Sunday, January 9, 2022

शांत छत्तीसगढ़ को अशांति का बीजारोपण

#anilbhatphari 

।शांत छत्तीसगढ़ में अशांति का बीजारोपण ।।

छत्तीसगढ़ शांति व सौख्य की भूमि हैं। अनादिकाल से  जनजीवन श्रमण व सत संस्कृति का संवाहक हैं। लोग कर्मवादी है और" अपन भरोसा तीन परोसा खाकर " कृषि व  वनोत्पाद से संतुष्ट संतों- गुरुओं की सीख से सुखमय जीवन -निर्वाह करते आ रहे हैं। गाँवों में अनेक जातियाँ निवास करती हैं पर उनमें एक आत्मीय भाव भरे हुए होते हैं। परस्पर मीत- मितानी  आदि से भाई ,दीदी  कका- ममा आदि स्नेहिल रिश्तों से बंधे हुए होते हैं। क्योंकि उन्हें पता हैं संबंधों   की‌ शक्ति  ही सहयोग करते हैं। कोई ऊपरी या बाहरी शक्ति नहीं जो प्रत्यक्ष लाभ दे सकें। इस बात को बहुत ही सहज -सरल ढंग  हमारे गुरुओं संतों ने समझा दिए हैं।
     आजादी के आसपास पर प्रांतिकों के पलायन कर आगमन  और उनकी अपनी अपनी मान्यताए तथा अपने प्रभाव आदि के लिए अनेक सडयंत्रों से यहां जातिय दुराव और सांस्कृतिक विभेद की नींव पड़ी। इन सबके  बावजूद  ग्राम्य अंचल में तीज -त्यौहार में सभी उत्साह पूर्वक भाग लेते आ रहे हैं। और किसी पेड़ की टहनियों में अनेक घोसलें बनाकर जैसे पंछी बसेरा करते हैं। ठीक गांव ऐसे ही आबाद रहा है।  यहाँ बहुसंख्यक ७५-८०%  जनता सगुण परंपरा के  बहुदेव वाद ,प्रतीक -मूर्ति पूजा के साथ- साथ करीब २०-२५%  जनता निर्गुण पंरपरा के संवाहक है महात्मा कबीर व गुरुघासीदास का बेहद प्रभाव जनजीवन में विद्यमान हैं। इस तरह देखे तो छत्तीसगढ़ की आम जन जीवन सगुण- निर्गुण धारा में आबद्ध  साकार व निराकारोपसक हैं।  सगुण- निगुण नही कछु भेदा कह कर बेहतरीन समवन्य भी हमारे संतो ने किया हैं। 
    और एक- दूसरे की मान्यताओं आस्थाओं पर कोई हस्तक्षेप नहीं बल्कि सम्मान प्रकट करते आ रहे हैं।परन्तु  विगत कुछ वर्षों से प्रायोजित ढंग से निर्गुणोंपासक सतनाम पंथ  के धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण आदि आरोपित कर किताबों ,पत्र -पत्रिकाओं, व्याख्यानों में तथ्य हीन बातें लिख- बोलकर शांत छत्तीसगढ़ को उद्वेलित करने की नापाक  कोशिशें जारी हैं।यह घटना सामाजिक कम राजनैतिक अधिक  नजर आते हैं। 
