Wednesday, August 25, 2021

पद्म‌ सम्मान सतनामियों ‌को‌ क्यों नहीं ‌?

पद्म पुरस्कार  सतनामी प्रतिभाओ को  क्यो  नही? 

              विश्वविख्यात  पंथी नर्तक देवदास बंजारे 65 देशों में प्रदर्शन कर वैश्विक रिकार्ड बनाए और देश व प्रदेश की कीर्ति को फैलाए पर राष्ट्रीय सम्मान से वंचित रखे गये । इसी तरह विलक्षण भरथरी गायिका अपनी विशिष्ट गायन शैली व प्रतिभा के चलते १८ देशों मे प्रस्तुतियाँ  देकर छत्तीसगढी संस्कृति की सुरभि को सर्वत्र विस्तारित की ।बावजूद वह गुमनामी और उपेक्षित जीवन जी।साथ ही उनके अंदर यह मलाल रही कि साधन हीन हो अपनी स्वप्न पूर्ण नही कर पाई। उन्हे कोई अपेक्षित सम्मान नही मिली और युं ही चल बसी । ऐसे ही समाज के अनेक  विलक्षण  प्रतिभाए  जो प्रदेश व देश के रत्न थे। अपना सारा जीवन साहित्य कला और किसी अन्य विधा पर जिससे सहज उन्हे पद्म पुरस्कार मिल सकते थे जानबूझ कर वंचित रखे गये। ऐसे लोगो की सूची लम्बी है।पर चंद नाम जिसे सभी भली भांति जानते समझते है ।आज प्रसंगवश हमे न चाहते हुए लिखना पड रहा है कि यदि तथाकथित  संस्कृति प्रेमी इन कला धर्मी लोगो के नाम न जाने पहचाने तो लानत है उन्हे कि विराट ४० लाख समुदाय के प्रति उनकी दृष्टिकोण क्या है? सोच और समझ क्या है? 
     छत्तीसगढी संस्कृति साहित्य के  ध्वज वाहकों मे 
महाकवि मनोहरदास नृसिंह , छत्तीसगढी रचनाकार गंगाराम शिवारे ,  कवि व कलाकार पं साखाराम बधेल , पंथी नर्तक देवादास बंजारे , सतनाम संकीर्तन कार व रंगकर्मी सुकालदास भतपहरी , रचनाकार सुखरुप्रसाद बंजारे , नाट्यमंच के अद्वितीय कलाकार  महंत - दीवान, दानी- दरुवन ,चम्पा-बरसन,  महाकवि पं सुकुल धृतलहरे ,नकेशरलाल टंडन ,नम्मूराम मनहर , प्रथम महिला पंथी नर्तकी व गायिका तोरनबाई लक्ष्मी बाई जुगाबाई अब सुरुजबाई खांडे जैसी कलावन्त साधक साधिकाए ..सतनामी समाज ही नही छत्तीसगढी संस्कृति के जगमगाते नक्षत्र रहे।पर उनकी आभा को काले चश्मे पहने लोग कभी देख ही नही पाए ।
 प्रसिद्धी पर मुफलिसी और जानबूझकर अवहेलना के शिकार ये लोग बिना किसी चाह यहा तक  यश व सम्मान को भी ताक रख केवल सतनाम का गुणगान करते स्वात: सुखाय सदृश्य आजीवन साधते रहे।और यु ही बिना किसी शिकायत आदि से अपना काम‌ करके प्रयाण कर गये। 
     कही यही हश्र हमारे इन साधको कलावन्तों - मानदास टंडन ९५ वर्ष चिकारा व खडेसाज व  सतलोकी भजन के सिद्धहस्त कलाकार ,लतमारदास चंदैनी , तुलाराम टंडन गोपीचंद गाथा गायक , पं कपिल घृतलहरे  हुडका इकतारा चौका पंडित ,  पंथी पंडवानी गायिका ऊषा बारले ,पंथी पुरानिक चेलक ,  समेशास्त्री देवी, शांति चेलक सहित गोरेलाल बर्मन दिलीप लहरिया  द्वारिका बर्मन रामविलास खुन्टे दिलीप बंजारे यशवन्त सतनामी सरीखे प्रतिभावान ५० से 90 वर्ष पूर्ण कर चुके विगत ३० वर्षो से जनमानस को अपनी कला से सम्मोहित  मनोरंजित और गुरु उपदेश व भारतीय कला संस्कृति को  प्रचारित प्रसारित करते आ रहे है ये साधक कलावन्त और   वरिष्ठ महाकवि रचना कार साधु  बुलनदास डा शंकरलाल टोडर इंजी टी आर खुन्टे डा आई आर सोनवानी  सर्वोतम स्वरुप मंगत रविन्द्र हरप्रसाद निडर डा जे आर महिलांग डा दादूलाल जोशी , भाऊराम धृतलहरे डा जे  सोनी   जैसे लोग भी  अन्चिनहार सा उपेक्षा  और अवहेलना की सडयंत्र से कही गुमनाम न हो जाय .. ...... शासन -प्रशासन को सतनामियो के प्रति अनाग्रह दुराग्रह त्यागकर इस समाज के विभूतियों का भी यदा-कदा यथोचित सम्मान देकर पद्म सम्मान के लिए नामांकित करते संतुस्ति करना चाहिए, प्रदान कराने उचित प्रयास होनी चाहिए।

