Wednesday, December 22, 2021

संगी तोर मया

#anilbhatpahari 

आपके वास्ते छकड़ी हमरी 

संगी तोर मया 

संगी तोर मया ह लागे गोरसी के आंच असन
अरझे अंतस भीतरी कमचिल के फांस असन 
पलपला म उसने देह तोर शंकर कांदा असन 
बोली बतरस लसलस ले अमली लाटा असन
सुख -दु:ख बटागे सित्तो बोइर अउ चार असन 
धरखन एक दुसर बर काड़ अउ मियार असन

   - बिंदास कहे अनिल भतपहरी

चित्र - धनेश साहू

Friday, December 10, 2021

शहीद वीर नारायण सिंह‌

#anilbhatpahari 
10 दिसंबर पुण्यतिथि पर 

शहीद वीर नारायण सिंह 

समकालीन छत्तीसगढ़ को अंग्रेजी सत्ता के संरक्षण में देशी महाजनों,सेठ, साहूकारों  की  चुंगुल और लूट -शोषण से  बचाने सुदूर वनांचल मे सोनाखान नामक ग्राम  से एक क्रांति ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई जिसे दुनियां शहीद वीर नारायण सिंह के नाम जानती हैं।
      यशस्वी पिता राजा रामराय का यह तेजस्वी पुत्र महान आध्यात्मिक संत  गुरुघासीदास से अभिमंत्रित थे। समव्यस्क  गुरु पुत्र राजा बालकदास  से उनकी  गहरी मित्रता रही ।फलस्वरुप ट्रांस महानदी क्षेत्र मे यह दोनो रण बांकुरे जन जागरण चलाकर अभूतपूर्व कार्य किए । जो युगो- युगो तक  स्मृत रहेन्गे और जनमानस को प्रेरित करते रहेन्गे ।इन दोनो महानायकों के ऊपर विराट लेखन की संभावनाएं हैं।
   वे दोनो ने मिलकर अंग्रेजो के ईसाईकरण और सेठ साहूकार मालगुजारों की आतंक से बचाने सफल हुए।