      समय रहते इनका निदान आवश्यक हैं। अन्यथा इस तरह की  चिंगारी दावानल में कब  तब्दील हो  जाय ?कह नहीं सकते क्योंकि यह आस्था का मामला हैं।  लोग बड़ा- छोटा दिखाने प्रतिभा और विकास की ओर न जाकर शार्टकट धर्म- जाति पंथ की मान्यता रीति- नीति  पर आ जाते हैं।  और गाहे -बगाहे इन्हे छेड़कर महौल को अशांत व उद्वेलित करते हैं ,ताकि आगे चलकर मौके का फायदा उठाया जा सके । यही निकृष्ट मानसिकता के चलते ऐसे धटनाएं जानबूझकर किए जाते हैं। इनकी सुक्ष्म व निष्पक्ष  जांच कर इनके तह में कौन सी छद्म शक्ति काम करती हैं। उनका पर्दाफा़श व उन्मूलन  शासन- प्रशासन को करना चाहिए । घटना छोटी हैं ऐसा समझकर नजर अंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि घटनाएँ तो घटनाएं ही होते हैं। प्रचार तंत्र और मीडिया उन्हें जरुर छोटे बडे रुप देते हैं यह अलग बात है।
        वैसे  इस तरह की घटना के दोषी लोग  सहज ही चिन्हाकित भी होते हैं ,चंद मोहरे व गुर्गों की गिरफ्तारियां भी होती हैं।पर  जो  इनके असल मास्टर माइंड है उस तह तक  अनन्यान कारणों नहीं पहुँच पाते। इसके  चलते दोषियों को  कठोर सजा नहीं  होते फलस्वरुप  क्षतिपूर्ति  या कई छद्म सलाह व मौकापरस्त समझौते आदि  के कारण माफीनामा  आदि से मामले जरुर कुछेक माह या वर्ष के लिए दब सा जाते हैं। पर वह कहीं न कहीं पर  पुनश्च प्रकट हो जाते हैं। ऐसा करके विराट जन समुदाय मनोबल गिराने का  अप्रत्याशित कार्य और वोट या मत ध्रुवीकरण की राजनैतिक सडयंत्र भी प्रायः किए जाते हैं। प्रयोगवादी संस्थान इस तरह के नये नये हथकंडे अपना समाज का रुख जानने का प्रयोग करते हैं। देश या सामाज सेवा के नाम पर गठित दलें व संस्थान  इस तरह लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर इन  "आस्था की  स्थल को प्रयोगशाला बना रहे हैं"  जो कि बेहद  निन्दनीय है और चिन्तनीय है। इनसे न समाज का भला होगा न देश का । बल्कि कुछ दलों के लोगों को आक्रोशित और उन्मादित  लोगों का समर्थन जरुर मिल सकता हैं। पर ऐसे समर्थन से सत्ता हासिल  नही होगी अगर खुदा न खास्ता हो भी ग ई तो   ऐसी सत्ता से जनकल्याण  हो ही नहीं सकता। शांत छत्तीसगढ़ में अशांति का बीजारोपण कर नफरत -द्वेष का  फसल उगाने की नापाक कोशिशे हो रही हैं।  इन पर त्वरित प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। 
    बस्तर की नीरिह व साधनहीन  आदिवासी समुदाय जल जमीन जंगल के नाम पर आंदोलित ‌भटकने लगे हैं। कही वही परिस्थितियाँ यहां न पनप जाय इन पर बहुत ही गंभीरतापूर्वक विचार करते निर्णय लेना होगा। 
     बहरहाल चिंगारियां  आपस में सटे एक ही प्रजाति के वृक्षों की टहनियों के परस्पर रगड़ से भी निकलती हैं उन चिंगारी से जंगल जल कर खाक हो जाते  हैं। इसलिए चाहिए कि उनका  तत्क्षण उचित ढंग से शमन कर दिया जाय ... अन्यथा सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं बचा रहेगा ?

