Friday, May 3, 2019

सतनामी समाज और धर्मांतरण

गुरुघासीदास सांस्कृतिक भवन न्यू राजेन्द्र नगर रायपुर में प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज द्वारा आयोजित प्रदेश स्तरीय बैठक में निर्धारित विषय के अतिरिक्त एक सज्जन द्वारा वर्तमान में सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा समाज में हो रहे धर्मांतरण पर ध्यान आकृष्ट कराए गये और कहे कि आज समाज में चारो ओर बिखराव का दौर चल रहे है ।कोई ईसाई -इस्लाम  कोई बौद्ध सिख   आदि धर्म अंगीकृत कर रहे है।तो कोई अनेक मत संप्रदाय को मानने लगे है जिसमें राधा स्वामी  सतपाल निरंकारी गायत्री या अन्य संगठन में  समय और संधाधन लगा रहे है?
   उक्त विषय पर केन्द्रित हमने उपस्थित जन समूह के मध्य विनम्रता पूर्वक  अपनी  बाते रखे ताकि भोजन अवकाश पर सहज रुप से लोग इन पर परस्पर बात चीत करे और भोजनोपरान्त  या बाद में कोई निष्कर्ष निकले ।
     वाकिय में यह गंभीर समस्या हैं ।सतनाम धर्म के सभी घटक  गुरु संत महंत एंव अनेक संस्थाओं के पदाधिकारियों को सतनामियों की अस्तित्व रक्षा हेतु सार्थक पहल करने की आवश्यकता हैं। अभी तो छिटपुट यह धर्मांतरण  जारी हैं और इसे करने वाले अधिकतर हमारे साक्षर  व  सक्षम लोग है । जो शहरों में नियमित रोजी रोटी पाकर  वर्तमान में  उनकी परिस्थितियां ग्रामीण समुदाय से  बेहतर  हो चले है । अत: उनके अनुशरण  करते जरुरत मंद लग शैन: शैन: धर्मांतरित हो  जाएन्गे और ऐसा समय आएगा "अब  पछताए क्या जब  चीडिया चुग ग ई खेत " की स्थिति निर्मित हो जाएगें !वैसे भी बड़े व अन्तर्राष्ट्रीय धर्मों का यह एजेण्डा ही हैं कि संसार के  मानव समुदाय को अपने -अपने  पक्ष में रखे या अनुयाई बना ले।
       बहरहाल सबसे बड़ा सवाल हैं कि क्या सतनामियों के अपने धर्म है भी कि यह धर्मविहिन समाज हैं? क्योकि हम सरकारी दस्तावेज में हिन्दू तो लिखते हैं पर क्या हिन्दू जन हमें अपने आयोजनों यथा भागवत, रामायण उत्सव मेले व  धार्मिक कार्यक्रम में  आमंत्रण सहित भागीदारी बनाते  हैं? क्या हमें पांच पौनियों की सेवाएं मिलती हैं? जीते जी संग साथ तो नहीं मृत्युपरान्त भी शमसान धाट अलग हैं। इस तरह आज भी सामाजिक रुप से भेदभाव जारी हैं। अनेक कानून बने होने के बावजूद यह आबाध जारी हैं। भले व्यक्तिगत किसी का व्यवहार अच्छा हो पर आज भी सार्वजनिक व सामूहिक रुप से दूरियाँ कायम हैं। किसी भी दृष्टिकोण से सतनामियों को हिन्दू धोषित नहीं की जा सकती ।रीति -नीति संस्कृति उनसे बिल्कुल अलग थलग हैं। हां राजनैतिक दृष्टिकोण से संबंध बनाए जाने की कयावदे केवल मृग-मरीचिका सदृश्य हैं।
     ऐसे में जबरियां हिन्दू बने रहने का क्या औचित्य हैं? वाकिय में जिन्हें इन प्रश्नों का उचित समाधनान नहीं मिलते वे लोग बड़ी तेजी जहां आदर और सुविधाएं मिल रहे हैं वहाँ जा रहे हैं। संविधान द्वारा सभी देशवासियों को धार्मिक स्वतंत्रता का  मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। इनपर कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते और न करना चाहिए।