      वीर नारायण सिंह का जन्म गिरौदपुरी पहाड़ी के नीचे तलहटी पर सोनाखान नामक ग्राम मे बिंझवार जमींदार रामराय के घर  1795  में हुआ। 1830 में रामराय की मृत्यु के उपरान्त 35 वर्ष की आयु मे वे सोनाखान जमींदारी का प्रशासन संभाला ।  वे  अत्यंत साहसी और पराक्रमी थे । वे भोली -भली  दु: खी पीड़ित जनता के सहायतार्थ सदैव तत्पर रहते थे।यह गुण उन्हे समीप ही गुरुघासीदास की आध्यात्मिक सत्संग प्रवचन से अर्जित हुआ। ज‌न कल्याण ही सच्चा नारायण सेवा और पूजा है यह पाठ वे बाल्यकाल से ही सीख चूका था।
        1856 मे भीषण आकाल पड़ा जनता भूख से त्राहि -त्राहि करने लगी  कही से भी कोई आपूर्ति नही था। ऐसे मे कसडोल के माखन नाम का एक  अन्न व्यापारी भारी मात्रा मे धान जमा कर मुनाफा कमाने के फिराक मे थें। उनसे उन्होने प्रजा हितार्थ अनाज मांगे  पर नही दिया गया। तब वे उनके जीवन बचाने अपने कुछ विसवस्त सहयोगियों के साथ धावा बोलकर धान की बोरियां उठवा लिए।
   व्यापारी ने रायपुर स्थित कमीश्नर स्मिथ से शिकायत किए।
उन पर डैकती का मुकदमा लगा कर जेल भेज दिए। रायपुर सेंट्रल जेल मे उन्हे देश मे चल रहे अंग्रेजों की  शोषण दमन और क्रुरताओं से संदर्भित जानकारियां    स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से मिली जिसे उपद्रवी व आतंकी कहे जाते थें। वीर नारायण सिंह बेहद उद्वेलित हो  क्रांति की मार्ग पर चलने और देश तथा व्यक्ति स्वतंत्रता को अर्जित करने जेल मे  मंझला नामक एक सहयोगी से जेल में बंद होकर मरने से अच्छा  ब्रिटिश सरकार की जंजीर तोड़ उन्हे देश से खदेड़ने की प्रण लेकर  जेल से फरार हो गये। और अपने बाल मित्र राजा गुरु बालकदास के गढी भंडारपुरी -  मे जाकर मिले। वहां उन्हे गुरुघासीदास का आशीष मिला और मित्र का अपनापन उसे समीपस्थ ग्राम जुनवानी मे सत‌नाम सेना के प्रमुख ऊंजियार दास के संरक्षण मे  बैलगाड़ी से भेज दिए। और  संदेश वाहक को सोनाखान खबर कर दिए गये।नारायण सिंह एक रात्रि विश्राम कर अपने गांव सोनाखान जाने तैयार हुए तो उसे 
महानदी पार करवाकर उनके लोगो से मिलवाए । वे  सोनाखान चले गये। 
    वहां जाकर उन्होने हर सतनाम सेना के अनुकरण करते प्रत्येक घर से एक एक युवाओं को एकत्र कर 500 लोगो की फौज बनाए और उन्हे  युद्ध कला सिखाने पहल किए । सतनाम सेना के खडैत जो आखाड़ा  कला में सिद्धहस्त थे उन्हे अपने बाल सखा गुरुबालकदास से कहकर आमंत्रित किए।  जुनवानी तेलासी   अमसेना बोदा मोहान के  15-20 प्रशिक्षित लड़ाके तलवार  तब्बल भाला  बर्छी आदि चलाने की प्रशिक्षण देने लगे।  इस तरह वनांचल मे अंग्रजी सत्ता और देशी महाजनो मालगुजारों के आतंक से निपटने की जोर -शोर से तैयारी होने लगे।
       इस तरह सीधा- सीधा ब्रिटिश सत्ता से विद्रोह की बिगुल फूंक दिया गया! यह सोनाखान विद्रोह के नाम से इतिहास मे  दर्ज होकर विख्यात हो गया है-

स्मिथ सेना लेके घेरिन सोना खान जमींदारी ल 
सिहगढ़ भ इगे सिंहखान 
फेर सोनाखान तपे आगी मं ।

  इस तरह बांस और घांस से घिरे जंगल को  अंग्रेज फागुन -जेठ के बीच हुए संग्राम मे आग लगाकर घेर लिए ।
कुर्रुपाठ छोड़ सरदारन संग 
सोनाखान के जंगल म
डेरा डारिन नारायेन सिंग 
साजा कौउहा  के बंजर म। 

अंग्रेज उनकी जगह बदलते और छापामार शैली से परेशान हो गये 
    अंतत: सडयंत्र और छल कपट कर कैप्टन स्मिथ ने सैनिकों की टुकड़ी लेकर सोनाखान को घेर लिया। पर कुछ हासिल नही हुआ। फिर उनके बहनोई देवरी के  जमींदार साय जी को अपने पक्ष मे मिलाया उन्होने उसे  कुर्रुपाट पहाड़ी मे होने और वहां से गोरिल्ला युद्ध की तैयारी मे रत बताए । उनके बताए अनुसार  जब  नारायणसिंह देवी पूजा के गये थे  तभी वहां से उन्हे  गिरफ्तार कर लिए गये -

देवरी के जमींदार दोगला 
बहनोई बीर नारायेन के 
लगा दिहिस बाढ़े बिपत म 
काम करिस कुकटायन के 

        फिर रायपुर स्थित जेल मे वीरनारायण सिंह को बञद कर दिए बिना कोई अदालती मुकदमा चलाए कही उनके सैनिक जेल पर हमला कर न छुड़ा ले 10 दिसबंर 1857 को तोप से उड़ा दिए । उनकी देह भी उनके परिजनो को नही सौपे ।
    इस तरह गरीबो मजलुमों के मसीहा वीर नारायण सिंह स्वाभिमान और स्वतञत्रता के लिए बलि वेदी पर न्योछावर हो गये। (और ठीक तीन साल बाद 28 मार्च  1860 को‌ राजा गुरुबालकदास को भोजन करते समय सडयंत्र पूर्वक हत्या कर दिए गये।) 
   उनकी शहादत से परिक्षेत्र मे शोक व्याप्त हो गये । 
 वीर नारायण सिह समाज राज और देश के लिए  शहादत देकर अमर हो गये । आज उनकी शहादत दिवस पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते भाव भीनी श्रद्धांजलि देते है। 
      