-डाॅ. अनिल भतपहरी

Saturday, January 8, 2022

ममा भांचा

#anilbhatpahari 

"ममा -भांचा" 

छत्तीसगढ़ म ममा -भांचा बड़ पावन रिस्ता आय । बुढ़वा ममा अपन दुधमुहां भाजा के तको पांव छू के अपन ल धन्य मानथे। बहिनी के बेटा -बेटी ल भांचा -भांची कहे जाथे ।रिस्ता नता मं ये भगवान गुरु के बाद तीसर स्थान म रखे गय हे। जेन ल दान दक्षिणा  दे  के पुन सकेले जाथे। छत्तीसगढियां  मन ल कोनो ममा तो कहि दय - ओखर ऊपर  सब कुछ निछावर कर देथे ! अइसे अवघट  दानी छत्तीसगढिया ममा मन होथे।  मथुरा के कंस -कृष्ण वाले उत्तर भारतीय  संस्कृति के इहा कोन्हो प्रचलन नइये ।
    तेहि पाय के कत्कोन चालाक पर प्रांतिक मनसे मन छत्तीसगढ़ियां मन ल बड़ मगन मामू बना के ओखर सरी जिनिस ल नंगा के नंगरा कर दय हवे। ते पाय एखर  रवती उखड़ गय हे । 
   जेकर डेरौठी मं आसरा मांग के रहिन ..कोचियाई करिन एती ओती तीन पाच करके सेठ साहूकार लहुट गिन । 
    आजकल जेन डहन देख  नंगरा मन पागा बांधे हवे अउ धोतीवाला मन मुड़ उघरा किंजरत हे । ये कइसे अर्थव्यवस्था हवे ? का खेती के ये अवगुन हे कि कभु खेतीहर किसान के दिन न इ बहुरय? एखर बर बड़ जोखा मढ़ाय ल परही।
       खैर कहे जाथे कि ये छत्तीसगढ़ ह जुन्ना समे म दछिणापथ के नांव ले जाने जाय। आर्य अउ द्रविड़ संस्कृति के समागम भुंइय्या आय। कोसल के राजा कौशल्य के बेटी कौशल्या संग रघुवंशी राजा के बेटा दसरथ के संग बिहाव होईस ओकर बेटा परतापी रामचंद्र होईस । यही रामचंद्र ल ओकर मोसी दाई कैकेयी हर अपन बेटा भरत ल राजा बनवाय के सेती वनवास निकलवा देथे ।त रामचंद्र ल गंगा नहाक के अपन ममा गांव म आके रहे लगथे। ओकर संग वोकर महतारी कौशिल्या काबर नई आइस जरुर ये गुनान के गोठ हो सकते । फेर राम- लछिमन अउ सीता तीनो परानी इहा ग्यारह साल रहिथे ... सीता ल रावन हर के ले जथे राम अपन ममा मन ल सकेल ऐताचारी रावन ल मार सीता ल मुक्ताथे अउ जनमानस म रच बस के राजा से भगवान बन जाथे ।
ए तरा से  भगवान के  भांचा होवई  के वृतांत बड़ सुहावन हे।राम नता म भांचा होइस ते पाय के भांचा के नता ह छत्तीसगढ म  भगवान सरीख माने गउने जाथे।
      आज  बस (मोटर) म चढेव त दु झन  बुढ़वा संग भेट होइस । दुनो ममा -भांचा आय ।दुनो के ऊपर ७०-८० ले कमती न इ रहिस।
   ममा ह अपन भांचा के भरे बस म  दुनो पांव ल पखारत पैलगी करिस अपन पंछा म पाव पोछिस ।उकर ये करतब- भाव ल देख हमरो मन मगन अउ पावन होगे ।
     कतेक आत्मीय व मयारुक नता ये । बात चले लगिस ... ममा कहिस तोर हाथ पच अमरित पी लेते भांचा . त मोर साध के सधौरा पुर जतिस ... ये अस्पताल म भर्ती रहेव थोरिक बने लागिस त छुट्टी कराके घर जात हंव .... 
          भांजा थोरिक टन्नक रहिस कथे - ले अभी ल तय मरना सोरियात हवस ।नाती- नतुरा के बर- बिहाव तो कर ले छंती देख तोपाबे कहिके कठ्ठल के हांस लगिस ... ओहर मोला बड़ मजकहा लगिस .... दुनो खुल खुल हांसे लगिस अउ बस म चढ़े दैनिक यात्री जेमा सरकारी कर्मचारी सर मैडम जो अलग अलग स्कूल आफिस म बुता करथे दुनो के निश्छल बेवहार व बताचिता देख अपन अपन मोबाइल डहन ले थोरिक अनचेतहा होगिस .... मय तो मोकाय दुनो ल देखते रहिगेंव । बिमार ममा के चेहरा म ओ जीये के उजास बगरत देख अस्सी साल के  बैमारी से उठे सियान के मुख मंडल मं सुख भाव बगरगिस .... बड़ उछाहित उन मन गोठियात जात हवे ..अउ.. मोर छत्तीसगढी सबद के कोठी ल भरत जात हवय .... 
       -डा. अनिल भतपहरी/ 9617777514