         एक तरफ यह भी देखने मिलते हैं कि बहुत साधन सक्षम लोग जो बहुसंख्यकों के साथ हैं। उनके अनुशरण करते वही करने लगे हैं। जहां से हमारे  गुरुओं ने मुक्त करवाकर यहां तक लाए ।
   सतनाम के जितने भी अनुकरणीय सिद्धान्त हैं। वह तोता रटंत जैसे होकर रह गये हैं। हम उन्हे  कंठस्थ कर तो रहे हैं। पर उसे मन बुद्धि हृदय में धारण नहीं कर पा रहे हैं। और सभी प्राचारक उपदेशक बने बैठे आदेश निर्देश देने में लगे हुए हैं! या अपनी ढ़फली अपनी राग अलापे जा रहे हैं। अपने ही लोग ले देकर  स्थापित मान्यताओं व परंपराओं का अजीबोगरीब ढंग से या कही से प्रयोजित रुप से विरोध   किए जा रहे हैं। ताकि जो थोड़ा बहुत संगठित हैं। वह भी बिखर जाय। आरम्भ से सडयंत्र पूर्वक बिखराव हुआ हैं उसे और भी हवाएँ दिए जाने की कुत्सित प्रयास जारी है।
  बहरहाल क्या हमने अपनी संस्कृति को परिमार्जित करने और उन्हें निरतंर नव पीढ़ी को धारण करने आयोजन करते हैं?  या सतनाम को धर्म के रुप में परिष्कृत कर उनके व्यापक प्रचार प्रसार के कार्य निष्पादन कर रहे हैं? यदि जनमानस को आध्यात्मिक व धार्मिक रुप से संतुष्ट नहीं कर पाएन्गे तो वह उस आवश्यकता को पूर्ति करने अन्यत्र पलायन करेन्गे ही ।
     इसे रोकने  के लिए प्रतिबंध /दंड आदि करेन्गे तो यह गैर संवैधानिक कार्य होगा ।फलस्वरुप हम अपनी  आयोजनों को  बेहतर  और निरन्तर करने होन्गे! ताकि लोगों को पता चले कि सतनामियों के भी अपने विशिष्ट आयोजन व्रत उत्सव हैं।
      हमारी महिलाएँ जो अपेक्षाकृत पुरुषों से अधिक धार्मिक प्रकृति के होती है  के लिए कोई ऐसा व्रत उत्सव भी हो ताकि वह उसे मनाकर अपनी आध्यात्मिक व धार्मिक प्रवृत्तियाँ को पूर्ण कर सके ।ऐसा नहीं होने के कारण वे  अधिकतर उन्हें मानने विवश है जिससे हमारी अपनी कोई पहचान कायम नहीं होते और न ही अपेक्षित मान सम्मान ।बल्कि अवहेलना के शिकार होते है ,यह अजीब विडंबना हैं कि जो समुदाय हमसे  ईर्ष्या द्वेष भाव व तिरस्कार करते आ रहे उन्ही के अराध्यों और उनके ही व्रत उत्सव के लिए सतनामी समाज  अपना सर्वस्व न्योछावर करते आ रहे हैं।
     अब समय हैं कि अपनी आस्था व श्रद्धा के प्रतिमानों को निष्ठा पूर्वक ही नहीं उत्साह और शानो शौकत से माने ।
      सतनाम धर्म संस्कृति से संदर्भित वर्ष भर के लिए व्रत त्योहार मेले इसलिए प्रचलन में लाए गये हैं। समय- समय पर उसे पत्र -पत्रिकाओं में प्रचारित- प्रसारित भी किए जा रहे हैं। तथा समाज में इनके लिए सतयुग संसार व गुरुघासीदास कलेंडर भी प्रचलन में है  जिसमें इन सबका उल्लेख है। उसे घर- घर रखे और विधि विधान पूर्वक आयोजन करे।  तब कही जाकर हमारे समाज एंव पंथ  से लोग अन्यत्र पलायन नहीं करेन्गे अपितु अन्य जगहों से आकर  मिलेन्गे आत्मसात होन्गे। ‌
   कृपया कम लिखे को  अधिक समझे  और इसके ऊपर गहनतापूर्वक विचार करते अपनो के बीच विचरार्थ व जानकारी के निमित्त  शेयर करें । प्रतिक्रिया भी दे क्योकि यह मुद्दा वाकिय में  गंभीरता पूर्वक विचारणीय  हैं। हमें अपनी अस्मिता और पहचान कायम रखनी हैं जिसे सद्गुरु घासीदास ने कठोर तपस्या कर मानव कल्याण के निमित्त संसार को प्रदान किया हैं। जो जगत में सतनाम‌ पंथ के रुप में प्रवर्तित  एंव सतनाम धर्म के रुप में प्रतिष्ठित होने वाला  हैं।

