Friday, November 21, 2025

बाघ

#anilbhattcg 

बाघ 

हिमालय की ऊंचाई 
में ढूंढते यति याक 
तराई में विचरण करते बाघ 
रहते शिकारी फिराक 

बसा लिए वे अपना घर 
उजाड़ कर स्वर्ग 
रचकर छद्म विचार 
सिरजा रहा औपनिवेशिक नर्क

बुर्ज खलीफा सा 
साधन हैं तो सुख हैं 
निराहार साधनहीन 
भूख से मरते कितना दुःख हैं 

जंगल में कोई मरते नहीं भूख से 
न ले जाने होते हैं साधन 
जितना हो बल शरीर में 
उतने में कट जाते जीवन 

इसलिए तो संतभूमि में 
चल पड़ा हैं कथन 
हो अगर मुश्किल या जटिल 
तो वन में जी जीवन 

वानप्रस्थ की परिकल्पनाएं 
सुंदर मोहक व्यवस्थाएं 
हाथी की दांत की तरह दिखाने 
या कितने हुए सभ्य यह बताने 

अरावली के जंगल में 
शेर का शिकार करते 
शमशीर लहराए गए 
कितने ही निरीह पशुओं को 
मार कर पकाएं खाएं गए 

उजड़ गए जंगल ,हो गए मरूस्थल 
सुखी नदियां जो बहती रहती 
करती कल कल 

रेवांचल में मारकर बाघ 
बघमार हुंकारते रहें 
सतपुड़ा से सहयाद्रि तक 
कथित अनेक शूरमा आखेट कर 
छावां मारते रहें 
इधर सरगुजा हसदेव बार के बघवा
जमींदारों राजाओं के दर्प से 
बिना गुर्राए चुपचाप मरते रहे..

 
उधर नीलगिरी के सत्यमंगलम में 
गजराजों के सौजन्य से 
शेर शिकार होते रहें 
कितने वीरप्पन पलते मरते खपते रहें 

परन्तु चेंदरू दंडकारण्य में शेर नचाते रहें 
बच गए रे बाबा इंद्रावती कछार 
आबो हवा साल वनों का रवार

सगर्व कहते रहे कई सदियों को साथ जीते हैं 
सुख और दुःख को महुवें के संग पीते हैं
 परीकथाओं सा रहस्यमय संसार 
कोई बूझ न सका दुःख-सुख 
तभी तो रहा अबूझमाड़ 

कुछ लालबुझक्कड़ों के बारूद बम गोली से 
दहलता रहा दण्डकारण्य 
निरीह पशु -पक्षी के साथ 
मरते रहे बाघ अकारण्य

जंगल में शेर का न रहना 
शहर में कानून के न रहने जैसा हैं 
तभी तो दोनों उजड़ रहे हैं 
अराजकताएं फैलती जा रही हैं
इसी में जीने रहने की कलाएं 
पीढ़ियां सीखती जा रहीं हैं...

डॉ.अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, November 15, 2025

पंडित मिलऊ दास कोसरिया

#daqument 

देश का गौरव 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. मिलऊ दास  कोसरिया 

   गुरुघासीदास के उपदेश, बोध कथाओं और उनकी अमृतवाणियों के जानकार पं. मिलऊ दास कोसरिया  जी कौंदकेरा राजिम के निवासी  थें। वे सत्संग प्रवचन के लिए पुरे राजिम परिक्षेत्र में प्रसिद्ध थे।  चमसुर निवासी पं सुन्दरलाल शर्मा  जी आपसे प्रभावित होकर गुरुघासीदास व  सतनाम संस्कृति को जाने -समझे। तथा सतनामियों के साथ सत -संगत करने लगें। दोनों मे धार्मिक सद्भाव व समझ के चलते ही गहरी मित्रता रही।
     इस बीच देश मे चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन मे दोनो सम्मलित होने रायपुर अन्य जगहों पर आने - जाने लगे। जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व पं कोसरिया जी ने किया और अपने साथ अनेक सहयोगियों  को राष्ट्र सेवा मे संलग्न किए। 
    बलौदाबाजार - भाटापारा परिक्षेत्र मे सतनामियों का महंत नयन दास महिलांग द्वारा आरंभ  किये गये गोरक्षा आन्दोलन पुरे देश भर मे चर्चित रहा । पं. मिलऊ दास जी को उनकी जानकारी और उन आन्दोलन कारियों से संपर्क रहा है। कलान्तर में गुरु अगमदास गोसाई  व महंत नयन दास महिलांग सहित  अनेक संत -महंत से उन्होने पं. सुन्दरलाल शर्मा जी का परिचय करवाया । उन सबसे मिलकर पं.  शर्मा जी  सतनाम संस्कृति से बहुत गहराई से  प्रभावित हुआ और वे "सतनामी पुराण"  की रचना 1907 में की।  आगे चलकर 1921 मे सतनामी आश्रम और कटोरी प्रथा ( धान मंडी मे  प्रति बोरा एक कटोरी धान की चंदा  )  चलाकर सतनामी स्कूल / छात्रावास भी  अमीन पारा बुढापारा पुरानी बस्ती रायपुर  से आरंभ किए गये।