Thursday, January 6, 2022

बांध के सुंता

#anilbhatpahari 

।।बांध के सुंता ।।

इंहा  मनखे मन के 
कब  मान रहिस 
जुन्ना समे म तको 
असनेच हाल रहिस 
सिधवा मन बोकराच  
कस हलाल रहिस 
अउ चतुरा मन के 
जम्मा  माल रहिस 
जब तक तुमन  
एकमई हो जुरियाहूं नही 
अउ अपन चीज- बस  ल
बनेच पोटारहूं नही 
तब तक तुंहर गांजे खरही
 रोजेच उजरतेच  रही 
तिड़ी-बीड़ी होय मनखे मन 
 दाना अना बर लुलवातेच  रही 
 जात-पात म बाट के 
उन मन  राजेच करही 
कतको जुग बीत जय  
तभो ले अंधियारेच रही
पढव लिखव बनेच अउ 
मिल के सजोर होवव 
हक -अधिकार बर  
सब बंहजोर होवव 
अपन बोली भाखा अउ  
अस्मिता ल जतनव 
पुरखा के असीस मिलही 
थोकिन तो बात  परखव 
तुंहर जमीन तुंहर जंगल 
तुंहरेच हे  नंदी -पहाड़ 
बसुंदरा मन चगल लिन  
तुंहरेच खेती अउ खार 
कहां के सतजुग कहां के त्रेता 
द्वापर के दंश सुन लागे फदित्ता 
कलजुग के गोठ सुन सुन सिठ्ठा 
सिरतोन ये कि ,ये सब हांसी ठठ्ठा ?
तभो ले तुम हव कइसन 
एसन म बिकट मगन 
परलोक सुधारे बर करथव 
जबर भजन कीर्तन 
इहलोक बिगाडे के ये 
कइसन अलकरहा जतन 
भुखन ल देथव दुत्कार 
 अउ पथरा बर भोजन छप्पन 
फंसे हव अभीच ले 
पाप-पुन के  चक्कर म 
उन मन आके रपोट लिन 
सब के बारी बख्खर ल
सब जागव  सब डहन 
अउ खरतर खरबान धरव 
सडयंत्र के पर्दाफास बर
अब तो  सावधान रहव 
नवा साल म करव नवा परन 
परे झन रहव अरन -बरन 
चूर मंद-मांस म मेला-मड़ई 
यहा तरा देव-धामी के रीत मनई 
बांध के सुंता थोरकिन तो 
करमकांड ल कमतिया लव  
अवघट परे विकास के रद्दा ल 
अब तो बनेच  चतवार लव ...