        * संसार सतनाम मय हो *

          ।। जय सतनाम ।।
      -डा. अनिल भतपहरी

Thursday, May 2, 2019

सतनामी समाज और धर्मांतरण

सतनामी समाज और धर्मांतरण

गुरुघासीदास सांस्कृतिक भवन न्यू राजेन्द्र नगर रायपुर में प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज द्वारा आयोजित प्रदेश स्तरीय बैठक में निर्धारित विषय के अतिरिक्त एक सज्जन द्वारा वर्तमान में सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा समाज में हो रहे धर्मांतरण पर ध्यान आकृष्ट कराए गये और कहे कि आज समाज में चारो ओर बिखराव का दौर चल रहे है ।कोई ईसाई -इस्लाम  कोई बौद्ध सिख   आदि धर्म अंगीकृत कर रहे है।तो कोई अनेक मत संप्रदाय को मानने लगे है जिसमें राधा स्वामी  सतपाल निरंकारी गायत्री या अन्य संगठन में  समय और संधाधन लगा रहे है?
   उक्त विषय पर केन्द्रित हमने उपस्थित जन समूह के मध्य विनम्रता पूर्वक  अपनी  बाते रखे ताकि भोजन अवकाश पर सहज रुप से लोग इन पर परस्पर बात चीत करे और भोजनोपरान्त  या बाद में कोई निष्कर्ष निकले ।
     वाकिय में यह गंभीर समस्या हैं ।सतनाम धर्म के सभी घटक  गुरु संत महंत एंव अनेक संस्थाओं के पदाधिकारियों को सतनामियों की अस्तित्व रक्षा हेतु सार्थक पहल करने की आवश्यकता हैं। अभी तो छिटपुट यह धर्मांतरण  जारी हैं और इसे करने वाले अधिकतर हमारे साक्षर  व  सक्षम लोग है । जो शहरों में नियमित रोजी रोटी पाकर  वर्तमान में  उनकी परिस्थितियां ग्रामीण समुदाय से  बेहतर  हो चले है । अत: उनके अनुशरण  करते जरुरत मंद लग शैन: शैन: धर्मांतरित हो  जाएन्गे और ऐसा समय आएगा "अब  पछताए क्या जब  चीडिया चुग ग ई खेत " की स्थिति निर्मित हो जाएगें !वैसे भी बड़े व अन्तर्राष्ट्रीय धर्मों का यह एजेण्डा ही हैं कि संसार के  मानव समुदाय को अपने -अपने  पक्ष में रखे या अनुयाई बना ले।
       बहरहाल सबसे बड़ा सवाल हैं कि क्या सतनामियों के अपने धर्म है भी कि यह धर्मविहिन समाज हैं? क्योकि हम सरकारी दस्तावेज में हिन्दू तो लिखते हैं पर क्या हिन्दू जन हमें अपने आयोजनों यथा भागवत, रामायण उत्सव मेले व  धार्मिक कार्यक्रम में  आमंत्रण सहित भागीदारी बनाते  हैं? क्या हमें पांच पौनियों की सेवाएं मिलती हैं? जीते जी संग साथ तो नहीं मृत्युपरान्त भी शमसान धाट अलग हैं। इस तरह आज भी सामाजिक रुप से भेदभाव जारी हैं। अनेक कानून बने होने के बावजूद यह आबाध जारी हैं। भले व्यक्तिगत किसी का व्यवहार अच्छा हो पर आज भी सार्वजनिक व सामूहिक रुप से दूरियाँ कायम हैं। किसी भी दृष्टिकोण से सतनामियों को हिन्दू धोषित नहीं की जा सकती ।रीति -नीति संस्कृति उनसे बिल्कुल अलग थलग हैं। हां राजनैतिक दृष्टिकोण से संबंध बनाए जाने की कयावदे केवल मृग-मरीचिका सदृश्य हैं।
     ऐसे में जबरियां हिन्दू बने रहने का क्या औचित्य हैं? वाकिय में जिन्हें इन प्रश्नों का उचित समाधनान नहीं मिलते वे लोग बड़ी तेजी जहां आदर और सुविधाएं मिल रहे हैं वहाँ जा रहे हैं। संविधान द्वारा सभी देशवासियों को धार्मिक स्वतंत्रता का  मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। इनपर कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते और न करना चाहिए।
