Thursday, September 19, 2019

कितने वैकल्पिक नाम व उनके प्रभाव


     कितने वैकल्पिक नाम और उनके प्रभाव कैसा ?

      जिनके ऊपर निरंतर जुल्म हो वह समाज मिलकर प्रतिकार न कर सके उसे कोई भी नाम दे दो कोई फर्क नही पड़ता। जो उत्पडित है उन्हे कितने ही वैकल्पिक नाम दे यदि उत्पीड़न जारी है तो उन नामों का कोई प्रयोजन नही।
    बहरहाल महाराष्ट्र में नव बुद्धा या नवबौद्ध बौद्ध धम्म में दीक्षित महारों को कहे जाते है जो कि वहां की प्रमुख अनुसूचित जन जाति है ।इसी कौम में डा. अम्बेडकर का जन्म हुआ और वे हिन्दू धर्म का परित्याग कर लाखो स्वजातियों और अपने अनुयाई के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किए वही नव बौद्ध कहलाते है।अनुसूचित जाति वर्ग के अन्य जाति जो बौद्ध धर्म नही अपनाए वे नही।
   अब यह देखना है कि अनुसूचित वर्ग में गैर महार जाति जो बौद्ध धम्म नही अपनाए है क्या वह नव बुद्धा शब्द को आत्मसात करेगा कि अनुजाति वर्ग में नवबुद्धा एक न ई जाति के रुप में अस्तित्वमान होन्गे ?
         प्रकाशित समाचार के अनुसार अन्य राज्य के अनुसूचित जातियां जो बौद्ध धर्म नही अपनाए बल्कि हिन्दुओं के इतर पृथक पंथ मत आदि में आबद्ध है जैसे छग मे सतनामी , सूर्यवंशी , मेहर  उ . प्र . चमार ,पासी रविदसिया , पंजाब मे रमगढिया , म. प्र .जाटव ,कुशवाहा मालवीय , इत्यादि क्या ये सब जो बौद्ध धर्म  नही अपनाए है और इन्हे दलित आदि कहते है क्या केन्द्र सरकार (समाचार के अनुसार ) के निर्देश पर  नव बुद्धा शब्द को  आत्मसात कर पाएन्गे ?

सतनाम धर्म संस्कृति के पर्व व उत्सव

सतनाम धर्म संस्कृति में जयंती, पर्व ,मेले  एंव उत्सव

         प्रगतिशील छग सतनाम साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित साहित्यकारों के समारोह मे सतनाम धर्म संस्कृति के  विभिन्न जयन्ती पर्व उत्सव समारोह के सन्दर्भ मे अधिकारिक रुप से जन श्रुतियो और दस्तावेजों मे दर्ज तिथियों के आधार पर आयोजन करने सम्बन्धी  महत्त्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई । मनुष्य जन्मजात उत्सव धर्मी प्राणी है और वे अपने धर्म मान्यताओं बडे बुजुर्गों के उपलब्धियों को स्मृत व उनसे प्रेरणा लेने अनेक तरह आयोजन करते सुखमय जीवन निर्वाह करते है।
     मुलमुला काण्ड  की तीव्र भर्तस्ना करते  दोषियो के ऊपर शीध्र कडी कार्यवाही करने शासन प्रशासन को अवगत कराने व मृतक को श्रद्धान्जलि दी गई ।
       तत्पश्चात सतनाम धर्म मे प्रचलित गुरुओं सन्तो के  जयन्ती /पुण्यतिथी उत्सव पर्व मेले सन्दर्भित तिथियों पर चर्चा करते निर्धारित निम्नलिखित तिथियों पर सभी जगहों पर यथासम्भव  गरिमामय  आयोजन करने पर उपस्थित सभी सदस्यगण सहमत हुये-
१-गुरुघासीदास जयंती १८दि १७५६।तदानुसार १६-१७ को जयन्ती पूर्व  शोभायात्रा ।१८-३१ जयन्ती पखवाडा।
२ गुरु अम्मरदास जयन्ती - असाढपुन्नी (गुरुपुर्णिमा)  "अइटकातिहार"
३ - गुरुअम्मरदास समाधि दर्शन मेला - छेरछेरा पुन्नी चटवाधाट व बाराडेरा धाम।
४ गुरु राजाबालकदास जयन्ती गुरुमहाअष्टमी (आठे ) भादो कृष्ण पछ अष्टमी
५-गुरुराजा बालक दास बलिदान दिवस २८ मार्च १८६०

