Tuesday, September 30, 2025

Anil Biodata

नाम : डॉ.अनिल कुमार भतपहरी 
माता : श्रीमती केराबाई भतपहरी
पिता: स्व. सुकाल दास  भतपहरी 
शिक्षा : एम ए पीएचडी पी. जी. डी. टी. सुगम संगीत 
संप्रति: प्राध्यापक हिंदी 
वर्तमान पद : उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग संचालनालाय इंद्रावती भवन नवा रायपुर 

श्रेणी : प्रथम
वेतन मैट्रिक लेवल 13 A
वेतन : 205000

अनुभव: 23 वर्षो का आध्यापन
एवं 2003 से 2019 तक सत्रह वर्षो तक रसेयों कार्यक्रम अधिकारी

प्रशासकीय अनुभव : 1.  सहायक संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2019-2021 

2. सचिव,छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग  2021- 2024 

3 उप संचालक उच्च शिक्षा विभाग 2024  से अब तक
 
4 राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन आयोजन प्रभारी एवं राजकीय सम्मान के लिए निर्णायक समिति में सदस्य 
5 राजिम कल्प कुंभ 2023 में सत्कार/ मंच प्रभारी
6 इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का नोडल अधिकारी 
7  राज्योत्सव 2024 एवं 2025 के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय प्रभारी ।
प्रकाशित कृति - 1 कब होही बिहान  काव्य संग्रह (सर्व प्रिय प्रकाशन नई दिल्ली ) 2007

2 पावन पिरीत के लहरा कहानी संग्रह वैभव प्रकाशन रायपुर 2015

3 गुरु घासीददास और उनका सतनाम पंथ वैभव प्रकाशन रायपुर, एवं  बुक क्लिनिक बिलासपुर 2019

4 हँसा अकेला सतनाम संकीर्तन   
वैभव प्रकाशन रायपुर 2019

5 ठोस विचारों की कीमगिरी लघु  कथा संग्रह , बुक क्लिनिक 2021 

6 The value of a cup of tea (short stories ) book clinic Bilaspur

7 हड्डी की जीभ नहीं कि न फिसले काव्य संग्रह ,वन एलीगन नई दिल्ली 
8 सुकुवा उवे न मंदरस झरे काव्य संग्रह सत श्री प्रकाशन 


सम्मान - कौमी एकता सम्मान 2008,आरुग फूल सम्मान 2009, काव्य श्री सम्मान 2012,   विशिष्ट कार्यक्रम अधिकारी सम्मान मैसूर 2012 छत्तीसगढ़ राजभाषा सम्मान 2012, राष्ट्र भाषा अलंकरण 2013, 2019, स्वास्थ्य मंत्रालय नई दिल्ली से उत्कृष्ट सेवा सम्मान 2019, अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मान काठमांडू नेपाल 2022 
बिलासा सम्मान 2023, विमल मित्र सम्मान 2023 
विभिन्न सामाजिक / साहित्यिक सस्थानों ने विविध सम्मान. 

पता -  ऊँजियार सदन, सी 11/ 9077 
सेंट जोसफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

संपर्क - 9617777514
anilbhatpahari@gmail.com 
Blog - सत सांधन anilblogpost 

YouTube channel : Anil Bhatt CG 

Website - anil.in

Thursday, September 25, 2025

गुरुगद्दी पूजा महोत्सव और गुरुदर्शन मेला

"  गुरुगद्दी पूजा महोत्सव / गुरु दर्शन दु:ख-दंशहरा पर्व "