 डाॅ अनिल भतपहरी ।

Saturday, August 21, 2021

प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान

प्राचीन ज्ञान और  अर्वाचीन विज्ञान 

वर्तमान समय में आधे -अधुरे ढंग से  विज्ञान के नाम पर प्राचीन कला पूर्ण ज्ञान का तिरस्कार या अवहेलना तक किए जाते हैं यह उचित नहीं । हालांकि इन पर कुछ लोग अंध विश्वास आदि फैलाकर जीविकोपार्जन व लूटपाट तक करते रहें हैं। केवल इनके चलते इन तत्वों को खारिज नहीं किए जा सकते। अमुमन हर देश, काल, परिस्थितियों में अनुभव और विरासत की ज्ञान लोगों को प्रेरित करते आ रहे हैं।  मनुष्य उनसे न केवल विकास किए अपितु मानवीय गुणों के साथ  सुख- शांति और परस्पर सौहार्द्र तक संस्थापित किए गये। भले चंद शातिर लोगों की  महत्वाकांक्षी आदि के चलते अमानवीय और बर्बर रुप में देखने मिलते हैं,पर वह हमेशा  हो ऐसा भी नहीं रहा।
     बहरहाल कुछ ऐसी चीजें है जो अनदेखे अमूर्त रुप में भी घटते हैं। हर चीज पदार्थ हो यह जरुरी नहीं भावनाएँ भी होते हैं वह किसी यंत्र आदि के माप से परे  होते हैं हालांकि उनपर भी कहीं न कहीं ज्ञान +विज्ञान  समाहित रहते हैं पर लोग अनजाने में उन सुक्ष्मतम चीजों का अवलोकन नहीं कर पाते या समझना नहीं चाहते ।
फलस्वरुप अनेक अच्छी मान्यताओं का भी प्रबल विरोध करने लग जाते हैं। 
            ज्ञान के अनेक सोपान और विधाएँ है साथ ही व्यक्ति का दृढ़ निर्णय असीम संभावनाएँ के द्वार और दृष्टि खोलते हैं, और उन्हे सफल करते हैं। साधारण लोगों के लिए आश्चर्य तक हो जाते हैं। फलस्वरुप उन्हे महिमामंडन कर देते हैं,फिर उनके पर्दाफाश के लिए अधकचरे विज्ञानवादी आ जाते हैं। जो तर्क कम कुतर्क द्वारा उनकी अवहेलना करते हैं।
यही द्वंद चलते रहता हैं।

बहुत कुछ तो स्व अनुभव पर होते हैं।  एक ऊंचाई के बाद जीवन में ठहराव आते हैं। फिर वहाँ से पुनश्च अपने जड़ की ओर लौटने होते हैं जैसे बरगद की लाह ऊपर से नीचे आकर जड़ बन जाते हैं और फिर वह अधिक पुष्ट व मजबूत हो जाते हैं।
     सदियों की अनुभव भी कोई चीज होती हैं सब कुछ विज्ञान ही तय करे ऐसा भी नहीं है। हमें प्राचीन ज्ञान और. अर्वाचीन विज्ञान के साथ -साथ आगे चलना होगा ताकि मानव प्रजाति  का सर्वांगीण विकास  यात्रा निर्बाध चलता रहें।
          
             ।‌।सतनाम।।
 -डाॅ अनिल भतपहरी/ 9617777514

अजूबा

अजूबा

संभला नही 
बस टूटते
बिखरते गया
इश़्क की 
दरियां में
डूबते-उतरते गया 
हुआ ऐसे 
कैसे कि 
भीतर से 
निखरते गया ...
  -डा.अनिल भतपहरी

Monday, August 2, 2021

युगल गीत - मोर मन ल कलेचुप मोहत हस क इसे

मोर मन ल कलेचुप मोहत हस कइसे 
तोर रुप के जादू चलत हे कइसे 

कर के सोला सिंगार आए मोर आधु मं 
गिरा के बिजुरी ओधिआए मोर पाछु मं 
का हवय तोर मन म नइ जानव का जइसे ...जन्म

बड़ आए ज्ञानी   तय मोर का लागमानी अस 
मय धधकत आगी तय निच्चट  जुड़ पानी अस

तोर मोर भेंट के कछु आस 
नइये ...