         एक तरफ यह भी देखने मिलते हैं कि बहुत साधन सक्षम लोग जो बहुसंख्यकों के साथ हैं। उनके अनुशरण करते वही करने लगे हैं। जहां से हमारे  गुरुओं ने मुक्त करवाकर यहां तक लाए ।
   सतनाम के जितने भी अनुकरणीय सिद्धान्त हैं। वह तोता रटंत जैसे होकर रह गये हैं। हम उन्हे  कंठस्थ कर तो रहे हैं। पर उसे मन बुद्धि हृदय में धारण नहीं कर पा रहे हैं। और सभी प्राचारक उपदेशक बने बैठे आदेश निर्देश देने में लगे हुए हैं! या अपनी ढ़फली अपनी राग अलापे जा रहे हैं। अपने ही लोग ले देकर  स्थापित मान्यताओं व परंपराओं का अजीबोगरीब ढंग से या कही से प्रयोजित रुप से विरोध   किए जा रहे हैं। ताकि जो थोड़ा बहुत संगठित हैं। वह भी बिखर जाय। आरम्भ से सडयंत्र पूर्वक बिखराव हुआ हैं उसे और भी हवाएँ दिए जाने की कुत्सित प्रयास जारी है।
  बहरहाल क्या हमने अपनी संस्कृति को परिमार्जित करने और उन्हें निरतंर नव पीढ़ी को धारण करने आयोजन करते हैं?  या सतनाम को धर्म के रुप में परिष्कृत कर उनके व्यापक प्रचार प्रसार के कार्य निष्पादन कर रहे हैं? यदि जनमानस को आध्यात्मिक व धार्मिक रुप से संतुष्ट नहीं कर पाएन्गे तो वह उस आवश्यकता को पूर्ति करने अन्यत्र पलायन करेन्गे ही ।
     इसे रोकने  के लिए प्रतिबंध /दंड आदि करेन्गे तो यह गैर संवैधानिक कार्य होगा ।फलस्वरुप हम अपनी  आयोजनों को  बेहतर  और निरन्तर करने होन्गे! ताकि लोगों को पता चले कि सतनामियों के भी अपने विशिष्ट आयोजन व्रत उत्सव हैं।
      हमारी महिलाएँ जो अपेक्षाकृत पुरुषों से अधिक धार्मिक प्रकृति के होती है  के लिए कोई ऐसा व्रत उत्सव भी हो ताकि वह उसे मनाकर अपनी आध्यात्मिक व धार्मिक प्रवृत्तियाँ को पूर्ण कर सके ।ऐसा नहीं होने के कारण वे  अधिकतर उन्हें मानने विवश है जिससे हमारी अपनी कोई पहचान कायम नहीं होते और न ही अपेक्षित मान सम्मान ।बल्कि अवहेलना के शिकार होते है ,यह अजीब विडंबना हैं कि जो समुदाय हमसे  ईर्ष्या द्वेष भाव व तिरस्कार करते आ रहे उन्ही के अराध्यों और उनके ही व्रत उत्सव के लिए सतनामी समाज  अपना सर्वस्व न्योछावर करते आ रहे हैं।
     अब समय हैं कि अपनी आस्था व श्रद्धा के प्रतिमानों को निष्ठा पूर्वक ही नहीं उत्साह और शानो शौकत से माने ।
      सतनाम धर्म संस्कृति से संदर्भित वर्ष भर के लिए व्रत त्योहार मेले इसलिए प्रचलन में लाए गये हैं। समय- समय पर उसे पत्र -पत्रिकाओं में प्रचारित- प्रसारित भी किए जा रहे हैं। तथा समाज में इनके लिए सतयुग संसार व गुरुघासीदास कलेंडर भी प्रचलन में है  जिसमें इन सबका उल्लेख है। उसे घर- घर रखे और विधि विधान पूर्वक आयोजन करे।  तब कही जाकर हमारे समाज एंव पंथ  से लोग अन्यत्र पलायन नहीं करेन्गे अपितु अन्य जगहों से आकर  मिलेन्गे आत्मसात होन्गे। ‌
   कृपया कम लिखे को  अधिक समझे  और इसके ऊपर गहनतापूर्वक विचार करते अपनो के बीच विचरार्थ व जानकारी के निमित्त  शेयर करें । प्रतिक्रिया भी दे क्योकि यह मुद्दा वाकिय में  गंभीरता पूर्वक विचारणीय  हैं। हमें अपनी अस्मिता और पहचान कायम रखनी हैं जिसे सद्गुरु घासीदास ने कठोर तपस्या कर मानव कल्याण के निमित्त संसार को प्रदान किया हैं। जो जगत में सतनाम‌ पंथ के रुप में प्रवर्तित  एंव सतनाम धर्म के रुप में प्रतिष्ठित होने वाला  हैं।