    इस तरह वर्तमान अवस्था से सुधार व निजात पाने की चाह लिए सतनामी समाज भारतीय  कांग्रेस  पार्टी / डा अम्बेडकर की शेड्युल कास्ट फेडरेशन आदि संगठनो से जुड़कर उनके राष्ट्रीय कार्यक्रम में सहभागिता निभाने लगे।  इस बीच वे राजिम मंदिर में सतनामियों सहित वंचित वर्गों के सुत ,सारथी, गाड़ा घसिया, कहार , महार आदि समुदाय को एकत्रित कर  मंदिर प्रवेश का ऐतिहासिक कार्यक्रम चलाया। कहते है कट्टर पंथियों के विरोध और रैली बहिष्कार से शासन- प्रशासन चाक- चौबंद हो गये। मंदिर प्रवेश के बहाने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अभियान समझ  सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगा कर  प्रशासनिक  प्रतिरोध पैदा किए गये। फलस्वरुप   राजिम लोचन परिसर मे स्थित  राम- जानकी मंदिर में  प्रवेश कर कार्यक्रम सम्पन्न किए गये।
     इनसे इन दोनो  की ख्याति सर्वत्र फैल गई। फलस्वरुप रायपुर की एक सभा मे महात्मा गांधी ने सुन्दरलाल शर्मा जी को अपना गुरु माना -

    गांधी ले पहिली सुन्दर लाल करिस  शुरु 
    भरे  सभा म  उन ल  मानिस  अपन  गुरु 

     एक तरफ पं सुन्दरलाल शर्मा को उनके समाज वाले बहिष्कृत कर दिए।तो दूसरे तरफ कट्टर पंथ जहरिया सतनामी  मंदिर मूर्ति पूजा पर पं मिलऊ दास  कोसरिया जी को भी समाज दंडित किए गये। फिर भी दोनो मित्र आजीवन  देश व समाज सेवा में जुड़कर सामाजिक सद्भाव और स्वतंत्रता आन्दोलन व सभा सोसायटी में सक्रिय रहें।
      
           ऐसे साहसी शूरवीर और समाज व देश सेवा के सर्वस्व समर्पित रहने  वाले इस  मनीषी को सादर नमन ।