Thursday, July 29, 2021

स इता

आपके वास्ते छकड़ी हमरी 

।।सइता ।।

जउन होथय  सब बने  होथे  
नइ रुकय काकरो छेके- रोके 
एक के अलहन एक के मउका  
कहिन गोठ बउदा हर  ठउका  
होथय  सिरतोन  सफल तउन 
 अपन सइता ल रखथय जुन

बिंदास कहें-डॉ॰ अनिल भतपहरी

Thursday, July 22, 2021

अइटका परब मेला

सतनाम धर्म संस्कृति में गुरु घासीदास द्वारा प्रवर्तित 
       गुरु अम्मरदास  जन्मदिन  गुरु पूर्णिमा पर -  

          ।।अइटका -परब मेला तेलासी ।।
सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरु घासीदास बाबा  के ज्येष्ठ पुत्र गुरु अम्मरदास जी का जन्म असाढ़ पुन्नी को गिरौदपुरी मे हुआ।वे बाल्यकाल से ही अपने पिता के सदृश्य विलछण. और तेजस्वी  थे। अत्यन्त  प्रतिभाशाली अम्मरदास जी  ७-८ वर्ष के उम्र मे अपनी माता सफूरा के साथ जलाऊ लकडी लाने वन  गये।एकाएक वे वन मे खो गये।किवदन्ती है कि उन्हे शेर उठाकर ले गये।आज भी शेर पन्जा मन्दिर गिरौदपुरी मे स्थित है।जहा सतपुरष या कोई महान योगी या साधक  के भी चरणचिन्ह है कहते है वह शेर पर सवार योग्य बालक के तलाश मे आये और बालक  अम्मरदास को अपने साथ बिठाकर गहन वन मे  चले गये। सफुरा और उनके साथ गई ग्राम्य महिलायें ढूंढती रही पर बालक  नही मिले।
 पुत्र वियोग से व्याकुल बेसुध हो गई ।
     वही तेजस्वी बालक १५ -१६वर्ष बाद २१-२२ वर्ष के उम्र मे साधू वेष मे ग्राम तेलासी मे रामत करते गुरु दम्पत्ति को छिन्दहा तालाब पार मे  मिले।
      तब गुरु अम्मरदास अपनी योग साधना की सिद्धी उपरान्त अपने माता-पिता को तलाशते हुये तेलासी पहुचे थे।
       ग्राम तेलासी  पुत्र मिलन जगह होने के कारण सद्गुरु को बडा प्रिय लगा।और वे यहा रमण करने लगे।
      गुरु दम्पति  की ख्याति उनके योग साधना और अनेक दिव्य औषधियों  से असाध्य रोगो के उपचार आदि से सर्वत्र फैलने लगे।दूर -दूर से लोग उनके दर्शन और अपनी दु:ख -पीड़ा  के निदान के लिये आने लगे।
    उपकृत श्रद्धालुओ   द्वारा भेट स्वरूप भूमि अन्न आदि के संरक्षण हेतु तेलासी भन्डार मे बस गये।कलान्तर मे इन दोनो जगहों पर भव्य बाड़ा, मोती  महल व गढी किला नुमा परकोटा  बनवाये गये।जो  सतनाम धर्म का ऐतिहासिक स्मारक है।
         गुरु अम्मरदास जी  तेलासी वासियों के लिये अत्यधिक प्रिय रहे है।कहते है एक व्यक्ति मान्साहार हेतु कपड़े मे लपेटकर मांस ले जा रहे थे।लोग शिकायत किये।गुरु अम्मरदास ने योग बल से लोगो की दृष्टि बदले और जब पोटली खोले तो वह नाड़ियल प्रसाद के रुप मे लोगो को दिखाई दिये ।सभी चमत्कृत हो  गुरु चरण  मे नत हो  क्षमा -याचना किये। गुरु कृपा से अभिभूत तेलासी व अनेक ग्राम के लोग सतनाम दीक्षा लेकर सतनामी बने। यहाँ महासंगम हुआ।
       और उन सभी वर्गो ,जातियो को  गुरु घासीदास  ने गुरु अम्मरदास के जन्म दिन गुरु पूर्णिमा ‌को  तस्मई- चीला  बनवाकर एक परात या बर्तन से बटवाये।यही" अइटका " है।इसके लिये विधान बनाये।बहते जलधारा से चावल दूध घी  गुड़ और मेवा डालकर सात्विक तस्मई ( खीर )बनाकर परस्पर बाटकर खाना।सत्सन्ग प्रवचन सुनना, पन्थी  नृत्य मन्गल करना यहां तक कि‌ सतनाम संस्कृति से संदर्भित लीला व नाट्य मंचन तक होते  रहे हैं।यह तेलासी सहित आसपास के कई ग्रामो मे तब से प्रचलन मे है।
     सफूरा माता  की अनुनय- विनय और बडे़ के रहते छोटे भाई विवाह कैसे करे के चलते न चाहते   प्रतापपुर मे अन्गारमति से अम्मरदास जी का विवाह हुआ।गौना लाए पर वे ब्रम्हचर्य का ही अनुपालन करते रहे और  सतनाम की आध्यात्मिक गुरु के रुप मे ख्यातिनाम हुए।
        ब्रम्हचारिणी  अन्गारमति भी  साध्वी जीवन अन्गीकृत की । आगे चलकर  माता प्रतापपुरहीन के नाम से विख्यात हुई ।आज उनकी शैय्या दर्शनीय है।
    गुरु बालक दास सेत सुमन  घोडे़ मे सेत वसन धारण कर चलते और लोगो मे सतनाम की अलख जगाते।पन्थी मन्गल भजन सत्सन्ग का प्रचलन  समाज मे गुरु अम्मरदास जी ने किया।
       एक दिन शिवनाथ नदी के तट पर  चटुआ घाट के समीप मनोरम स्थल पर अपने अनुयायियों को सतनाम समाधि का रहस्य बताते  अउठ दिन (साढे तीन दिन  )की  भू समाधि मे चले गये। 
     आसपास से बहुत से लोग आ गये।उन भीड़ मे कुछ विरोधी कहने लगे वो मृत हो गये है।उन्हे बाहर लाओ ।अनुयायी भीड़ के आगे बेबस अधुरी साधाना मे उन्हें वापस तन्द्रा मे लाने लगे।पर गुरु नही जगे।
        अन्तत: उन्हे पूर्ण समाधि दे दी गई ।
      जनश्रूति है जब गुरु की समाधि अवधि पूरी हुई तो लोग  देखे कि एक ज्योति पुन्ज समाधि को चीरती ऊर्ध्वगामी आकाश मे विलीन हो गई ।
       कई वर्षों के अन्तराल मे समीपस्थ ग्राम हरिनभठ्ठा के मालगुजारी  आधार दास सोनवानी अपने पुत्र मनोकामना पूर्ण होने पर गुरु अम्मरदास के समाधि मे भव्य मन्दिर बनवाये।
         आज यह सतनामिओ को  का प्रमुख धाम है जहां पर पौष - छेरछेरा पुन्नी को विशालकाय मेला गुरु के पुण्य स्मरण मे लगते आ रहे है।
          सतनाम आध्यात्मिक चेतना और साहित्य के प्रणेता गुरु अम्मरदास अम्मर रहे।