सतनाम धर्म के चारों शाखाओं और देश विदेश में निवासरत सतनामियों मे गुरुगद्दी पूजा विधान प्रचलित है।
  गुरुगद्दी सद्गुरु के आसन है जिसपर  आसनगत  होकर अपने सम्मुख उपस्थित अनुयायियों को धर्मोपदेश देते और उनके तमाम उलझनो परेशानियों और दसो तरह  दु:ख व्याधि के हरन का उपाय बताते इसलिए भी यह दु:ख दंशहरा परब है।
   क्वार शुक्ल एकम से  दशमी तक दस दिवसीय इस महापर्व का आयोजन होते है नित्य प्रात: शाम आरती पूजा के साथ साथ संत महंत गुरुओ द्वारा  ग्यान वर्धक व्यख्यान्न सत्संग प्रवचन गुरु ग्रंथ व चरित का पाठ एंव लोक कलाकारों द्वारा प्रेरक व मनोरंजक नाट्य मंचन गायन व नर्तन होते है।कही कही हर शाम सामूहिक भोग भंडारा होते है जिससे इस विकट समय टुटवारो के दिन में परस्पर मिलजुल कर सहभोज कर आत्मिक आनंदोत्सव मनाते है ।यह सब सद्गुरु के समछ  होते है।ताकि पुरी पवित्रता और महत्ता कायम रहे उनका सदैव आशीष मिलता रहे।इस कठिन वक्त जब फसलें खेत मे है और लगभग जन साधारण के अन्नागार कोठी खाली हो उस समय साधन सछम लोग जन कल्याणार्थ इस महा पर्व मे अन्नदान कर सामूहिक भोग भंडारा चलाते है ताकि गरीब गुरबा बडे बुजुर्ग महिलाओं  व बच्चो  को  गुरुप्रसादी के रुप मे भोजन मिल सके।और रात्रिकालीन होने वाले ग्यान वर्धक व मनोरंजक कार्यक्रमों का लाभ उठाकर सुखमय जीवन निर्वाहन कर सके।इसी  प्रयोजनार्थ  सतनाम संस्कृति मे यह महत्वपूर्ण आयोजन है।
    दसवें दिन "सदगुरुआसन" का  प्रात: शोभायात्रा निकाल ग्राम गलियों की परिक्रमा कराते है।और सदानीरा नदी सरोवर के समीप जल परछन कराकर वापस गुरुद्वारा या कोई श्रद्धालु अपने घर नित्य आगामी उत्सव तक पूजा अर्चन करने स्थापित करते है।
   शाम को तेलासी अमसेना खपरी बोडसरा ( वर्तमान मे स्थगित) खडुआ गुरु वंशजो के दर्शनार्थ जाते है शोभायात्रा और उनके सम्मुख श्री मुख से सद्गुरु की अमृतवाणी श्रवण करते कृतार्थ होते है।गुरु उपदेश सिद्धान्त रावटी महात्म से परिपूर्ण संत महंत की उपदेशना चौका आरती भजन पंथी एव ग्यान व मनोरंजन पूर्ण कार्यक्रम देख सुन कृतार्थ होते है।
    दूसरे दिन जग प्रसिद्ध भंडारपुरी गुरुदर्शन दशहरा पर्व का आयोजन हर्षोल्लास पूर्वक होते है।इस दिन हाथी घोडे ऊट पैदल चतुरंगी शोभायात्रा गुरु वंशजो व गुरुगद्दी नशीन धर्मगुरु का उपदेश व प्रवचन होते है।
   सतनामियो का यह सबसे बडा और प्राचीन महोत्सव है। जहां गुरुवंशज के घर से गुरु प्रसादी भोग भंडारा पाकर श्रद्धालु गण लोग धन्य-धन्य हो जाते है।
     छग मे स्थापित सतनामधर्म का यह उत्सव १८२५ में जब मोती महल गुरुद्वारा का उद्धाटन हुआ और राजा घोषित होने बाद चतुरंगी सेना साजकर आम‌जन मानस को दर्शनार्थ सद्गुरु घासीदास के मंझले पूत्र राजा गुरु बालकदास  भाई आगरदास पुत्र साहेब दास हाथी मे संवार आमजनमानस के बीच आकर गुरु उपदेशना व पंथ संचालन हेतु आवश्यक दिशा निर्देशन किए।
  तब से यह विशिष्ट आयोजन परंपरागत आन बान से हर्षोल्लास पूर्वक मनाते आ रहे हैं।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ ९६१७७७७५१४

Thursday, September 18, 2025

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़

रजत उत्सव के अवसर पर 

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़  

    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन  जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में  आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
   यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा  वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं।  मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
   जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य  शैलियां  है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस,  छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की  साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
     अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा  थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध  शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान  जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड  हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि"  कहते हैं। 
   सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव  रतनपुर दल्हा, जलेश्वर,  जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर  अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
     इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह,  गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं। 
  गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा  के लिए स्वयं को समर्पित की 
   कला जगत में  मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू,  गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा  झाडूराम देवागन,  सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में  ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया,  सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटनाओं  और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय  "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक  साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
    राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की  सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।

