#anilbhattcg
बाघ
हिमालय की ऊंचाई
में ढूंढते यति याक
तराई में विचरण करते बाघ
रहते शिकारी फिराक
बसा लिए वे अपना घर
उजाड़ कर स्वर्ग
रचकर छद्म विचार
सिरजा रहा औपनिवेशिक नर्क
बुर्ज खलीफा सा
साधन हैं तो सुख हैं
निराहार साधनहीन
भूख से मरते कितना दुःख हैं
जंगल में कोई मरते नहीं भूख से
न ले जाने होते हैं साधन
जितना हो बल शरीर में
उतने में कट जाते जीवन
इसलिए तो संतभूमि में
चल पड़ा हैं कथन
हो अगर मुश्किल या जटिल
तो वन में जी जीवन
वानप्रस्थ की परिकल्पनाएं
सुंदर मोहक व्यवस्थाएं
हाथी की दांत की तरह दिखाने
या कितने हुए सभ्य यह बताने
अरावली के जंगल में
शेर का शिकार करते
शमशीर लहराए गए
कितने ही निरीह पशुओं को
मार कर पकाएं खाएं गए
उजड़ गए जंगल ,हो गए मरूस्थल
सुखी नदियां जो बहती रहती
करती कल कल
रेवांचल में मारकर बाघ
बघमार हुंकारते रहें
सतपुड़ा से सहयाद्रि तक
कथित अनेक शूरमा आखेट कर
छावां मारते रहें
इधर सरगुजा हसदेव बार के बघवा
जमींदारों राजाओं के दर्प से
बिना गुर्राए चुपचाप मरते रहे..
उधर नीलगिरी के सत्यमंगलम में
गजराजों के सौजन्य से
शेर शिकार होते रहें
कितने वीरप्पन पलते मरते खपते रहें
परन्तु चेंदरू दंडकारण्य में शेर नचाते रहें
बच गए रे बाबा इंद्रावती कछार
आबो हवा साल वनों का रवार
सगर्व कहते रहे कई सदियों को साथ जीते हैं
सुख और दुःख को महुवें के संग पीते हैं
परीकथाओं सा रहस्यमय संसार
कोई बूझ न सका दुःख-सुख
तभी तो रहा अबूझमाड़
कुछ लालबुझक्कड़ों के बारूद बम गोली से
दहलता रहा दण्डकारण्य
निरीह पशु -पक्षी के साथ
मरते रहे बाघ अकारण्य
जंगल में शेर का न रहना
शहर में कानून के न रहने जैसा हैं
तभी तो दोनों उजड़ रहे हैं
अराजकताएं फैलती जा रही हैं
इसी में जीने रहने की कलाएं
पीढ़ियां सीखती जा रहीं हैं...
डॉ.अनिल भतपहरी / 9617777514