        * संसार सतनाम मय हो *

          ।। जय सतनाम ।।
      -डा. अनिल भतपहरी

Friday, April 26, 2019

ददरिया

"ददरिया "

      दादर परिक्षेत्र में गाई जाने वाली प्रणय गीत को ददरिया कहते हैं।  दादर  उड़िया मिश्रित छत्तीसगढी के लरिया बोली के शब्द हैं। इसका अर्थ  वह परिक्षेत्र हैं‌ जो कि  मधुवन या वृंदावन जैसा रमणीय वन्यभूमि  हैं। वहां प्रेमी युगल‌ परस्पर मिलकर मधुर गान नर्तन करते अनेक तरह के हास विलास परिहास शिकवा शिकायत उलाहना और नोक झोंक करते प्रेमल वक्त गुजारते हैं।
      अक्सर उड़ीसा सीमावर्ती छत्तीसगढ के ग्रामों के खेत के आगे  दादर मिलते यह वह जगह हैं जहां पर छोटे वृक्ष के फलदार व छायादार  महुआ चार तेन्दू के वृक्ष और  सुंगधित कोरिया सिलयारी  वन तुलसा जिसे वृंदा झाड़ी कहते हैं का  रम्य उद्यान होते हैं। उसके आगे सोर्रा पहाड़ी नाला और उस पार सधन व बीहड़ जंगल होते हैं। उसके आगे पहाड़ पर्वत मलाएं । जहां  हिंसक जंगली जानवर और डरावनी भुल भुलैया रास्ते वाली वन प्रांतर होते हैं। अत: दादर ही वह रम्य वन होते हैं‌ जहां प्रेमी युगल निर्भीकता से मिलते हैं। और क्रियाकलाप में अनुरक्त होते हैं। इसलिए दादर का गीत होने से यह ददरिया के नाम से विख्यात हुई।