 चित्र - पं. मिलऊ दास कोसरिया जी का प्रतिमा कौंदकेरा राजिम 
  
            - डा. अनिल कुमार भतपहरी / 9617777514

Friday, November 14, 2025

राज्य में बदलते फिज़ा और उनका दूरगामी परिणाम

#anilbhattcg 

संदर्भ : राज्य की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर 

    राज्य में बदलते फिज़ा और उनका दूरगामी परिणाम 

    
     25 वर्ष के युवा में अनेक बदलाव आते हैं और उनके मन के न हो तो वह आक्रोशित ,उद्वेलित और आक्रामक तक हो जाते हैं। ऐसा होना ही तो युवा होना हैं। स्वाभाविक युवा है ,तो जोश रहेगा ही। इसलिए हमारे योजनाकारों को चाहिए कि युवा छत्तीसगढ़ में हो रहे नव निर्माण को देख, यहाँ की युवावर्ग में  बढ़ रहे उत्साह और जोश को रचनात्मक कार्य की ओर मोड़ कर उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। परोसे थाली देखकर भूख बढ़ना ही हैं ।यदि इस बीच कोई थाली छीन ले तो वर्ग संघर्ष होना भी लाज़िमी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ में प्रायः यही हो रहे हैं। निर्माण एजेंसियों, रेत घाटों,खदानों से लेकर उद्योग जगत में बाहरी हस्तक्षेप सर्वाधिक हैं। ऐसी अवस्था में स्थानीय लोगों के लिए अपेक्षित रोजी- रोजगार की व्यवस्था शासन -प्रशासन को करना चाहिए।
   वैसे भी  छत्तीसगढ़िया बेहद उदार और धैर्यवान 
हैं। महत्वकांक्षा से मुक्त संत भाव को गृहित कर सादगी पूर्ण जीवन निर्वाह करते  हैं। खेतों में अपनी संपूर्ण पूंजी लगाकर 6 माह तक अच्छी फसल की प्रतीक्षा करते कर्ज़ में डूबकर भी अनेक  प्रायोजित वाणिज्यिक तीज त्यौहार  मनाकर पर प्रांतिक मूल के सेठ महाजन व्यापारी के तिजौरी भी भरते रहते हैं। 
   स्थानीय लोगों की यह भलमनसाहत हैं कि बाहरी लोगों को आश्रय देकर उनके नेतृत्व को भी स्वीकारा हैं।
परन्तु दुर्भाग्य से उनकी इस संतत्व वृत्ति का मखौल उड़ाते उन्हें जोजोवा, भोकवा समझते हैं। यहां की लोक मान्यताओं धर्म ,भाषा कला ,रीति -नीति ,संस्कृति को अपेक्षित महत्व और मान सम्मान नहीं करते।
इसके साथ यहां प्रायोजित ढंग से सांप्रदायिक उन्माद फैलाएं जा रहे यह बेहद चिंतनीय हैं।
     भाषाई दृष्टि से राज्य  गठन हो जाने के बाद भी यहां की भाषा और संस्कृति की उपेक्षा चिंतनीय हैं। फलस्वरूप जनमानस में आक्रोश फैलते जा रहे हैं और बड़ी तेजी से छत्तीसगढ़िया उद्वेलित हो रहे हैं। शासन- प्रशासन को चाहिए कि संत भूमि छत्तीसगढ़ की समरस और सौहार्द्र भाव को कायम करने सार्थक पहल करें। 

  डॉ अनिल भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, November 11, 2025

आरक्षण से हुनर को बढ़ावा

आरक्षण से हुनर वाले और उत्कृष्ट लोग ही जा रहे हैं। इसलिए तो हर तरफ क्वॉलिटी बढ़ रहे हैं। पूरा देश ग्रोथिंग में हैं।
  आरक्षण के पूर्व तो ऐसा नहीं था।

भाग्य और भगवान भरोसे रहने वाले लोगो को, विरासत से सुविधाभोगियो को जब कमेरा वर्ग देश सम्हाल रहे हैं तकलीफ हो रहे हैं।
द्रोणाचार्य संस्कृति के संवाहक लोगों का स्कूल कॉलेज में मेरिट कैसे बनते हैं सबको पता हैं।

एक देश एक एजुकेशन क्यों नही।

जबकि एक देश एक इलेक्शन अव्यवहारिक हैं (क्योंकि इस महादेश की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितया भिन्न भिन्न हैं।
गर्मी में चुनाव होगा राजस्थान की लू मतदान कैसे होगा और ठंडी में चुनाव हो तो हिमाचल जम्मू कश्मीर उत्तराखंड के बर्फबारी में कैसे मतदान होगा? इसी तरह वर्षाकाल में केरल और चेरापूंजी छत्तीसगढ़ बस्तर के नदी नाले के उफान और मूसलाधार बारिश में कैसे सम्पन्न होगा? ) फिर भी इसके लिए कानून पास कराए जा रहे हैं।

सच तो यह हैं देश में एक समान पाठ्यक्रम हो।
(सारे प्राइवेट  स्कूल जो पब्लिक नाम देकर चंद लोगों के लिए चला रहे हैं वह बंद हों।)
जिसमें मंत्रियों अफसरों और रिक्शा चालक मजदूर के बच्चे समान विषय पढ़े इसके लिए संसद मौन हैं।
   पूरे देश में समान शिक्षा हो और उनका माध्यम राज्यों की राजभाषाओं में हो।
देश भर में परिचर्चा हो और कड़े कदम उठाए जाएं। जिसमें कितनी प्रतिभा हैं सब सामने आ जाएंगे।