   डा. अनिल भतपहरी / 9617777514 
सतश्री ऊंजियार सदन अमलीडीह, रायपुर

Tuesday, January 4, 2022

पंथी गीत

छत्तीसगढ़ के लोक साहित्य :पंथी गीत  मे युवाओं की भूमिका  


छत्तीसगढ में लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। वाचिक परंपरा मे यहां अनेक लोक गाथाओं के साथ साथ स्वतंत्र रुप से अनेक तरह के गीत मधुरतम  लोक घुन  यहां तक कि शास्त्रीय रागों पर आधारित धुनों पर मिलते  है। या कहे इन लोक धुनों मे शास्त्रीय रागों के लक्षण मिल जाया करते है। कभी कभी ऐसा लगता है कि लोक गीतों मे जो स्वर या धुन है उन्हे परिष्कृत कर शोधित कर अनेक राग रागिनियों का आविष्कार उन्हे शास्त्रीय रुप दिए गये हैं।
    बहरहाल लोक रुची अत्यंत कलामय और परिष्कृत है उन्हे धर्म मत पंथ व्रत त्योहार आदि से जोड़कर उन्हे विशिष्ट स्वरुप प्रदान  कर दिए गये हैं।
   यहां हम सतनाम पंथ में प्रचलित विश्व विख्यात पंथी नृत्य और गीत पर संक्षिप्त रुप से विचार करते हैं। पंथी गीतों की विराट संसार है विगत ढाई सौ वर्षो से यह  अनवरत  परिष्कृत परिशोधित होते हुए वर्तमान मे बेहद प्रभावशाली स्वरुप मे प्रचलित हैं। 
    पंथी गीत अपने नामानुरुप सतनाम पंथ से संबंधित धार्मिक और आध्यात्मिक गीत है जिनके भाव अत्यंत मुग्धकारी और दार्शनिक तत्वों से परिपूर्ण कालजयी स्वरुप मे मिलते है यह चिंतन मनन की उच्चतम भाव भूमि पर सृजित जान पड़ता है साथ ही सरल सहज मनोद्गार भी व्यक्त हैं। सतनाम पञथ के प्रवर्तक गुरुघासीदास चरित भी इनमें द्रष्ट्व्य हैं-
   कर्मा बने हे किसान धर्मा बोवत हवे धान 
सतनाम के नंगरिहा चले खेत जोते ल ...
  गुरुघासीदास ने अपने लाखों अनुयाइयों को जो दिव्य वार्ता gaspal सुनाई ,उसी की प्रतिध्वनि काव्योक्ति के माध्यम से या उधृत करने के निमित्त गीतों के रुप मे अनायस लोककंठों से प्रस्फूटित हुई।
   गुरुघासीदास के अभ्युदय के पूर्व भी इस समुदाय मे कबीर रैदास  नानक  धर्मदास  जगजीवन साहेब आदि के  माध्यम से सत्संग भजन कीर्तन व निर्गुण भजन प्रचलन मे रहे हैं। बौद्ध धर्म के सहजयान और सिद्धो  नाथों की वाणी भी लोक कंठ मे विद्यमान थे। वे सब पंथी गीत मंगल भजन और साधु अखाड़ा के रुप मे गुरुघासीदास के रामत रावटी मे प्रस्तुत होने लगी। अनेक काव्यात्मक प्रतिभा से युक्त अनुयाई जन जो स्मृति मे थे उन्हे और स्वत: नये पद रचनाए कर प्रस्तुत करने लगे । गुरु पुत्र अम्मरदास जी योगदान स्तुत्य है। जिन्होने गुरुघासीदास के उपदेशना के पूर्व इन पंथी व मंगल भजनों द्वारा उपस्थित जनों को ज्ञान और मनोरंजन के साथ एकत्र किए रहते । तत्पश्चात गुरु जी उन्हे अपनी मघुर वचनों से कृतार्थ करते ।
   इस तरह  हजारों की संख्या मे पंथी गीत अनेक जगहों मे प्रचलित होने लगी।  निर्गुण भजन गायन की परंपरा यहां जन्म और मृत्यु के समय प्राचीन समय से रहा है। इनमे नाथ सिद्ध परंपरा के वाणियों और महायानी  सहजयानी बौद्ध भिक्षुओ की वाणियों का समावेश रहे हैं।पंथी गीतों  और मंगल भजनों मे हमे इन सबकी प्रतिध्वनि दृष्टिगोचर होते हैं। डा आइ आर सोनवानी ने पंथी गीत नृत्य का उद्गम विकास और लोक चेतना में उद्धृत किया है - " धार्मिक सामाजिक प्रपंच के खिलाफ बाबाजी का प्रवचन है। कु व्यवस्था के प्रति सुधार क्रांति उनके उपदेश हैं। सत्य की खोज साधना सतनाम का प्रचार गुरुबाबा का कर्मयोग हैं। इन्ही संदेशों को लोग तन्मयता से सुनते  / सुनाते भावों के श्रद्धापूर्ण  अभिव्यक्ति में लय एंव गान का स्फूटन अनायस ही हो जाता हैं।" 
    यही स्वभाविक प्रवृत्ति मनोद्गार पंथी गीतों के आरंभ का मूल हैं। जिसमें गुरुबाबा जी के वचनो कार्यो तथा उनके प्रति आस्था व श्रद्धा सतनाम  संकीर्तन का विषय हो गया । पंथी गीतों का गायन स्थापित हुआ। उनके संपूर्ण जीवन दर्शन उनकी महिमा का बखान उनके परिजनों का प्रदेय और परित्याग पंथी गीतों वर्णित होने लगा। 
   सतनाम एक बीज है संत हृदय सो खेत 
अधर नागर चलाइया सद्गुरु साहेब सेत ...
   सतनाम बीज मंत्र है और संतो का हृदय खेत है जहां अधर होठ रुपी नागर से सतनाम गुरु साहेब घासीदास सतनाम बीज मंत्रो संतो के हृदय रुपी खेत मे अधर रुपी हल चलाकर बो रहे है। यह रुपक उन्हे श्रेष्ठतम और अलौकिक व आध्यसत्मिक  कृषक के रुप मे प्रतिष्ठित करते हैं।
   पंथी मे विराट भाव का सम्यक दर्शन होते है।यहां केवल गुरु चरित और धार्मिक / आध्यसत्मिक  ही नही बल्कि अनेक चुनौतियों द्वञद्वों के मध्य सुगमता पूर्वक जीवन निर्वाह की उपाय का  भी वर्णन मिलता हैं। 
   अहो बबा कौन रहनि मय रहि हभ बतादे गुरु मोर ..
जग अंधियार सुझय नही कोई ठौर 
किंजरत बुलत लागि मति अति ठीक ठोर 
बिकट बियावन बस्ती न ठोर 
लाम्हे सुरतिया सतनाम डोर ...