      जय छत्तीसगढ़ 

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Tuesday, September 16, 2025

भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी

 ।।भाषाई श्रेणी क ख ग के चिखला म चभके छत्तीसगढ़ी।

  एक नवंबर ईस्वी सन 2000 में देश के 26 वें राज्य के रुप में  छत्तीसगढ़ बनिस। हिंदी भाषी राज्य मध्यप्रदेश ले छत्तीसगढ़ी भाषा के विस्तार क्षेत्र ल भाषाई  अउ सांस्कृतिक आधार पर चिन्हांकित करके  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस। हालांकि बालाघाट, अमरकंटक अनूपपुर  के कुछेक एरिया तकों आतिस।फेर जतेक आइस ओहर अनेक  विशेषता से परिपूर्ण हवय। ते पाय के  छत्तीसगढ़ हर झटकुन  देश भर अपन पहचान बनालिस. 
  अब तो छत्तीसगढ़ महतारी हर 25 बछर के होगिस जइसन ये उमर मे बेटी माई मन के सुघरई बाढ़ जाथे उही रकम के हमर छत्तीसगढ़ के सुघरई अउ महमई चारों खुट बगरत हवय.
   ते पाय के सबो डहन ले  इहा लोगन के आय जाय के रेम लगे हवय. स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रेल कल कारखाना सहित उद्योग बाईपार के बढ़वार होवत हवे. फेर कोजनी इंहा के मनखे मन कमाए- खाय बर परदेस जवई छूटत नइहे. देवारी मान खलक उजरे कस गांव के गली सुना पर जाथे। इंहचे येमन बर कोन्हो बुता_ काम काबर नइहे? खांती कुदारी ,रापा गैती के सिवाय कोनो दूसर कराज नइहे का? जब ले जेसीबी, हाइवा ,हाइड्रा आये अब झउहा रापा कुदारी मन नंदा गय. बनिहार मन अब बनी नई मिलय ते पाय के ठल्हा बैठे चौरा मे बीड़ी गांजा मंद माखूर खात -पियत,लड़त- झगरत,थाना -पुलुस,कोरट- कचहरी मे मुंशी,वकील कना लुटात दिख थे.सालपुट खेत बेचत किसान बनिहार होगे.
गाँव मन मे तो अंधियारी छाय हे ,भले शहर पहर मन दगदगात हे.गवई के कुछेक पढ़े लिखें नौकरी चाकरी,हुनर वाला हे ओमन तकों शहर धरे हे अउ अपन सुग्घर रोजी रोजगार मे मगन हवे. फेर कतको झन मन गरु जांगर धरे गरुआत बैठे हे उनकर मन बर कोनो उद्योग बाईपार रोजी रोटी के बेवस्था नइहे तेन हर बड़ संसो अउ गुनान  गोठ आय. इनकर बिन सजोर उपाय करें छत्तीसगढ़ के उद्धार नइहे.

इहि तरा इहाँ के  राजभाषा अउ दाई भाखा छत्तीसगढ़ी के तको कोनो पुछन्ता नइहे. अतेक बड़ राज अउ दू करोड़ मनखे के बोले बतियाये समझे के भाषा मे कोनो दैनिक समाचार पत्र नइहे. टीवी चैनल नईए न खोल चला सके कोनो मूल छत्तीसगढ़िया के हैसियत हवे।  स्कूल कॉलेज मे  न पढ़ाई चलत हे ,न मास्टर गुरुजी के भर्ती हे. तब भाषा हर कबतक बाचे रही. गांव गवई ल छोड़ दे शहर मे बसे छत्तीसगढ़िया परिवार मे अब छत्तीसगढ़ी नंदा गे  हवय. अउ यही हाल रही त छत्तीसगढ़ी हर झटकुन गाँव - गवई ले तको नंदा जाही. ये हर बड़ दुःख के बात हवय. तेहि पाय के पर प्रांतिक मूल के गैर छत्तीसगढ़ी भाषी छत्तीसगढ़िया मन जेन सियानी करत हे उकरे चलथे ओमन हमारे लोगन ल भरमाए हवे कि छत्तीसगढ़ी में का रखे हे। अपन बाल बच्चा ल हिंदी अंग्रेजी पढ़ा और देश दुनियां भेज कहके मूल संस्कृति के जुड़ाव ल जर सहित उखानत हे काबर कि भाषा नई रही त संस्कृति तो अपने आप विलुप्त हो जाही। बहुत अकन लोक परब लोक कथा कहनी गीत भजन सब नंदावते जात हे। नवा पीढ़ी मन टीवी रेडियो पेपर में जोन देखथे ओला ही अपना लेथे। संस्कृति विभाग कुछेक लोक कलाकार मन के नाचा गम्मत बाजा रुजी के प्रदर्शन कराथे फेर ओकर आरो पता बने  नई होय। आजकल विभाग के मेहरबानी में ही चंट कलाकार चलत हे।बाकी लोक कलाकार ल काम तकों नई मिलय जबकि एक समें अइसे रहीस कि साल में चार महीना किसानी आठ महीना कलाकारी म निकल जाय। मेला मड़ई जयंती परब छठी बिहाव मरनी हरनी तकों म तरह तरह के लोक कलाकार मन काम अउ मान सम्मान मिलय टीवी सीडी फिलिम सनीमा अब तो मोबाईल बैरी हर सब ल निगल लिस। सार्वजनिक मनोरंजन हर पारिवारिक अब तो मोबाईल हर एकल मनोरंजन के रुप मे लोक तत्व ल पूरा खतम कर डारिस।