          जय सेवा जय सतनाम  जय वीर नारायण । जय छत्तीसगढ़ ।

टीप - फिल्मकार मधुकर कदम जी निर्मित फिल्म " शहीद  वीर नारायण सिंह  " का प्रोमो‌ पर संस्कृति मंत्री संग ।

Sunday, December 5, 2021

सुरता के चंदन के रचयिता हरि ठाकुर‌

सुरता के चंदन के रचयिता : हरि ठाकुर 

बादर ह गंजा गे रुई के पहाड़ असन 

संस्मरण -

सुरता के चंदन के  ऊगाने (रचयिता ) वाला आद हरि ठाकुर जी 

तब बात 1989-90 की है जब मै गुरुघासीदास छात्रावास आमापारा रायपुर मे रहते दुर्गा महाविद्यालय मे बीए अंतिम का छात्र था। साहित्यिक अभिरुची के चलते सामने ही आर डी तिवारी स्कूल , सोहागा मंदिर प्रांगण आंनद वाचनालय कंकाली पारा उनके प्रेस , वेदमती धर्मशाला सोनकर पारा या शिकारपुरी धर्मशाला या फिर गांधी प्रतिमा उद्यान ब्राह्मण पारा चौक छत्तीसगढी समाज  के भवन हांडी पारा  मे हरिठाकुर , केयुर भूषण ,  आचार्य सरयुकांत झा , डा मन्नूलाल यदु , जागेश्वर प्रसाद , शिव कुमार निकुंज , डा राजेन्द्र सोनी , रामेश्वर शर्मा बलिराम पांडे , उदयभान चौहान चेतन भारती और हमारे  स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो मे मोतीलाल त्रिपाठी , धनिराम वर्मा कमलनारायण शर्मा  आदि । इन सबको एकत्र करने का काम सशील यदु ,रामप्रसाद कोसरिया  करते और हमलोग उनके सहयोग जिसमे चंद्रशेखर चकोर ( सहपाठी ) राजेन्द्र चौहान  साथ होते जिसे उन  जैसे  प्रखर प्रतिभाओ का सानिध्य लाभ मिला। 
  उनके लगातार आयोजनो के श्रोता या दरी उठाने बिछाने बैनर पोष्टर फोल्डर बाटने के काम करते रहे।एवज मे कभी कभी काव्यपाठ करने का अवसर मिल जाया करते थे। छिटपुट उन कार्यक्रमों के रिपोर्टिंग पेपर मे आते।जिनकी विज्ञप्ति देने  सुशील भैया मेरे छात्रावास के रुम मे आते और छोड़ कर स्कूल जाते जिसे मै प्रेस मे दे आता।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो मे मोतीलाल त्रिपाठी , धनिराम वर्मा कमलनारायण शर्मा ‌ डेरहाराम धृतलहरे महादेव   इत्यादियों को एकत्र करने का काम सशील यदु ,रामप्रसाद कोसरिया  करते और हमलोग उनके सहयोग जिसमे चंद्रशेखर चकोर ( सहपाठी )  सुशील वर्मा ,राजेन्द्र चौहान जैसे प्रतिभाओ का सानिध्य लाभ मिला।
  उनके लगातार आयोजनो के श्रोता या दरी उठाने बिछाने बैनर पोष्टर फोल्डर बाटने के काम करते रहे।एवज मे कभी कभी काव्यपाठ करने का अवसर मिल जाया करते थे। छिटपुट उन कार्यक्रमों के रिपोर्टिंग पेपर मे आते।जिनकी विज्ञप्ति देने  सुशील भैया मेरे छात्रावास के रुम मे आते और छोड़ कर स्कूल जाते जिसे मै प्रेस मे दे आता।