     गांव से लगा खेत होते हैं। जहां प्रायः लोगों की आम दरफ्त रहते हैं। और दिन भर चहल पहल के फलस्वरूप यहाँ प्रेमी युगल  तटस्थ रहकर मर्यादित रहते है।वहां अक्सर बडे बुजुर्ग और रिश्तेदार रहते हैं। फलस्वरूप वहा पर कथा -कहानी गीत भजन आदि चलते हैं। वहां वे भी प्रतिभागी हो सकते हैं। पर वहां प्रेम नहीं बल्कि  भक्ति भजन रीति -नीति, संस्कृति के गीत कहानी होते हैं।
   पर यह तो है कि हमारे ग्राम्य अंचल का वृंदावन जहां राधा कृष्ण सहित गोपियों का महारास हुए  यह खेतों से लगा  खार छेत्र है  जिसे हम दादर कहते हैं। वही इनकी उत्पत्ति हुई ।और इसलिए लोकप्रिय  ददरिया नाम पड़ा।
      हर युवा पुरुष मन कृष्ण है ।और हर युवा स्त्री मन राधा ।
  दोनो के मिलन छेत्र ही दादर  वृंदावन की कुंज गली हैं। जहां प्रेम भाव से युक्त त्याग और समर्पण का मधुर ददरिया गीत लोक कंठ से प्रस्फुटित होते हैं।इस में उन्मुक्त भाव से प्रणय निवेदन हास परिहास उलाहना शिकवा शिकायत ब्याज स्तुति आदि भाव से युक्त काव्यात्मक पंक्ति की उक्ति होते हैं। यह निम्न पंक्तियों में देखे जा सकते है-

    फुटहा रे मंदिर कलस नइये ।
      काली के अव इय्या दरस नइये ।।

   ददरिया दोहा छंद नुमा दो पंक्ति के होते हैं जिसमें प्राय:  पहली पंक्ति से दूसरी पंक्ति का  केवल तुकबंदी‌ संबंध  होते हैं और दोनो  में परस्पर कोई संबंध नहीं होते।अर्थात स्वतंत्र पद रचना होते हैं। यह आरम्भ में नायक और नायिका की अपनी सीमित सोच अनुभव और अपनी बाते सीधे न कहकर मुकरते हुए पहेली बुझने या किसी अन्य को प्रतीकात्मक रुप से व्यंग उलाहना कहने से आरम्भ हुआ। ताकि प्रेमी बुरा न माने नराज न हो और अपनी बाते कहे।या ऐसा प्रतिमान गढ़कर कहे कि उनकी भोगे संत्रास या पीड़ा कितने संहारक है उसे वह भी अनुभव करे। ऐसा कह सुन दोनो भाव विह्वल भी हुआ करते हैं-

    नवा सड़किया गड़े ल गिट्टी ।
       काकर बर भेजे  तय बैरंग चिठ्ठी ।।
   
     एकान्त में प्रेमी मिलते हैं शिकवे शिकायत होते है ,नोक झोक और मस्ती भी जरा इन पंक्तियों के भावार्थ देखे -

गांजा के थैली म गांजा नइये ।
गंजहा ल बनाए फेर मंजा निये।।
 
इसी तरह संस्मरण में घटे  अभ्यावेदन देखे-

चिकनी रे पथरा छपक कांचेव ।
  तोर सुरता मं संगी गजब हांसेव ।।

    चलते चलते प्रणय याचना के दर्म्यान  नायिका/नायक की मनोदशा का  का खुबसूरती से वर्णन द्रष्टव्य है-