छत्तीसगढ़ी ल 2007 मे राजभाषा बनाय के  18 बछर बीत गे फेर कोनो बढ़वार नई हे. पुरा राजभर म 18 ठन आवेदन आदेश घलाव छत्तीसगढ़ी म दिखऊ सुनउ नई हे. लोगन तको लिखें पढ़े बर कनउर मरथे अइसे कइसे अपन मनोदशा ल बनाय राखे हे ओकर गम नई मिलय. जबकि राजभाषा आयोग हर सरलग सभा सुसाटी के करत जनता मन सो गिलौली करत आवत हे. मय अपन सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यकाल म कतको घाँव जोजिया डारे हव फेर सब कोजनी का सेती बौरे नहीं न कोनो समस्या बताय. का साहेब मन छत्तीसगढ़ी आवेदन ल स्वीकारे नहीं या उकर ऊपर कार्यवाही नई करय कोनो पच परगट बताय घलो नहीं.तब करन त करन इंहा के भाषा बर बाना बांधे मनखे मन तको कठुवाय रहिथे. भाषा बर रोजी रोटी पाय के आस म 2013 ले छत्तीसगढ़ी म एम ए करे एक हजार बेरोजगार छात्र मन संगठन बना के संघर्षरत जरुर हवे फेर उनकर  बात हर जिहा पहुंचना चाही उहाँ तक पहुँच नई पात हे. काबर अइसे हे एकरो गुनान करे जा सकत हे. 

   शासन प्रशासन के मजबुरी हवे कि छगत्तीसगढ़ी हर आठवी अनुसूची म संघरे नइहे ते पाय के ये भाषा के शिक्षक अनुवादक अधिकारी कर्मचारी आदि बनाय बर विज्ञापन नई निकाल सकत हे. स्कूल मे हिंदी के सहायक भाषा बोली समझ कुछेक पाठ मिंझारे हवे ओला छत्तीसगढ़ी भाषी हिंदी के शिक्षक मन पढ़ा लेवत हे ते पाय के अलग से भर्ती नई होवत हे. ये हर बड़ बिचित्र बात आय.
   असल मे छत्तीसगढ़ हर ब्रिटिश काल मे आजादी के बाद 1950 तक सीपी एंड बरार के हिस्सा रहिस. तब अंग्रेजी / मराठी हर राजभाषा रहिस अउ सरकारी कामकाज उही भाषा के संग हिंदी मे होवत रहिन. काबर कि लॉर्ड माइकले के शिक्षा  नीति के चलते  स्कूल में मराठी के जगा  हिंदी में पढ़ाई लिखाई होईस.  जब 1 नव 1950 मे जब  मध्यप्रदेश के गठन होइस तब देश के मांझोत मे होय ले प्रमुख रुप से हिंदी भाषा राज्य "क "श्रेणी मे संघार दे गिस. घुन मे कीरा कस छत्तीसगढी रमजा गे. काबर कि अंग्रेजी मराठी जैसे भाषा ल कतको बच्छर ले संग रहें ले घलो आत्मसात नई करे रहेन. भलुक रामायन, महाभारत,  आल्हा रहस,  पंथी,सतनाम निर्गुण भजन,कबीर रैदास भजन के चालागन रहिस अउ लोगन ब्रज अवधि भोजपुरी ल छत्तीसगढ़ी कस आत्मसात कर ले रहिस. ये भाषा के कवि  गायक कलाकार मन नाचा गम्मत रहस लीला सत्संग प्रवचन करत जनजीवन म बड़ गहराई ले प्रभावित करे रहिन. ते पाय के यहीं भाषा विभाषा बोली के मिंझारा सरुप हिंदी ला अपना लेन अउ "क" श्रेणी जेकर मातृ भाषा अउ राजभाषा हिंदी  घोषित हो गई. इसमें उप बिहार मप्र संघरे हे ते पाय तछत्तीसगढ़ राज हर "क" श्रेणी मे अपने आप आ गे.अउ इंहा हिंदी भाषी उप बिहार मप्र वाले मन के शासन प्रशासन अउ उदयोग बाईपार मे एकतरफा एकाधिकार होगे. मतलब भाषा हर विकास के प्रमुख कारक बन गे.
   जबकि  छत्तीसगढ़ राज अलग होइस उही समे येला ख श्रेणी मे राखे के जरुरत रहिस.जैसे महाराष्ट्र गुजरात राजस्थान हरियाणा पंजाब आदि हवय.भले ओ समे नई हो पाईस फेर सबो झन ल उमिहा के  छत्तीसगढ़ ल "ख" श्रेणी मे  राखे बर उदिम करना चाही. काबर कि शिक्षा के सवा सौ साल के इतिहास अउ सतत प्रचार प्रसार के बाद भी ग्रामीण क्षेत्र मे हिंदी के व्यवहार चिटको नइहे. छत्तीसगढ़ी अपनाबो  तभेच मराठी गुजराती हरियाणवी /पंजाबी जइसे स्थिति छत्तीसगढी के होही अउ स्वतंत्र विकास के रास्ता खुलही. इंहा के संपर्क भाषा हिंदी रही .
   तीसरा श्रेणी" ग "आय जेन उड़ीसा बंगाल असम सेवन सिस्टर्स राज्य,आंध्रा कर्नाटक  तमिलनाडु केरल जैसे स्वतंत्र भाषाई राज्य हैं. ऊहा अपन अपन राज के भाषा म ही शिक्षा रोजी रोजगार दे जाथे। इहाँ सम्पर्क भाषा अंग्रेजी हवे. 
तेकरे सेती देश ले अंग्रेजी हट नई पात हे न अब ऐसे कोनो शक्ति नाईये कि ये औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता के भाषा ल खारिज कर सके। काबर कि ज्ञान विज्ञान उद्योग व्यापार न्यायलय के भाषा अंग्रेजी हो चुके हे। 
   तब कम से कम राज्य के अस्मिता अंचल के सांस्कृतिक महक ल बचाएं सेती स्थानीय भाषा में शिक्षा राजकाज जैसे मानविकी समूह के विषय के पढ़ाई लिखाई कर के जतने तो जा सकत हे।
  जय छत्तीसगढ़ जय छत्तीसगढ़ी।