Sunday, November 9, 2025

अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम रिकॉर्ड में दर्ज नहीं

अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम रिकॉर्ड में दर्ज नहीं 

    कितने ही अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम  शासकीय दस्तावेज दर्ज  नहीं , या लोगों को पता नहीं. उस समय के अनेक मुजरिम जो जेल गए उसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उनके परिजन घोषित कर नाम जुड़वा कर लाभ ले रहे हैं। बकायदा जनप्रतिनिधि बन गए। दुर्भाग्य तो हैं कि अंग्रेजों के सेवादारों, जासूसो, मुखबिरों और उनके कृपा पात्र रायबहादुरों, सरो, ताल्लुकादारों जमींदारों और राजाओं का राज चल रहा हैं। समाज में आज भी लोकतंत्र और आजादी का आना शेष हैं।
 बाहरहाल हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा सतलोकी नंदू नारायण भतपहरी, सतलोकी प्यारे लाल टंडन, जुनवानी देवगांव  एवं  जरवे निवासी स्व पटेल जी, सतलोकी नाना कोंदा प्रसाद बघेल कोसरंगी  खरोरा प्रथम अध्यक्ष सतनाम महासभा प क 65 के संस्मरण पर आधारित मेरी वर्षों पूर्व प्रकाशित कहानी 'सुम्मत के सुकुवा' हैं।
 उक्त , कहानी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह  "पावन पिरीत के लहरा"  2015 में संगृहीत हैं।

Friday, November 7, 2025

ॐ श्री सतनाम साक्षी

सतनाम 

सिंधु घाटी सभ्यता में भी सतनाम हैं.इसके अनेक चीजें साक्ष्य सदृश्य उपलब्ध हैं. सदियों से जमींदोज चीजें बाहर आ जायेंगे यदि वहाँ की लिपि को पढ़ सके.

  ज्ञात इतिहास में श्रमण संस्कृति के संवाहक एवं सत्य के अनवेशक तथागत बुद्ध ने गहन तपस्या और  उत्कट साधना से प्रकृति के रहस्य  को उजागर किया. व्यक्ति एवं समाज कल्याण के लिए बौद्ध धम्म का प्रवर्तन करके, सत्य सनातन सतनाम को ही प्रतिष्ठित किया.
उसके पश्चात् भंते गण सिद्ध  साधु नाथ पाद संत जिसमें आनंद महामोदग्लयायन, सरहपाद, इंद्रभूति, 84 सिद्ध, गोरखनाथ मत्स्येन्द्रनाथ, रैदास कबीर नानक गुरु घासीदास जैसे संतो गुरुओं ने अलग अलग जगहों एवं परिस्थितियों मे  सतनाम का सुमरन एवं लोकाचरण कर आत्मिक एवं आध्यात्मिक शक्ति से उसी आदि अजर अमर सतनाम धर्म के अंतर्गत अपने अपने मतों,पंथों का प्रवर्तन किया.इसकी एक सुदीर्घ ऐतिहासिक  निर्गुण उपासना में  प्रत्यक्ष सतनाम परम्परा हैं.इसी को ही "एतो धम्मों संनतनो " कह बुद्ध ने सनातन संस्कृति की नींव रखी.
   तो दूसरी ओर हमारे  मैथिलॉजिकल पौराणिक परम्परा मे भी सतनाम की यश गान हैं. उन्ही की अनुसंधान करते वेद उपनिषद पुराण रामायण  श्रीमद भागवत आदि हमारे धार्मिक ही नहीं दार्शनिक  एवं साहित्यिक धरोहर हैं.इनमें ईश्वर की परिकल्पना करके उनके सगुण स्वरुप अवतार एवं लीलालो द्वारा जनमानस को सत्यचारण करते सतनाम को मानने की  अप्रत्यक्ष संदेश समादृत हैं. जिसके अंतर्गत शैव शाक्त वैष्णव की परंपरा हैं.
   इन दोनों धाराओ एवं कृषि वृत्ति से भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है.
भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को सतनाम अमर कथा श्रवण कराने की प्रसंग हो या राजा हरीशचंद्र द्वारा सतनाम की मार्ग का अनुशरण का प्रेरक वृतांत हो या फिर भगवान विष्णु का  सत्यनारायण कथा हो जो घर घर मांगलिक अनुष्ठान की तरह आयोजित होते हैं.
राम की संघर्ष और अपेक्षित सफलता न मिल पाने की संदेश त्रिजटा से सुनकर बेबस और व्यथित सीता का रुदन अत्यंत कारुणिक हैं...और जब कोई सहारा न हो तो एक "सतनाम "तो हैं! जिसे स्मृत कर मन हल्का कर सकते हैं, आत्मबल भर सकते हैं।
"सत्यनाम नाम करु हरु मम सोका"
इस तरह  सतनाम की बातें उनके अनुगमन कर मानव जीवन को सुखमय बनाने की  महत्वपूर्ण सूत्र समाहित हैं।

भारतवर्ष के कण कण मे सतनाम समाहित हैं. सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनतम धर्म आधात्म से लेकर अर्वाचीन ज्ञान विज्ञान के केंद्र में सतनाम परिव्याप्त हैं. 
 उत्तर हिमालय मे सतनाम साधना के  उतुंग शिखर हैं तो दक्षिण मे हिन्द महासागर की गहराई मे वह विद्यमान हैं.
 सागर तट रामेश्वरम में स्थापित सतनाम साक्षी द्वार इसी सतनाम केंद्रित धर्म संस्कृति की सनातन विशेषता को प्रदर्शित कर रहा हैं.