   बहरहाल  एक कवि संगोष्ठी के बाद  उनकी एक कविता की पंक्ति मे मेरा मासुम सा हस्तक्षेप नुमा आग्रह था -  "बादर हर  गंजा गे रुई के पहाड़ असन के जगा 
बादर हर गंजा गे पोनी के पहाड़ असन .... हर जादा शोभाय मान होही ।" 
      उन मन बड़ गहिर गंभीर सुभाव के रहिन अउ हमन ओकर तीर गोठियाय बर तको झिझकन ... वोहर कहिस बने कहत हस बाबू  अउ मोला गौर से देखन लगिस मय झेंप गेंव ।मोर संग उमाशंकर अउ मनराखन रहिन  ।  अभी उमा भाई हर  इंजीनियर हवे ।अउ तरुण छत्तीसगढ म काम करत मनराखन हर आजकल  अपन गांव म खेती किसानी म मंगन हवे।
         हरि ठाकुर के सुरता के चंदन हर आजो ले गजबेच ममहावत हवय।

    डा. अनिल भतपहरी

Thursday, November 25, 2021

संसो

अभीच ले मोला  अबड़ संसो होत हवे भाई 
अवइय्या दस बीस बछर मं  अलकर होही 
काबर कि बड़े-बड़े मूर्ति बन जाही
त "हवई जहाज" कइसे उड़ियाही ?
परदेशिया मन इहा आए बर  डराही 
काबर कि उकर जिहाद ओमा टकराही 
अउ भंग -भंग ले  जर- बर  के लेसा जाही .
बिचारा मन के हाड़ा-गोड़ा के पता नई चलही

Thursday, November 11, 2021

अक्लदाढ़ और अक्लवान

"अक्कलदाढ़  और अक्लवान "