डॉ अनिल कुमार भतपहरी 
    सेंट जोसेफ टाउन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़

Monday, September 15, 2025

Panthi Nritya : Sahpidia

https://www.sahapedia.org/panthi-nritya-dance-of-devotion-of-the-satnamis?fbclid=IwdGRzaAM1GjhjbGNrAzUaCWV4dG4DYWVtAjExAAEeJRDaZivubS-nO7AICnZLc3LpGkpzMJ9ILIfiLw-dUr2oIUvJVnCzBldS1NU_aem_Sy3-LCG5xvA9pALl-SjY9Q&sfnsn=wiwspwa#lg=1&slide=0

हिंदी और राष्ट्रप्रेम

#anilbhattcg 

हिंदी और राष्ट्रप्रेम 

जम्बूद्वीप प्राचीन भारत की जनभाषा प्राकृत पालि और मध्यकाल से आयातित अरबी फ़ारसी की युति से 14 वीं सदी में हिंदी भाषा अस्तित्व में आई । इसके साधकों और प्रेमियों ने अपरिमित और अप्रतिम साहित्य रचकर इसे वैश्विक विस्तार दिया। परन्तु दुर्भाग्यवश ब्रिटिश औपनिवेशिक की अंग्रेजी भाषा और उससे रौब दाब से यहां के प्रशासक वर्ग  जिनकी संख्या महज 10% ,भी नहीं हैं के मोह के कारण तकनीकी शिक्षा तो दूर ऑफिस बैंक न्यायालय की भाषा भी आज पर्यंत नहीं बन पाई बल्कि अंग्रेजी के द्वारा ही देश वासियों के ऊपर हमारे ही लोग अंग्रेजों जैसा व्यवहार करते आ रहे हैं।
    आजादी के अमृतकाल में भी देश वासियों को उनकी अपनी मातृ भाषा में शिक्षा और न्याय नहीं मिल पाना कितना दुर्भाग्य हैं।
      लगभग सवा अरब वाली विशालकाय देश का अपना एक राष्ट्रीय भाषा तक नहीं हैं। संपर्क भाषा के रुप में चंद मुट्ठी भर लोगों द्वारा औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी को बनाएं रखना कौन सी देश भक्ति और राष्ट्रप्रेम हैं? 
   धर्म को राष्ट्र प्रेम से जोड़ने वाली बातें तो अक्सर सुनी जाती हैं पर भाषा को राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की बातें क्यों सुनाई नहीं देती? 
    हिंदी दिवस पर निरीह जनता जनार्दन को बधाई जिन्हें उन्हें न्याय मांगने और फैसले जानने के लिए उनके हितार्थ कानून को समझने किसी अंग्रेजी दा वकील की सहारा लेने पड़ते हैं। यह देश वासियों का सौभाग्य हैं कि दुर्भाग्य हम जैसे मूढ़ मति को आज तक समझ नहीं आया।
  भले तकनीकी चिकित्सीय शिक्षा के पाठ्यक्रम बनाने और लागू करने में अक्षम हैं परंतु इनके अतिरिक्त न्यायालय और केंद्रीय कार्यालयों में बैंक व्यापारो में जनता की भाषा व्यवहृत नहीं कर पा रहें हैं यह कैसी विडंबना हैं।
सच कहे तो हिंदी विविध मातृभाषाओं की मेल से बनी हुई हैं ।यह भारतीय जनमानस को समन्वय भाव से बांध कर रखने वाली हैं परन्तु औपनिवेशिक अंग्रेजी भाषा और उनके आशिको ने इन्हें दासी बनाने पर तुले हुए हैं।