६-गुरुमाता मिनीमाता जयन्ती होलिका दहन की रात्रि १९१३
७- गुरु माता मिनीमाता पुण्यतिथी ११ अगस्त १९७२
८ गुरु जयन्ती पर्व प्रवर्तक मन्त्री नकूलदेव ढीढी जयन्ती १२ अप्रैल १९१४
९- अन्तर्राष्ट्रीय पन्थी नर्तक देवदास जयन्ती ...अप्रैल .......
१०- तपोभूमि गिरौदपुरी सत्धाम मेला -फागुन शु ५-६-७
११- भन्डारपुरी/ तेलासीपुरी / खडुवा खपरी धाम मे - दशहरा - क्वार दसमी / एकादशी
१२- गुरुगद्दी पूजामहोत्सव क्वार एकम से दसमी। १० दिवसीय आयोजन।
१३- सतनामायण / गुरुग्रन्थ / सन्तमिलन / सत्सन्ग प्रवचन ३-५-७ दिवसीय समारोह।दिसम्बर से मई तक।
१४ - सतनाम रावटी स्थल दर्शन यात्रा  (गुरु बाबा द्वारा ९ जगहो पर धर्मप्रचार हेतु डाले गये पडाव या रावटी स्थलो के दर्शन यात्रा।)अक्टूबर से   मई तक ।
१५ बोडसरा / अम्मरद्वीप अमरटापु / पताढी / पचरी धाम मेला
१६- चौका / साधु अखाडा / सतनाम सन्कीर्तन / भजन व सतनाम व्रत कथा सुख दुख दोनो अवसर पर सार्वजनिक व व्यक्तिक
       इस तरह उपर्युक्त जंयती व्रत उत्सव मेले आदि का आयोजन  मानव जीवन में उत्साह उमंग लाते है और धार्मिक आध्यात्मिक  सामाजिक आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति करते सुख व समृद्धि लाते  है।
     डा. अनिल भतपहरी
            सचिव
सतनाम साहित्य प्रकोष्ठ
प्रगतिशील छ. ग. सतनामी समाज
                      ।‌‌। सतनाम ।।

Saturday, September 14, 2019

कहे- माने

कहे-माने

ऐसा भी नही
कि पल मे उजड़ जाएगी
पल में बदल जाएगी
पल में संवर जाएगी
यह दुनियां
बनी है धीरे-धीरे
तो जाएगी धीरे-धीरे 
यह कैसी अवधारणाएं 
रहोगे नही तुम 
पर नाहक तुमने
नश्वर कहे-माने
नश्वर तो तुम्ही हो
मुगालते मे रहे प्यारे
ईश्वर के सहारे
उसे भी अपना- सा कह
अमर कहे-माने
जबकि इसी दुनियां मे
कितने ईश्वर आए-गये
अमा मजे़दार है कहे-माने

‌‌      -डा.अनिल भतपहरी

Saturday, August 31, 2019

छत्तीसगढ के पर्व और व्यंजन

छत्तीसगढ़  के पर्वानुसार प्रमुख व्यंजन -

तिहार - रोटी/ व्यंजन
हरेली - चीला
पोरा - सोंहारी
तीजा - कुसली /गुजिया
पितर - बरा
देवारी - अइरसा -खिचरी- रोठ
देवठन - फरा -चुकिया
जयंती - तस्मई-चीला
सकरात - तिली- फल्ली  लाड़ू
होरी - ठेठरी -खुर्मी
बर -बिहाव - कड़ी ,बुंदी लाड़ू
मरनी पंगत - मालपुआ / लाडू / बरा
नित्य खान पान - दार -भात - चीला ,अंगाकर, खपरा व बेलना रोटी    साग -भाजी( ४० प्रकार)  बासी( पखाले अउ बोरे ) मिर्चा पताल  अमली करौदा सहित बहुत कन   चटनी आम नीबू आचार ।  मांसाहारी (एच्छिक है)
सहायक व्यंजन -
भजिया आलूचाप आलू गुंडा ,गुलगुला ,बटिया ,दूधफरा   धुसका ,बोबरा  पोपची ,चौसेला ,पिड़ीया , खाजा , खोवा पेडा बालुसाय ,बतासा ,जलेबी सोल काड़ी, पापड़ बरी बिजौरी इत्यादि । मैदा की खस्ता कतरन कार्टुन 
और लुप्तप्राय: टोड़वा  छाता रोटी मंदरस में डुबाकर या उनके  संग ।
यह सब  छत्तीसगढी व्यंजन व मिष्ठान्न है।जिन्हे सुविधानुसार  व इच्छाजनित किसी भी पर्व में बनाए खाए खिलाए जाते है ।
      बेसिक सामाग्री अनाज चांवल गेहूं चना तिल उड़द मुग गुड शक्कर मंदरस दूध  लौग लायची नाडियल खोपरा ।
पेय पदार्थ - चाह , पेज ,पसिया  दूध, मही , गुडपानी शक्करपानी   बेल सरबत ताड़ी  सल्फी मंद, हडिया लांदा आदि।  
       इतनी विविधता के बावजूद यहां कोई भी रोटी व व्यंजन व्यवसायिक रुप से नही बनाए जाते न होटलों रेस्त्रां आदि में बिकते है।
    यहा होटल व रेस्त्रां की संस्कृति नही  रही है लोग गांव  शहरों में रिश्तेदारों के घर भोजन करते है ।
  हां नास्ते में जरुर चाय भजिया आलूगुंडा  बडा समोसा  मिक्चर आदि मिलते है और छोटे छोटे जलपान गृह है उसे ही होटल कहने की परंपरा है।
   संस्कृति विभाग के पहल से कही कही शासन द्वारा प्रचरार्थ इन व्यंजनो के स्टाल  रेस्त्रा गढ़ कलेवा जैसे दो चार सेंटर खलने लगे है।
    टीप -लाज मे रुके बर इहा के मन अबड़ लजाथे  जरुरत परे मं सोझे सहर के सड़क बगीचा बस अउ रेल स्टेशन म मच्छर बबदू के बावजूद ससन भर सो जथे ।
   छग में अनाज को  सड़ा- गलाकर कोई भी व्यंजन नही बनाए जाते न बनाने की संस्कृति है।