  कांचा लिमउव्वा के रस चुचवाय ।
  रद्दा बीच रस मांगें मं मन कचवाय ।।

   ददरिया इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि यह केवल प्रेमी युगलों के मघ्य  प्रणय  निवेदन ,नोकझोक हास -परिहास ,उलाहना  मस्ती  आदि से आगे बढ़कर बड़े बुजुर्गों और बेटियों के प्रति माताओं या भाभियों चाचियों मामियों की सीखौना भी गांव घर आंगन में गुंज उठी -

  हड़िया के मारे तेलई फूट जाय।

चारी - चुगरी के मारे जोड़ी छूट जाय।।
बडे बुजुर्ग भी ददरिया की लोकप्रियता से कैसे अछूते होन्गे वह भी उपदेशना करते सञग साथ में होते गा उठते हैं-

फूटहा हे पतरी अउ फूटहा रे दोना।
करम ठठाए पेज गंवागे चारो कोना ।।

   मया के मरम न समझ सकने वालों के लिए इससे बढ़कर क्या उलाहना हो सकते है -

सरहा शिकार मं मसाला खइता ।
भोंगाचंद मन बर मया हे खइता।।

   और क्या प्रेम छुपाए छुप सकता है ? यहां तो जुबान भले न चले ईशारे से सब बयान हो जाते हैं-

अकरस के नांगर दबाए नइ दबय।
तोर मोर मया संगी छुपाए नइ छुपय ।।

   ददरिया का प्रभाव  भाव भक्ति‌ में  पड़ा  खेतों में काम करते भाव विह्वल होकर भक्त अपने अराध्य को ददरिया गाकर सुमर लेते  हैं -
 
धान ल लुए उड़े ल कंसी ।
   भगवान के मंदिर ले सुनाय बंशी  ।।

   इस तरह हम देखते है कि ददरिया अत्यंत लोकप्रिय श्रृंगारिक रचना उर्दू में  गज़ल की शेर की तरह  दो प्रेमियों के मध्य एकांतिक छण में मयारुक  "बतरस" या गुफ्त़गूं के रुप में प्रकट हुए और इतना व्यापक प्रसार हुआ।
    जैसे  भारतीय काव्य में  श्लोक दोहा प्रभावशाली है।  अरबी फारसी उर्दू में शेर और शायरी उसी तरह छत्तीसगढ़ी में ददरिया की दो डांड लोगों की जुबान पर चढ़कर  बोलने लगे।
    अधिकतर पारंपरिक प्रेम  गीतों में चाहे वह  ददरिया करमा सुआ जस भोजली भजन  आदि हो उसमें भी ददरिया की दो डांड की प्रभावशाली उपस्थिति देखें -

नवा रे हंसिया के जरहा हे बेंठ।
  जीवत जागत रहिबोन त हो ई जाही भेंट ।।

इन लोक विधा को लेकर नव सर्जक अनेक तरह के प्रयोग कर उसे और भी सुघड़ और भावप्रवण कर रहे है ।वही अति प्रयोग और आधुनिकता  से अपनी स्वाभाविक संप्रेषणीयता से बाधित हो कृत्रिम और हल्के पन भी आने लगे है। बावजूद वह नव पीढी को उनके अपने अंदाज में मोहित करते रहे हैं-
 
गाड़ी चलाए स्टेरिंग ल धर के ।
  मोबाइल मं बुलाए चैटिंग कर के।।
     जैसे पंक्तियाँ भी श्रवणीय होने लगे हैं।
    इस तरह नव कलेवर से ददरिया मंच और रजत पटों की शोभा बनी हुई हैं।
   जैसे रसराज श्रृंगार हैं ठीक गीतों की राजा छत्तीसगढ़ में ददरिया हैं।