अंग्रेजी से हिंदी और सभी मातृभाषाओं को खतरा हैं।  यही हालत रहे तो 50 साल बाद अंग्रेजी  सबको निगल लेगी। ग्लोबल विलेज में  युवावर्ग अर्धनग्न हो रॉक _पॉप करते रहेंगे वृद्धाश्रमो में  वर्तमान अंग्रेजी प्रेमी जन सेवाएं गवार  ग्रामीणों से सेवाएं लेते अपने काबिल संतानों से चंद बातें करने तरसते रहेंगे।

     बहरहाल अमृतकाल में देशवासियों को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई। कृतज्ञ राष्ट्र की बिंदी हिंदी बने इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ...

                  जय हिंद जय हिंदी 

चित्र: हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखक नैमिशरॉय जी के साथ

डॉ.अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Saturday, September 13, 2025

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य

सतनाम साहित्य और दलित साहित्य 

जहां शोषण हुआ वहां प्रतिरोध हुआ हैं। कहीं मद्धिम तो कही प्रखर ! इनके विचारकों में दैन्य और रौद्र भाव प्रस्फुटित हुई ।दैन्य भाव से ही दलित साहित्य के उद्गम हुआ अपनी जन्म जाति भाग्य को कोसते भगवान से कृपा दया की याचना हुई  । एक तरह से भक्तिकाल के दास्य और दैन्य भाव को ही परिवर्धित कर बृज अवधि मराठी में यह लिखी गई।जबकि  रौद्र भाव ने कल्पित ईश्वर और उनकी व्यवस्था को खारिज कर दिए । इन्हें ज्ञानमार्गी निर्गुण संतो गुरुओं का संबल मिला।इस तरह अलग जीवन पद्धति /संस्कृति विकसित हुई और उससे अलगाव हुआ फिर वहीं द्वेष में बदल गए । जैसे पंजाब , छत्तीसगढ़ में सिख ,सतनाम पंथ और सतनामियों का सतत आंदोलन फिर उनसे निर्मित सतनाम साहित्य। जैसे_ मंदिरवा म का करें जइबोन पितर मनई बइहाय कस लगथे . तोर अंतस भीतरी म बिराजे हे सतनाम इत्यादि।  प्रवर्तनकारी और उदात्य भाव स्वर के कारण सतनाम साहित्य को दलित साहित्य की श्रेणी में नहीं लेते और न ही यह दलित साहित्य के मापदंड पर किसी तरह आते हैं।
   बाहर हाल समानता और मानवता पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी भाषा में रचे सतनाम साहित्य पंथी गीतों, साखी, रामत रावटी वृतांत और गुरु घासीदास के उपदेशों सिद्धांत अमृतवाणियों का अनुवाद देश के क्षेत्रीय भाषा के साथ राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय भाषा में हो। इनपर मिली जुली राष्ट्रीय संगोष्ठी परिचर्चाये हो तो जनमानस में आत्मबल स्वाभिमान जागृत होगा और  भय भाग्य भगवान से मुक्ति मिलेगी। यह बदलाव ही सतनाम संस्कृति का अभिष्ट हैं। सक्षम और प्रज्ञावान लोगों को इस दिशा में मिलकर काम करना चाहिए। गुरु घासीदास शोध पीठ जैसे संस्थान बेहतर कार्य कर सकती हैं इसके लिए शासन/ प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए।
     जय सतनाम