टीप - सतनाम अइटका परब प्रथम सार्वजनिक आयोजन हैं। कृपया इस पावन पर्व का सार्वजनिक आयोजन अपने अपने ग्राम मुहल्ले व जैतखाम परिसर पर करें। और तस्म ई बनाकार सत्संग प्रवचन व मंगल पंथी आदि‌ का आयोजन करें।

              जय सतनाम।

गुरु पूर्णिमा की मंगलमय‌ मंगलकामनाएं 
 
     डाॅ. अनिल कुमार भतपहरी 
        9617777514 
             सचिव 
सतनाम साहित्य प्रकोष्ठ 
प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज

Friday, July 16, 2021

तन के तिजौरी मं

तन के तिजौरी  म मन के  मन   भर रतन भरे हे 
साधु अउ चोर किंदरत हे खोर सबके नंजर गड़े हे
एला क इसे बचाव उन ल  कइसे भरमाव 
कोनो उक्ति बताव .. कोनो मुक्ति देखाव .....

जब ले चढ़े हे ये बइरी जवानी 
जी के जंजाल बड़ हलकानी 
कोनो तो एकर जुगती मढ़ाव ...

गहना गढ़ाय न दान-पुन  जाय 
धरखन काकर कहे कछु न उपाय 
बिन बउरे जिनिस माहंगी फेकाय ...

खिरत हे उमर पैरावट कस रतन गंजाय 
मय  मुरख एला  सकेंव  न  भंजाय 
जांगर थकत हे कोनो रद्दा मुक्ति के बताव 

सत श्री सतनाम 
डाॅ. अनिल भतपहरी