डॉ अनिल भतपहरी / 9617777514

C-11, ऊँजियार सदन सेंट जोसेफ टाउन  अमलीडीह, रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, November 3, 2025

महात्मा गाँधी के अभिनंदन पत्र 1933

#daqument 

महात्मा गाँधी का अभिनंदन पत्र 1933 

"चार लाख सतनामी अन्य साधारण सवर्ण हिंदुओं से श्रेष्ठ सदाचरण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।"
 महात्मा गाँधी जी को राजिम नवापारा कमेटी द्वारा 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तभी तो हमलोग बचपन से सुनते रहे हैं कि कुछेक जहरिया सतनामी (कट्टरपंथी)हाट बाजार के केवटिन चना मुर्रा और रउत ,गहिरा के हाथों होटल के चाय पानी तक नहीं पीते। झोले में लोटे/गिलास पकड़ कर यात्रा करते और तालाब नदी नाले के पानी पीते थे। तब कुआं आदि भी बहुधा कम ही था।

 मेहराई का कार्य मेहर मोची का हैं जो पौनी जाति हैं और सतनामियों से बिल्कुल अलग हैं। हालांकि सतनामियों में अनेक जातियों की तरह वह भी सम्मिलित हुए और अपना पूर्व पेशा मान्यता का परित्याग कर दिए। पर जो सम्मिलित नहीं हुए वे लोग आज भी पारंपरिक पेशा करते हैं और वे लोग पांच पौनी में शामिल हर मेहर मोची का गांव आजीविका हेतु बटा हैं। जैसे नाई धोबी राउत ब्राह्मण के गांव आजीविका हेतु हैं।

कृषक जाति कुर्मी तेली सतनामी अघरिया लोधी राठौर हैं इनमें बड़ी जोत कुर्मी तेली और सतनामी के पास मैदानी क्षेत्र में हैं। वनांचल में आदिवासी हैं जो उत्तर में सरगुजा  उरांव, कोरवा बैगा भैना, राठिया आदि है। दक्षिण बस्तर में गोड़ कवर बिझवार माडिया मुरिया भतरा धुर्वा इत्यादि हैं।

ज्ञात हो कि भारत में सर्व प्रथम 1915 में गौरक्षा आंदोलन सतनामियों ने महंत नयन दास महिलांग एवं गुरु गोसाई ने बलौदाबाजार से आरम्भ किया और ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित बूचड़ खाना को सफलतापूर्वक लंबे संघर्ष के बाद बंद करवाए। पं सुंदरलाल शर्मा को पं मिलऊदास सतनामी ने ही सतनाम पंथ की आधारभूत जानकारी दी फलस्वरूप 1907 में वे सतनामी पुराण की सृजन किया। दोनो समवयस्क एवं कौंदकेरा और चमसुर राजिम क्षेत्र के प्रमुख स्वतंत्रता सग्राम सेनानी  महान हुतात्मा हैं ।
    समाज प्रमुखों द्वारा 1921 में सतनामी आश्रम की स्थापना गंज मंडी में कृषकों से एक बोरा धान में एक कटोरी बरार लेकर संचालित किए गए। यह भी सामाजिक जागरूकता की दिशा में मील का पत्थर हैं।
  वैसे भी रायपुर में सतनाम पंथ के तीन प्रमुख बाड़ा था जिसमें गोसाई बाड़ा गुढियारी, मांगडा बाड़ा जवाहर नगर एवं साहेब बाड़ा मोवा जहां  गुरु अगमदास गोसाई मिनीमाता जी का निवास थी और सामाजिक जनो/ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए शरण स्थली व धर्मशाला थी। यही पर जवाहर लाल नेहरु के सचिव बाबा रामचंद्र जी रहकर अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किए।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

   चित्र: नवापारा राजिम नगर कमेटी द्वारा महात्मा गाँधी जी को 19-11-1933 को प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र में सतनामियों के संदर्भ में दी गई जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं रेखांकनीय हैं।