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

Monday, September 1, 2025

महानदी से महाकल्याण

#anilbhattcg 

स्वागतेय पहल : बशर्तें नीयत और नज़रिया सही हो 

महानदी से महाकल्याण 

छत्तीसगढ़ से निकलने वाली सभी छोटी बड़ी नदी नाले महानदी में समाहित हो जाती हैं। राज्य के जल प्रवाह को एकत्र कर  सारंगढ़ जिला मुख्यालय से सटे जिला संबलपुर (उड़ीसा) तक महानदी ले जाती हैं जहां पर "हीराकुंड " एशिया का सबसे बड़ी बांध हैं। इसका उपयोग उड़ीसा करती आ रही हैं। बाढ़ से उलट जल चिल्का झील बनती हुई बंगाल की खाड़ी (सागर)में समा जाती हैं।
     मतलब छत्तीसगढ़ में महानदी केवल गंगरेल बांध, वह भी भिलाई स्टील प्लांट के लिए बनी हैं। केवल रुद्री बराज से धमतरी,रायपुर, बलौदाबाजार मात्र 3जिला जो कि बांध निर्माण के समय एक ही जिला रायपुर  ही था । इसके महज 30 %ही सिंचित होते हैं कम वर्षा हो तो रुद्री बराज के लिए पानी नहीं देते क्योंकि भिलाई के लिए अनिवार्य पानी चाहिए । यहां बिजली भी कोयला से ताप विद्युत केंद्रों में बनाए जाते हैं। मतलब हमारे घरों की छानी से टपका ओरवाती के पानी खेतों, जंगलों से बहती हुई जल हमारा ही नहीं, कैसी विडंबना हैं? 
    छत्तीसगढ़ में , इंद्रावती, शंखनी डंकनी, पैरी, तेल,
सोढूंर, शिवनाथ, अरपा,हाफ , सेत गंगा, आगर, हसदेव, केलो, लीलागर, जोंक , सोन जैसी महानदी की सहायक नदियां और  सैकड़ों उनकी सहायक नाले और झोरकिया हैं।
    हमलोग महानदी तटवर्ती सिरपुर के समीप चिखली जुनवानी के कृषक हैं । जो कि आरंग पलारी ( कसडोल )विधान सभा के मूल निवासी हैं।बरसात में  खरीफ फसल  धान, उड़द तील आदि बाढ़ की डूबान में तबाह हो जाते हैं।  और रबी फसल के लिए जल स्रोत नहीं हैं,सारा भूजल नदी खींच ले जाती हैं। फलस्वरूप पूरा नदी तटवर्ती इलाका भीषण गरीबी और पलायन की पीड़ा झेलते आ रहे है। 3 दशक पूर्व चितावर और नाले की चुहरी यानि झिरिया के पानी पीने विवश थे। जल स्रोत के लिए छोटी नाला में कच्ची बधानी बांध खेती बाड़ी के लिए हमारे पूर्वजों ने उपाय किए । मै स्वयं हमारे गांव जुनवानी के पतालू नाला को पिता श्री के मार्गदर्शन में श्रमदान करते कच्चा बधानी बांधे और निस्तार करते थे। कछार क्षेत्र में झरिया कुआं बनाकर  टेड़ा बाडी (अब सौर पंप लगाकर) अक्टू से फरवरी 5 महीने कठोर परिश्रम कर जीवन निर्वहन करते आ रहे हैं। मतलब नदी हमारे लिए वरदान होते वह  उचित प्रबंधन स्टॉप डेम आदि नहीं होने से अभिशाप टाइप ही रहा।
     अब वर्षा कम होने से बाढ़ की दंश से जरूर बचे लेकिन भूजल नहीं होने से हालात यथावत हैं। नदी तीर रहकर प्यासा हैं। हमलोग हर दस किमी में स्टॉप डेम खासकर सिरपुर जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी बार अभ्यारण  को छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमांचल को जोड़ने पुल और रुद्री बराज जैसे ही समोदा डायवर्शन बनवाने प्रस्ताव हेतु जनजागरण चलाते रहे। समकालीन समय में पलारी विधायक  रामलाल भारद्वाज (भवानीपुर )और हमारे शिक्षक पिताश्री सुकालदास भतपहरी (जुनवानीसहपाठी थे) बिसौहा गुरुजी चिखली इत्यादि लोगों ने प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को समोदा डायवर्शन के लिए सलाह दिए तब  मेरे अनुज सुनील भतपहरी पानी पंचायत कनकी ( खरोरा)सब डिविजन का अध्यक्ष था। इन