   तुलसी के सिवाय बत्तीसों दांत वाले व्यक्ति बड़े भाग्यशाली रहते है। क्योकि जिनके पास यह होता है वह दक्ष , कुशल, प्रवीण और ताकतवर होते है। और यह न रहे तब तक वह, वह नही होते जो उपर्युक्त उल्लेखित हैं। बाहरहाल जो आरंभ से बत्तीसी वाले होन्गे वे तुलसी की तरह दुत्कारे ही नही परित्यक्त कर दिए जाएन्गे । आजकल कोई बाबा नरहरि दास नही जो अनाथ का नाथ हो उन्हे प्रशिछित कर युगद्रष्टा बना दे। भले उनकी गृहस्थी का बेड़ा गर्क हो पर तुलसी दुत्कारे जाने और अपने एकनिष्ठ प्रेम के बावजूद तिरस्कृत हुए यह उनका अभाग्य नही तो क्या ? भले उसे  मरणोपरांत भारतरत्न जैसे घर- घर पूजने का  सम्मान का प्रचलन हो गया हो पर उससे क्या? 
    सचमुच समय से पहले और समय से बाद का हर चीज जमाने को अग्राह्य है। भले आजकल उन्नत तकनीक से हर चीज समय बे समय उपलब्ध होने लगे है शायद इसलिए अब चीजे महत्वपूर्ण नही रहे ।लोगों की शौक महत्वपूर्ण होने लगे है।
इसलिए अब समय- समय पर होने वाले उत्सव पर्व फीके होते जा रहे है और  परिजनों- दोस्तो - परिचीतों के हर समय होने जनमदिन, विवाहदिन ,गृह प्रवेशदिन  आदि की उत्सव रंगीन व सितारा मय होने लगे है ।जहां हर वो चीज है जिनके आकर्षण से लोग खींचे चले आते -जाते  है।
    तो बात बत्तीसी वालों की सफलताओं से है।जिनके है वह वाकिय में ऐश्वर्यवान है क्योकि तब वह कृपण भले रहे रुपवान तो है।चेहरे भरापुरा और अक्ल व सेहत सुदृढ़ जो रहते है। कहे जाते कि ३२ दांत २५ के बाद पूर्ण होते है और ४५ तक  बिना यत्नपूर्वक रखे जा सकते है।हां इस बीच यदि मां - बाप रहे तो जरुर बेअक्ल और जोरु के गुलाम कहाते रहें... पर अपने इर्द - गिर्द जरुर प्रभावशाली रहते है।और यदि परिजन न रहे तो खुद मुख्तार हो पत्नी बच्चों और परिजनों में  ऐश्वर्यवान  रहते है।
     अकलदाढ़ २५ के पहले नही उगते जिनके उगते है वह अलग तरह के फर्टीलाइजर वाले होते है बेचारे रामबोला पेट में उगाने का उपक्रम फलस्वरुप उनकी गति कैसी हुई यह जग जाहिर है। इसलिए बिना अकलदाढ़ उगे होशियारी नही  दिखाना व बधार‌ना चाहिए । 
       कुछ लोग अकलदाढ़ उखड़वाने के बाद भी अकलवाले होने के भ्रम में जीते है। क्योकि यह आखिर में उगता है । जो कि बिन बुलाए मेहमान की तरह सबसे पीछे खड़े रहते है।  मिल गये तो खाय या  पीछे खड़े  लुलवाए या पछताते रहते है।
        अब कोई दीन दयाल तो नही जो अंत्योदय कहते कहते किसी अनजान जगह पर अनजान जैसे  चल बसे। भले उनके जाने के बाद वही भारतीय संस्कृति में पूज्यनीय या सम्मानीय बने।पर दूर्भाग्य अकलदाढ़ का कि बेचारे का आना भी दुखदाई और जाना भी दुखदाई।
        अक्लदाढ़ उगते समय बेहद कष्ट होता है ठीक हठयोग की तरह जबड़े सुज जाते है अन्नजल जल का परित्याग करने होते है।यह अनुक्रम हफ्तो - महिनो और कभी कभी ठहर -ठहर कर २८-३० मे से ४- २ को उगाते वर्ष दो वर्ष साधना में गुजारने होते है तब कही जाकर सिद्धि मिलती है।  इस तरह  कठोर संताप से गुजरना होते है।मुझे तो २-३ साल लग गये जब पूर्णत: बत्तीसी हुए तब तक एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गये। तब जाके मां की बातें सच साबित हुई कि-" बाप बनबे तब पता चलही  ददा !"