    डा. अनिल भतपहरी

Saturday, August 24, 2019

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Sunday, August 18, 2019

खुमान -संगीत

खुमान संगीत

       रविन्द्र संगीत की तरह खुमान संगीत एक अलग अहसास हैं संगीत प्रेमियों के लिए । बाल्यावस्था में ही पिता श्री (सुप्रसिद्ध रंगकर्मी व सतनाम संकीर्तन कार सुकालदास भतपहरी "गुरुजी"  ) के सानिध्य में गीत- संगीत अभिनय आदि सीखने और प्रदर्शन करने  का अवसर मिला ।

      गर्मी व दशहरा - दीवाली  छुट्टी में  गृहग्राम जुनवानी आते तो घर  के  आंगन में खाट पर बैठे पिता श्री बाँसुरी से "का धुन बाजव मय धुनही बसुरिया"  वाली गीत का  धून छेड़ते तो मैं पास रखे हारमोनियम से संगत करते चिटिक अंजोरी निरमल छंइहा ... बजाने कहता और फिर खुमान साव की अनेक धुन युं ही बिना लय तोड़े गीत बजते जाते ... आसपास के कथा कहानी  कहने वाले शोर गूल  करते रेशटीप और अंधियारी - अंजोरी खेलते  बाल टोलियां और निंदारस में डूबे रोचक वृतांत में उललझने वाले सब मोका जाते और हम दोनो बाप बेटे की जुगलबंदी सुनने सकला जाते ... फिर भजन गीत गाने फरमाइश भी होने लगते ...
      आकाशवाणी रायपुर  में बुधवार को दोपहर  सुर श्रृंगार सुनने स्कूल बंक मारते ... और गणित रसायन वाले सर से डांट सुनते पर जब जब  चौरा म गोंदा रसिया, मोर संग चलव रे काबर समाए  रे मोर बइरी नयना मं, पान ठेला वाला या मंगनी म मांगे मया न इ मिलय   जैसे  गीत सुनते  मन अल्हादित हो जाया करते और डाट फटकार होम वर्क की दंश से मुक्त भी हो जाते ।
उनके गीत सैकड़ों- हजारों  बार विगत ४० वर्षों से  सुनते व गुनगुनाते आ  रहे पर मन नही अघाते .. .पता नही क्या चीज इनमें भरा हुआ हैं ?  फिल्मी गीत इनके समछ हल्के लगते ।
कारी  ( एक बार टेकारी आरंग में वही रामचंद देशमुख जी  को  देखे )व चंदैनी गोंदा   (अनेक बार अनेक जगहों पर  झुलझुल कर सिगरेट पीते बिधुन हारमोनियम पर उंगुली थिरकाते खुमान साव जी का दर्शन और दुआ सलाम मंच पर जाकर कर आने का भाग्य हमें कई बार मिल चूका है।
...रामचंद खुमान लछ्मन के तिकड़ी ने वह किया कि छत्तीसगढ़ी की बिगड़ी ही बन गई ।ये तीन ही काफी है कही भी कभी भी इनके भरोसा  खोभिया के या अड़िया के खड़े होने के लिए हम जैसों के लिए ...
    अनेक  गीतों में अपनी  बेहतरीन संगीत संयोजन से जनमानस को मुग्ध व आनंदित करते छत्तीसगढ़ी संगीत को  शिखर तक ले जाने वाले महान संगीतकार खुमान साव जी  को ...विनम्र श्रद्धांजलि ! सत सत नमन।
     ।।वे गये नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के फि़जा में बिखर गये ।।  
      -डा अनिल भतपहरी