प्रतिनिधियों ने निवेदन किया कि इससे ट्रांस महानदी क्षेत्र में खुशहाली आएगी पर्यटन बढ़ेगा । सब्जी बाड़ी, डेयरी,मत्स्याखेट जैसे उद्यम बढ़ेगा और लाखों लोगों को रोजी_ रोजगार मिलेगा । परिक्षेत्र में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद  पलायन कर जाते हैं वह थमेगा,परन्तु समकालीन सत्ता समोदा में स्टॉप डेम बनाकर  महानदी का पानी निजी पॉवर प्लांट खरोरा को पानी बेच दिया गया। जनता ठगे से रह गए ! समोदा बराज डायवर्शन (निसदा आरंग) से आज पर्यन्त इस दिशा कार्य नहीं हुआ ताकि क्षेत्र के कृषकों को लाभ मिल सकें। बल्कि यहां से नवा रायपुर के लिए पानी जाएगा यह बातें हो रही हैं।
  सच कहे इस अनु जाति वर्गों के लिए सुरक्षित क्षेत्र में ढंग से नेतृत्व नहीं पनप सका या पनपने नहीं दिया गया। आरम्भ से विधानसभा क्षेत्र होने के बाद कोई मंत्री नहीं बन सका। और तो और कोई उद्योग व्यापार भी नहीं स्थापित हो सका। लोक सभा भी सारंगढ़ (वर्तमान जांजगीर) रहा जो जितने उपेक्षित दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र था उन्हें मिलकर 3_4 जिलों में विस्तारित क्षेत्र को हास्यास्पद टाइप का सीमांकन कर लोकसभा के लिए आरक्षित कर दिया गया ताकि गुरु घासीदास बाबा और वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि वाला भूभाग विकास से कोसो दूर रहे। जहां सामाजिक क्रांति और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंका गया आजादी के बाद उन रण बांकुरों के वंशज अकाल और बाढ़ का दंश झेलते पलायन करने बेबश रहे। दुर्भाग्य से आजादी के बाद आज तक लोकसभा का प्रतिनिधि निष्क्रिय और प्रभावहीन रहा या उन्हें ऐसा रहने पार्टी प्रमुखों ने निर्देशित कर रखा हैं कि क्षेत्र के विकास हेतु राष्ट्रीय परिदृश्य कोई स्वर ही नहीं गूंजता। इसलिए आजतक यह परिक्षेत्र उपेक्षित हैं।
            उड़ीसा सरकार नहीं चाहती की महानदी में बराज या स्टॉप डेम बने ।वो महानदी को खासकर छत्तीसगढ़ के आंतरिक जल प्रवाह को निचोड़ ले रहा हैं। यह कैसे संभव  हुआ ? कौन दोषी हैं?छत्तीसगढ़ से समृद्ध  और प्राचीन उड़ीसा राज्य अपने विशाल सागर तट से विशाल जलराशि से आधुनिक तकनीक से बिजली सिंचाई की व्यवस्था कर सकते है । अंतराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यवसाय हैं और अरबों की कमाई हैं वे लोग पीने के लिए प्लाट लगा कर समुद्र की जल को नल जल योजना से सुदूर क्षेत्र तक पहुंचा सकते हैं। कृषि में उपयोग कर सकते हैं परन्तु छत्तीसगढ़ के पास महानदी को छोड़कर क्या विकल्प हैं? इनके बिना तो हमारा संसार ही प्यासा और सुनसान वीरान हैं। उस पर पूरा हक जताना और तमाम योजनाओं पर रोक लगवाना क्या उचित हैं? 
   छत्तीसगढ़ शासन_ प्रशासन को चाहिए कि राज्य के लिए वरदान नदी_ नाले के जल प्रवाह को अच्छी तरह प्रयोग करे, यूं ही समुद्र में बहाने न छोड़ दे। सर्वाधिक पलायन नदी क्षेत्र लोग क्यों करते हैं ? इन पर गंभीरता पूर्वक विचार कर उस क्षेत्र के नागरिकों से सलाह मशविरा कर जन कल्याणकारी योजना बनावे। क्योंकि छत्तीसगढ़ का लाईफ लाईन महानदी हैं और महानदी से ही छत्तीसगढ़ का महाकल्याण होना हैं। उड़ीसा का लाईफ लाईन तो महासागर हैं उनका उचित दोहन करें।

जय छत्तीसगढ़ ,जय भारत 

   जय छत्तीसगढ़

डॉ अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514