-डा. अनिल भतपहरी 

स्रोत / सौजन्य - श्री  सी.आर. साहनी

Thursday, April 25, 2019

छत्तीसगढ़ के पिछड़ेपन का कारण

छत्तीसगढ के पिछड़े पन का प्रमुख कारण जातिवाद हैं।
परन्तु दूर्भाग्यवश इनके उन्मूलन का कभी  इमानदार या प्रभावी प्रयास कभी  नहीं किया गया।
  यहां प्रचुर नैसर्गिक व मानव  संशाधन हैं। परन्तु इनका उचित दोहन या उपयोग ही नहीं किए जाते।लाखों मेहनत कश मजदूर जी तोड़ मेहनत करने अन्यत्र पलायन कर जाते हैं। और बाहर से लोग आकर यहां छुट-पुट व्यवसाय  निजी व शासकीय नौकरी, शराब भट्ठियों में गद्दीदार लठैत व  वसुली कर्ता  तथा  रोज नगद बाट कर रोज वसुली का गेम हमारे ग्रामीण व शहरो के झुग्गी झोपड़ियों में ब्याज और महाजनी का अवैध करोबर चला रहे हैं।
  सुखा अकाल या बेमौसम बारिश का मार कृषक पर ही सर्वाधिक पड़ता हैं।  इन सबके होते हुए भी ग्रामीण अंचलों में जातिभेद चरम हैं। परस्पर मन मुटाव व ईष्या द्वेष के चलते  अधिकतर लोग थाना कोर्ट कचहरी में पेशी आदि के नाम पर  रगड़ा  रहे हैं। भले लोग छत्तीसगढ़िया  सबले बढ़िया व सिधवा कहे जाते हैं। पर हकीकत में ऐसा नहीं हैं।
      लोकतंत्र का आधार चुनाव हैं। पर यहां  बिना शराब मांस व प्रलोभन के निर्वाचन  संपन्न ही नहीं होते।और जो  लोग अकूत धनराशि खर्च कर जीत जाते हैं। अपना खर्च वसुलते हैं।  इस तरह देखा जाय तो यह व्यवसाय के रुप में फलने फूलने लगा है। राजनीति रोजी रोजगार और कमाने खाने का जरिया बनते जा रहे हैं।.तो इस तरह  अनेक  समस्याएं हैं।
       बेरोजगारी शराब नशा खोरी से छत्तीसगढ आक्रान्त हैं।
राजस्थान हरियाणा पंजाब से बड़ी बड़ी  ट्रेक्टर हार्वेस्टर एंव सड़क ठ निर्माण में जेसीबी हाइवा रोडरोलर आदि से यांत्रिकी करण बढने से मानवीय श्रम कृषि व  लगभग बडी निर्माण में खत्म सा हो गये हैं।
           सरकार का दावा जो हो पर जमीनी सच्चाई यही हैं। ग्रामों में केवल बुज़ुर्ग व्यसनी व प्रमादी व बीमार लोगो का जमवाडा हैं। जो सक्रीय हैं वे शहरों में बन रहे कालोनियों भवनो में राजमिस्त्री लेवर के रुप में खप रहे हैं।अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि छिटपुट. पंचायतों में सरकारी काम मिल जाय पर भुगतन समय पर नहीं है इसलिए ग्रामीण जनजीवन का  शहरों में पलायन जा्री है  जहां पर रहने खाने और जीवन निर्वहन  की विकट समस्या है । भला हो नीजि बिल्डरो कालोनाइजरों का जिन्होने बडी संख्या में  इनलोगो को रोजगार उपलब्ध कराए हैं। अन्यथा रोजी रोजगार हेतु श्रमिक मजदूर के रुप में पलायन ही यहां एकमात्र सरल सहज  विकल्प  हैं। जो होना नहीं चाहिए।
           डा. अनिल भतपहरी