिवासी और नगरवासी सभी को समान रूप से सम्मान दिया और उनके साथ घुल-मिलकर रहे। अपने वनवास काल में सभी वर्ण जाति प्रजाति के सहयोग से ही अभेद्य लंका ढहा सके।असंभव को संभव करने का यह नायाब उदाहरण हैं-
लक्ष्मन के रेखा पारे ल परही
चलो दानों के किल्ला उजारे ल परही (5)
नैतिक मूल्यों का महत्व:
श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चरित्र, सत्य और मर्यादा में निहित है। उनके आदर्शों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। तभी राम नाम की महत्ता को स्वीकारते कबीर जैसे निर्गुण संत गा उठे -
राम नाम के पटतरे देबो को कुछ नाहि।
क्या लै गुरु संतोखीए हौंस रहे मन माहि।। (6 )
भक्तिकाल की सुप्रसिद्ध कवयित्री मीरा राम को अनमोल रतन के रुप में पाकर नाच उठीं -
पायो जी मैने राम रतन धन पायो..
खर्चे न होय चोर न ले जै दिन दिन बढ़त सवायो...(7)
आज के समय में प्रासंगिकता:
आज के समय में जब समाज में विभाजन, असहिष्णुता और स्वार्थ बढ़ रहा है, तब श्रीराम का जीवन हमें एकता, प्रेम और त्याग का मार्ग दिखाता है। उनके आदर्शों को आत्मसात करके हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं। राम रावण युद्ध सत्य असत्य के मध्य धर्म अधर्म के निमित्त हैं ।
श्रीराम का भारतीय साहित्य एवं समाज पर प्रभाव :
श्रीराम का भारतीय साहित्य और समाज पर गहरा प्रभाव है। रामायण और रामकथा ने विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अपना स्थान बनाया है, जिससे समाज को नैतिकता, न्याय और एकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
समाज पर प्रभाव:
- नैतिकता और न्याय: राम की कहानी में अन्याय के प्रतिकार और सत्य की जीत का संदेश है, जो समाज को एक आदर्श प्रदान करता है।
- एकता और समन्वय: रामायण में विभिन्न वर्गों और जातियों के लोगों के बीच एकता और सहयोग का संदेश है, जो समाज में सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देता है। जैसे केवट सबरी , वानर सुग्रीव, जामवंत, गिद्ध जटायु इत्यादि
- लोकतंत्र की प्रासंगिकता: राम साहित्य लोकतंत्र के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जनशक्ति की अनिवार्यता और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनता की भागीदारी का महत्व बताया गया है।
साहित्य पर प्रभाव:
राममय भारतवर्ष की सभी भाषाओं एवं बोलियों मे रामकाव्य मिलती हैं. राम का काज जन कल्याणकारी होने से स्तुत्य हैं. महाकवि तुलसीदास मानस मे लिखते हैं -
प्रिय लागिही अति सबहि मम भनिति राम जस संग |
दारु बिचारू कि करइ कोउ बंदीय मलय प्रसंग || ( 8रामचरित मानस पृष्ठ 14)
आधुनिक हिंदी साहित्य मे मैथिलिशरण गुप्त लिखते हैं
राम तेरा जीवन ही काव्य हैं,
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य हैं.9
इस तरह हम देखते हैं कि साहित्य के इतिहास मे सभी कलखंड मे श्री राम से प्रभावित मुग्धकारी काव्य का प्रणयन होते आ रहें हैं. बल्कि भक्तिकाल मे राम को लेकर रामाश्रय शाखा का प्रवर्तन हुआ और विविधतापूर्वक भावप्रवण काव्य रचे गए.
- विभिन्न भाषाओं में रामायण: रामायण का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है और इसके विभिन्न संस्करणों में रामकथा को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
- जनजातीय और लोक संस्करण: रामायण के जनजातीय और लोक संस्करणों में राम और सीता को सामान्य परिवार से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जो भारतीय लोक की एकता और समन्वय की भावना को दर्शाता है। संस्कृत, ब्रज, अवधि, हिंदी उड़िया तमिल, कन्नड़ से लेकर छत्तीसगढी ,हलबी, गोड़ी, सरगुजिहा मे भी रामचरित लिखें गए.
- आधुनिक व्याख्या: राम साहित्य की चिरंतनता का एक आधार यह भी है कि उसमें मूल्यों को जड़ नहीं माना जाता, बल्कि हर युग में मूल्य व्यवस्था को पुनपर्रिभाषित करना संभव है। पुनरुक्ति की परवाह किये बिना रामायण चुनिंदे पात्रों को केंद्र मे रख राम काव्य लिखें जा रहें.इस तरह रामकाव्य मे वैविध्य भाव दर्शनीय ही नहीं प्रेरक और अभिनंदनीय है.
- रामकाव्य समन्वय के प्रतीक : राम चरित के माध्यम से समकालीन समय मे विभिन्न मत पंथ मे जो विभेद और अग्राह्य भाव था उनमें समन्वय स्थापित की गई. जैसे वैष्णव और शैव मतावलम्बियों के मध्य इस भाव को रखकर उनमें तादातम्य स्थापित की गई :
- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहु मोहि न पावा.
- संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी. ( 10 लंकाकांड 709)
इस तरह हम श्रीराम के व्यक्तित्व का सम्यक मूल्यांकन शास्त्रों एवं लोक में व्याप्त छवि के आधार पर विचार करते हैं तो राम को आदर्श लोक नायक के रुप में पाते हैं। हर माता पिता की चाह कि पुत्र राम जैसा हो। उनमें राम का गुण आए। इस दृष्टि से हमारी शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श युवा गढ़ने हेतु भी राम प्रेरक पात्र हैं ।इसलिए भी वह भारतीय रचनाकारों के साहित्य में अन्तर्भूत प्रेरक पुंज हैं।
संदर्भ:
1गोस्वामी तुलसीदास, रामचरित मानस पृष्ठ
2 गोस्वामी तुलसीदास
3 भतपहरी डॉ अनिल कुमार, हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले वन एलिगन नई दिल्ली पृष्ठ
4 गोस्वामी तुलसी दास मानस
5 लोक गीत आकाश वाणी रायपुर
6 दास श्याम सुंदर कबीर रचनावली
7 मीरा बाई,मीरा के पद
8 गोस्वामी तुलसी दास
रामचरित मानस पृष्ठ 14
9 मैथिलीशरण गुप्त
10 गोस्वामी तुलसी दास रामचरित मानस पृष्ठ 709
- डॉ.अनिल कुमार भतपहरी
प्राध्यापक ( हिंदी) 9617777514
वीरांगना रमोतीन माडिया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर छत्तीसगढ़
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