प्रारंभ मे बैठकर ताली बजाकर समुह स्वर मे गाते /  संत व दर्शक  झोकते इस तरह एक कंठ से दूसरे कंठ तक इनके माध्यम से गुरु वाणी हस्तांरित होने लगे। इसमे नृत्य लाधव व मुद्रा नही था।
जब इसमे वाद्य यंत्र मृदंग झांझ मंजीरे हुड़का इकतारा चिकारा खंजेरी सम्मलित होने लगे तो मनभावन प्रस्तुतियां और नृत्यादि भी होने लगे। फिर इनमे साधकों की नृत्य पिरामीड और हैरत अंगेज प्रदर्शन और तीव्र गति ने ऐसी कीर्तिमान रचा कि पंथीगीत और नृत्य विश्व की सर्वाधिक तेज गति के रुप मे चिन्हाकित हुई। 
   पंथी के अनेक अध्येता विद्वानों और अन्य प्रांतिक लोककलाकारों  भी पंथी नर्तको की चपलता और अनुशासन तथा तीव्र गति से मुद्रा परिवर्तन को देख उनकी अन्तर्दृष्टि और अंतर्शक्ति से साक्षात्कार कर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। पंथी गीत आम जनमानस के गीत है इनके माध्यम से वह आनंदित और अक्षय उर्जा से परिपूर्ण हो सात्विक जीवन शैली मे प्रवृत्त होते हैं। पंथी के सर्जक साधक गायक सभी के अन्तर्मन उज्जवल होते है और दर्शको के मन मे भी सकरात्मक और सात्विक भाव का संचरण होते हैं। श्रद्धा भक्ति और शक्ति का अनोखा समन्वय भाव हमे पंथी गीत व नृत्य मे परिलक्षित होते हैं।
     पंथी चीर नवीन या सदैव प्रासंगिक भावो से युक्त है संसार की वैभव व नश्वर भाव का सुन्दर समन्वय है इनपर अनेक तरह के अन्वेषण की आपार संभावनाएं विद्यमान है। अनेक विश्वविद्यालयों  में  इन पर शोध कार्य भी जारी है जो कि इनकी महत्ता को प्रतिष्ठापित कराते हैं।

Tuesday, December 28, 2021

तन के तिजउरी म

तन के तिजौरी  म मन के  मन   भर रतन भरे हे 
साधु अउ चोर किंदरत हे खोर सबके नंजर गड़े हे
एला क इसे बचाव उन ल  कइसे भरमाव 
कोनो उक्ति बताव .. कोनो मुक्ति देखाव .....

जब ले चढ़े हे ये बइरी जवानी 
जी के जंजाल बड़ हलकानी 
कोनो तो एकर जुगती मढ़ाव ...

गहना गढ़ाय न दान-पुन  जाय 
धरखन काकर कहे कछु न उपाय 
बिन बउरे जिनिस माहंगी फेकाय ...

खिरत हे उमर पैरावट कस रतन गंजाय 
मय  मुरख एला  सकेंव  न  भंजाय 
जांगर थकत हे कोनो रद्दा मुक्ति के बताव 