         पर अब जैसे ही पैंतालिस पार करने हुए कि यह जबरिया मेहमान  जिसे  अन्यान्नभाव या अत्यं मे रहने से राज करते लोगों के नजरों से ओझल रहे और शोषित पीड़ित रहे उन्हे  सही पोषण नही मिला। टुथब्रश दातुन मंजन पेष्ट  आदि वहां नही पहुंचा और स्वादिष्ट व्यंजन भोजन  व मिठाई को वह लालची संग्रहित रखा .... जो अभावग्रस्त होते है अक्सर वही व्यर्थ को एकत्र करते रहते है फलस्वरुप वे कैवीटिग्रस्त  होकर   जल्द ही सेन्सटिव होते गया । वैसे भी वह लोग समाज सर्वाधिक संवेदनशील होते है जो अभावग्रस्त होते है।उन्हे खाने चबाने की जरुरत नही पड़ा अत: उनके हिस्से में उनके अवशेष मिले जिसे वह बेवकूफ घुरवा जैसे कचरों को संजोकर  पकड़े रहा ,फलस्वरुप  गर्म ठंडा पानी मिठा या तीखा  सब वर्ज्येत है। क्योकि जब यह लगता तो यह जालिम असहनीय दर्द देता ..और सारा शरीर तड़फता ।जब यह सब उनके चलते अग्राह्य तब यही हमारे लिए ग्राह्य क्यो? और यह असह्य वेदना के कारक क्यो कर धारणीय इनका परित्याग ही धर्म है। आज वह जबरिया उखवाड़े और बेदखल होने की ओर प्रयाण कर रहे है। सनसनाहट और फिर असहनीय दर्द इही कलमुंहे के चलते होने लगा ।इसलिए डेन्टीस्ट ने साफ-  साफ  दो टूक कहा कि " इनकी कुर्बानी आवश्यक है, अन्यथा यह बाकी के लिए घातक है। यह वो मछली है जो तालाब को गंदा करने लगे है इसे निकाल फेकों!
   वाकिय में जब किसी के अक्ल की आंतक  से लोग परीचित होते है तो उन्हे बेअक्ल करने की ठानते है। आज हमारे अक्लदाढ़ अपनी इसी नियति के कारण ..
उखड़ने जा रहें  है।
   अच्छा है अब इस अड़तालिसवें में बेअक्ल हो जाना बड़े होते  बच्चों और पत्नी व उनके मायकों वालों के लिए अत्युत्तम है। हमने ऐसा होने ठान लिए और बीच में रुट केनाल करवाकर /कैप लगाकर कृत्रिम रुप से अक्लवान बने रहने की प्रवृत्ति को बदलकर जब तक रहे बिना अक्लदाढ़ के बेअक्ल रहने की मंसूबे पालने  लगे है।
   क्योंकि अब इस उम्र में जब सब कुछ उसी अक्ल के चलते खाने- पीने का प्रबंधन कर लिए तब नकली ही सही दांतो से खाने के लिए अक्ल की क्या जरुरत ?जब तेजी से बच्चे अक्लवान होने की अग्रसर है!आखिर कबतक अपने अकल को रगड़ते और खरच करते रहे भाया ! तभी तो  पोली जगह को भरवाने की फिक्र छोड़  केवल रुई ठुसवाकर बे अक्ल जैसे अपने महाविद्यालयीन विद्यार्थियो को विशाखापट्टनम शैक्षणिक भ्रमण मे ले गये । 
         पी-एच.डी. धारी अक्ल वाले  अनगिनत बहाना कर फंसने से मुक्त हो गये क्योकि किसी के बच्चे की परीक्षा है। किसी के  बुजुर्ग माता पिता है । यात्रा मे उल्टी व चक्कर आते है तो किसी के दूर के रिश्ते मे शादी है। हां  एक यही तो बेअक्ल है जो हर जगह अपनी ना न कह सकने की प्रवृत्तियों के चलते फंस जाते है। अब भुगतों और भूख लगे तो तरल पीयो या साफ्ट दाल भात खिचड़ी एक ही तरफ  खाकर  गुजारा करों।क्योकि बेचारे ग्राम्य परिवेश के बच्चों को समुद्र और पानी जहाज देखने के मौका को यूं गंवाने नही देना है ।क्या पता इन्ही मे कोई नेवी अफसर बन जाय और देश रक्षा मे तैनात हो जाय।
      -डां. अनिल भतपहरी
9617777514