सत श्री सतनाम 
डाॅ. अनिल भतपहरी

Thursday, December 23, 2021

सादगी और गरिमामय गुरुघासीदास जयंती का आयोजन

।।सादगी और गरिमामय  गुरुघासीदास जयंती का आयोजन ।।

      मनखे मनखे एक जैसे अप्रतिम संदेश देकर  विश्व को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले विश्वगुरु घासीदास की पावन जयंती अघ्घन पूर्णिमा , तदनुसार 18 दिसंबर की तैयारी मे उनके अनुयायी बड़ी ही श्रद्धा और हर्षोल्लास से जुटे हुए है। आयोजन समितियों की बैठकों और महोत्सव में सांस्कृतिक‌ कार्यक्रमों / टेट पंडाल ,माइक- लाइट वालों को बुकिंग करने की तैयारी भी यद्ध स्तर पर चल रहे हैं। 
    कृषक समाज  अमुमन फसल कट जाने/ बिक जाने के बाद इस जयंती  महोत्सव को पूरे एक पखवाडे तक हर्षोल्लास से मनाने और खुलकर खर्च करने  की प्रवृत्ति  विगत सौ 80-90 साल की परंपरा है। उसके पूर्व बहुत ही सादगी पूर्ण रोठ तस्म ई और निशाना मे पालो चढ़ाकर मनाने की प्रथा रही है। 
          हालांकि बड़ा और भव्य आयोजन से गुरुघासीदास जयंती की  प्रसिद्धी बढ़ी और लोगों मे परस्पर मेलजोल भी होने लगा ।  परन्तु इसके साथ- साथ नाच पेखन ,लोकमंच आदि की प्रस्तुतियों से गरिमा में गिरावटे आई और अनेक बुराई पनपी खासकर जयंती - मड़ ई साथ होने पर जुआ मद्यपान जैसे कुरीति आई ।  और व्यर्थ खर्च और मनोरंजन के नाम पर फूहड़ पन प्रस्तुतियों से हमारी श्रेष्ठतम संस्कृति प्रदूषित भी होने लगी। अति सर्वत्र वर्ज्येत तो होते ही है फलस्वरुप एक दिन या महज 18- 25 दिसंबर  तक एक सप्ताह आयोजन करने की बाते होने लगी । समाज के अधिकतर  विद्वान तो केवल 18 दिसंबर को ही मनाने पर जोर देते है। पर एक दूसरे के आयोजन मे सम्मलित होने की चाह के कारण यह महिनों विस्तारित हो गये। 
    बहरहाल समाज मे जयंती के अतिरिक्त अब गुरुगद्दी पूजा महोत्सव और सतनामायण / सत्संग और अन्य गुरुओं की जयंती / पुण्यतिथि  आदि का भी प्रचलन होने के कारण धीरे -धीरे जयंती का दायरा सिमट रहे है। यह शुरुआत अच्छा भी है परन्तु जयंती की भव्यता शोभायत्रा और रात्रि बडे सांस्कृतिक आयोजन से समाज की संपदा का अपव्यय हो रहा है। इस संपदा को शिक्षा  रोजगार और जरुरत मंदो के हितार्थ लगना था ,वह नाच -गाने और प्रदर्शन मे हो रहे है। उनके नियंत्रण हेतु सचेत होने की आवश्यकता हैं। हमारे  विचारकों /साहित्यकारों को इस तथ्य को प्रचारित - प्रसारित करना चाहिए।
         अतएव जयंती आयोजक मंडल भी ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित करें।नाच पेखन और अश्लील फूहड़  गीत /नृत्यादि   वाले लोक कला मंचो / आर्केट्रा आदि का आयोजन  गुरुघासीदास जयंती जैसे पावन और विजनरी महोत्सव में न करें। कलाकार भी मर्यादित रहें तथा जयंती जैसे पावन महोत्सव की गरिमा का ध्यान रखें।
    नवरात्रि के जगराता मे कोई मंच से ददरिया गाते है क्या ? नही । तब गुरुघासीदास के जयंती पर ददरिया गाने का क्या औचित्य है ? इस बात को जरुर ध्यान मे रखे ।फरमाइश आते भी हो तो उसे सम्मान पूर्वक मना कर दें।
                आयोजक और सहभागिता निभाते हमारे अतिथि और कलाकारों को जयंती की पवित्रता और गरिमा का ख्याल जरुर करना चाहिए। 
      धन्यवाद    

                ।।जय सतनाम ।।

ददरिया

#anilbhatpahari 

।।ददरिया ।।

बानी वाले अस त बड़  गुठिया ले  

दगा झन देबे का ग किरिया खा ले... 

किरिया खाथव बानी वाला मय 

दगा नइतो  देवव का ओ किरिया खाथंव ...

नंदियां भीतरी के  झुंझकुर  झांहू 

तय अगोरत रहिबे संगी खचित आहू...

गंधेसर बबा म नरियर चघाबोन 

डंडासरन पैलगी  असीस पाबोन ...

नवा रे लुगरा अउ धोती नवा दशी 

ये  जिनगी ह बितय राजी- खुशी 

 चित्र -जुनवानी घाट महानदी गंधेश्वर मंदिर प्रांगण सिरपुर से ।