Sunday, November 7, 2021

अधिक और लंबी धार्मिक आयोजन और उनका प्रतिफल‌

#anilbhatpahari द
ेष
।।अधिक और लंबी धार्मिक आयोणजन और उनका प्रतिफल ।।

      प्राय: देखने में आते है जो समुदाय अधिक और लंबी धार्मिक आयोजन में उलझा हुआ है ,वही सर्वाधिक पिछड़ा  दीन -हीयन गरीब है।यहां तक शोषित भी। उनके अराध्य और कर्मकांड उन्हे उनकी वर्तमान हालात् से उबारते क्यों नही? और तो और प्रभावी आयोजन की होड़ लिए अनुयाई परस्पर प्रतिद्वंद्वी और प्रतिस्पर्धी भी हो जाते है ।फलस्वरुप उनमें वर्चस्व के होड़ और उनसे लड़ाई -झगडे तक हो जाते हैं।  नेपथ्य में आयोजक और प्रायोजक के पौ बारह हो जाते हैं।  और विडंबनाएं देखिए यही तबका  स्वर्ग सम सुख धरा पर भोगते अतिशय सम्मनित भी होते है। इसलिए भी उक्त प्रथाओं के ये प्रवर्तक और संरक्षक बने हुए होते हैं।
           हमारे संतो -गुरुओं ने बड़ी  ही सुन्दर ढ़ग से दृष्टान्त देते  नैतिक सीख भी दी -" तय अपन बर बारा महिना के खरचा जोड़ ले तब भक्ति कर न इते झन कर । "     परन्तु नक्कार खाने में ऐसे प्रवर्तन कारी  स्वर विलिन हो गये या उन्हे और उनकी वाणियों और स्थापनाओं को बहिष्कृत कर दिए गये।
    पाश्चात्य जगत मे इसके तरफ ध्यान आकर्षित करते मार्क्स का भी उद्भव हुआ पर उनकी विचार यहां के पारंपरिक व शास्त्रीय मनो मस्तिष्क में समाए भी नही। 
    ऐसा लगता है कि सोची समझी रणनीति के तहत धार्मिक आयोजन और अनुष्ठान आदि ईजाद किए गये ताकि जनता उनमें आकंठ डूबी रहें। चंद समर्थवान यदा- कदा धार्मिक होने और बड़ी दान दक्षिणा कर इसी मनोवृत्ति को बढाने में लगे होते हैं।
    धर्म को अफीम कह उनसे बचने की सलाह यहां के कथित  जपी -तपी  द्रष्टाओं / व्याख्याकारों को बचकाना लगते हैं। इसलिए यहां खासकर बस्तर के  आदिवासियों की 72 दिनी बस्तर दशहरा और नेम जोग से मानने की सैकड़ों वर्ष की प्रतिबद्ध प्रथाएं वहां केवल लंगोटी और रोटी ही दे पाए हैं। आज भी अर्धनग्न समुदाय वनोपज और कठोर परिश्रम से ले दे कर जी रहे हैं। ऊपर से दो पाटन के बीच में  गेंहू की मानिंद अलग से  पिसा भी  रहा रहा हैं।
       उत्तर में भी करमा बार सैला सरहुल जैसे आयोजन राजतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा और विभिन्न धार्मिक आयोजन धर्मांतरण के चक्रव्यूह में उलझे पड़े है।
        इसी तरह मध्य छत्तीसगढ़ के मैदान मे हरेली से होली तक कर्मकांड व तीज -त्योहार  जिसमें छक कर शराब  मुर्गा मटन  में निमग्न हैं।  और तो और  बीच- बीच मे गणेश दुर्गा  नवधा- भागवत  में अपने पेट काटकर पर- प्रांतिक कथावाचको के लिए दान- दक्षिणा की व्यवस्था में लगा हुआ हैं। परन्तु उनकी आर्थिक सामाजिक परिस्थिति में रंच मात्र परिवर्तन नही आया हैं।
          किसान बनिहार हो गये और बनिहार शहरों के सेठ साहूकारों के बहुमंजिला ईमारत  बनाने वाले फैक्ट्री मे काम करने वाले रेजा कुली बनकर रह गये हैं। गांवो मे  लघु किसान स्वयं अपने खेतों काम करने वाले खेतीहर श्रमिक हो गये है। यहां अधिकतर  बच्चे महिलाएं या बीमार वृद्ध ही रह गये है।  धान की कटोरा कहे जाने छत्तीसगढ़ मे औसत छत्तीसगढिया  आजकल गरीबी रेखा के नीचे  लाल पीले नीले राशन कार्डधारी होकर चावल की कटोरा थामे प्रतीक्षारत याचक सा होकर  रह गये है।  यह  कथित ग्राम स्वराज और पंचायती राज का साईड इफेक्ट है।
         इस तरह देखा जाय तो जो समुदाय अधिक धार्मिक और कर्मकांडी है , वह अपेक्षाकृत अधिक दु: खी पीड़ित व शोषित भी बावजूद वह कथित आत्म सुख भाव से  इन आयोजनों हर्षित व उल्लसित नज़र आते हैं।
          संतो -गुरुओं के अनुयाई भी ईश्वरवादियों की अनवरत आयोजन से प्रभावित होकर लंबी और बड़ी आयोजन करने लगे है फलस्वरुप चंद वर्गों के अतिरिक्त बहु वर्ग धार्मिक कर्मकांड मे उलझा हुआ है। उनके भगवान खुदा ईश्वर गुरु संत सभी मूकदर्शक है अनुयाईयों के जीवन स्तर पर उनकी कोई कृपा बरस नही रहे हैं। बल्कि कृपा उनके ऊपर बरस रहे है जो षडयंत्र खोर   सूद खोर और राज खोर है।  इनके चंगुल और अनावश्यक अंध श्रद्धा कर्मकांड या कहे जीर्ण शीर्ण परंपरा को ढोने से बचाने बौद्धिक लोगों का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। ताकि यहां के नागरिक और देश प्रदेश सुखी व समृद्ध हो सकें।

 निम्न विडियों को देखकर इसे और भी बेहतर ढंग से समझे जा सकते है।

            - डा. अनिल भतपहरी / 9617777514

Saturday, November 6, 2021

खुमान संगीत

खुमान संगीत 

       रविन्द्र संगीत की तरह खुमान संगीत एक अलग अहसास हैं संगीत प्रेमियों के लिए । बाल्यावस्था में ही पिता श्री (सुप्रसिद्ध रंगकर्मी व सतनाम संकीर्तन कार सुकालदास भतपहरी "गुरुजी"  ) के सानिध्य में गीत- संगीत अभिनय आदि सीखने और प्रदर्शन करने  का अवसर मिला । 

      गर्मी व दशहरा - दीवाली  छुट्टी में  गृहग्राम जुनवानी आते तो घर  के  आंगन में खाट पर बैठे पिता श्री बाँसुरी से "का धुन बाजव मय धुनही बसुरिया"  वाली गीत का  धून छेड़ते तो मैं हारमोनियम से  संगत करते चिटिक अंजोरी निरमल छंइहा ... बजाने कहता और फिर खुमान साव की अनेक धुन युं ही बिना लय तोड़े गीत बजते जाते ... आसपास के कथा कहानी  कहने वाले शोर गूल  करते रेशटीप और अंधियारी - अंजोरी खेलते  बाल टोलियां और निंदारस में डूबे रोचक वृतांत में उललझने वाले सब मोका जाते और हम दोनो बाप बेटे की जुगलबंदी सुनने सकला जाते ... फिर भजन गीत गाने फरमाइश भी होने लगते ... 
      आकाशवाणी रायपुर  में बुधवार को दोपहर  सुर श्रृंगार सुनने स्कूल बंक मारते ... और गणित रसायन वाले सर से डांट सुनते पर जब ज 
चौरा म गोंदा रसिया, मोर संग चलव रे काबर समाए  रे मोर बइरी नयना मं, पान ठेला वाला या मंगनी म मांगे मया न इ मिलय   जैसे  गीत सुनते  मन अल्हादित हो जाया करते और डाट फटकार होम वर्क की दंश से मुक्त भी।
 उनके  गीत सैकड़ों हजारों  बार विगत ४० वर्षों से  सुनते व गुनगुनाते आ  रहे पर मन नही अघाते .. .पता नही क्या चीज इनमें भरा हुआ हैं ?  फिल्मी गीत इनके समछ हल्के लगते ।
कारी  ( एक बार टेकारी आरंग में वही रामचंद देशमुख जी  को  देखे )व चंदैनी गोंदा   (अनेक बार अनेक जगहों पर में  झुलझुल कर सिगरेट पीते बिधुन हारमोनियम पर उंगुली थिरकाते खुमान साव जी का दर्शन और दुआ सलाम मंच पर जाकर कर आने का भाग्य हमें कई बार मिल चूका है।
...रामचंद खुमान लक्ष्मन के तिकड़ी ने वह किया कि छत्तीसगढ़ी की अस्मिता मुखरित हो उठी चहुंओर इनकी मधुरता फैल गई । ये तीन ही काफी है कही भी कभी भी इनके भरोसा  खोभिया के या अड़िया के खड़े होने के लिए हम जैसों के लिए ।
    अनेक  गीतों में अपनी  बेहतरीन संगीत संयोजन से जनमानस को मुग्ध व आनंदित करते छत्तीसगढ़ी संगीत को  शिखर तक ले जाने वाले महान संगीतकार खुमान साव जी  को ...विनम्र श्रद्धांजलि ! सत सत नमन।
     ।।वे गये नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के फि़जा में बिखर गये ।।   
      -डा अनिल भतपहरी

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