Thursday, August 15, 2019
Tuesday, August 13, 2019
तिरंगा लहरन लागय हो
शा. हाई स्कूल कोसरंगी( खरोरा )कक्षा 10 में अध्ययन के दरम्यान स्वतंत्रा दिवस की तैयारी करते यह गीत हमसे 1984 में लिखे ....यह गीत प्रत्येक स्वतंत्रता पर्व में स्मृत होते हैं और अक्सर गाते गुनगुनाते यह दिन व्यतीत होते हैं- तिरंगा लहरन लागय हों
चारो डहर म आज तिरंगा लहरन लागय हो
फहरन लागय लागय हो
देख मन झूमरन लागय
तिरंगा लहरन लागय हो...
लहू के नदिया बोहाय.हे संगी ये देश के माटी म।
कतको वीर जवान शहीद जेन हासत चढ़गेफांसी म।
आज उकरे सुरता हिरदे म बीयापन लगाय हो.....
2केशरिया बल त्याग देवैय्या सादा ह सच्चाई ये।
हरियर रंग खेती बारी के
सदा राहय हरियाली ये।
चक्र घूम घूम एकता के संदेश बाटन लागय हो....
3बड़ भाग्मानी हमन सन्गी आज मिलिस आज़ादी ह।
भागिस हे अंग्रेजिया दुश्मन
बाचेन बरबादी ल।।
आज खुश हो झूम अनिल गीत गावन लागय हो.....
डॉ अनिल भतपहरी
रचना 12 अगस्त 1984कोसरंगी खरोरा।
Friday, August 9, 2019
विराट कवि सम्मेलन
तपोभूमि गिरौद पुरी सतधाम मेला परिसर मे प्रगतिशील छग सतनामी समाज द्वारा दि ४-३१७ को आयोजित "विराट कवि सम्मेलन "मे तकरीबन ८५ कवि /कलाकार रात्रि ८ बजे से प्रात:७ बजे तक अनवरत ११ घण्टे बेहतरीन प्रस्तुतिया देते रहे..ऐसा लग रहा था कि न श्रोताओं के मन भर रहे है न प्रस्तोताओ के।लगन दोनो ओर लगी रही ..सप्तमी के पावन प्रात: बेला मे गुरु घासीदास का आव्हान करते -
तोला नेवता हे आबे गुरु बाबा घासीदास गिरौदपुरी म मेला हे ..के सामूहिक मंगल गान से पुरे देश भर से एकत्र सभी प्रस्तोता- श्रोता एंव आयोजक बधाई देते मंगल कामना करने लगे। उत्साह उमंग और विस्तारित होने लगे ....हर्ष ध्वनि होने लगे एक- दो बुजुर्ग सन्त कलाकार मगन थिरकने लगे
अनेक लोग अभिभूत थे कि ऐसा विलछण अवसर अपने जीवन काल मे पहली बार गिरौदपुरी मे देख सुन रहे है कह प्रफुल्लित अभिव्यक्ति दिये जा रहे थे।
काव्य पाठ का शुरुआत कु मीना जान्गडे से और समापन श्रीमती सतरुपा नवरंग से हुई।८१ कवि ४ कवियत्रियो एव ५-७ संगतकारो से मंच शोभायमान रहा ।इनमे कोई गुरु चरित सतनाम धर्म संस्कृति व समाज सापेछ कविता गीत तो कोई सस्वर मंगल पंथी भजन प्रस्तुत कर पुरे रात भर विशाल श्रोता समूह को बान्धे रहा। लोक मंगल कारी सतनाम साहित्य को छग और राष्ट्रीय स्तर के भाषाई पाठ्यक्रम मे रखने संबंधी बाते भी उठी।
सभी प्रतिभागियों को उप अतिथियों एंव आयोजको द्वारा त्वरित प्रशस्ति पत्र प्रदान किये किये जा रहे थे.
राजस्थान हरियाणा फर्रुखाबाद हरिद्वार दिल्ली भोपाल असम नागपुर जैसे देश के सुदुर जगहों अनुयाई व श्रद्धालू गण मंच को शोभायमान किये।
उन सब के प्रति सादर धन्यवाद
जय जय सतनाम
डा अनिल भतपहरी
सचिव
सतनाम साहित्य प्रकोष्ठ
प्रगतिशील छग सतनामी समाजों
गुरुदर्शन दंशहरा मेला भंडारपुरी
"गुरुदर्शन मेला भंडारपुरी "
सुप्रसिद्ध गुरुदर्शन मेला भंडारपुरी क्वार शुक्ल एकादशी को भरता है जहां लाखों श्रद्धालू देश भर से एकत्र होते है।
गुरुघासीदास द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ का व्यापक प्रचार - प्रसार छत्तीसगढ म.प्र.उडीसा मे हुआ।लाखों अनुयाई और उनसे संपर्क कर व्यवस्थित स्वरुप देने रामत का सूत्रपात हुआ।
इन्ही रामत की पड़ाव तेलासी - भंडारपुरी में सैकड़ो एकड़ की भूदान प्राप्त हुआ। फलस्वरुप वहां संत समागम एंव धार्मिक कार्य के निष्पादन हेतु स्मारक आदि बनाने की परिकल्पना साकार होने लगी।संयोगवश अंग्रेज सरकार सतनामियों की लाखों संख्या और उनकी सादगी पूर्ण रहन - सहन तथा कठोर परिश्रम से पड़ती जमीन को उपजाऊ बनाकर कृषि कार्य में रत लोगों के मार्गदर्शक गुरुघासीदास के प्रभाव को महत्व देने उनके युवा प्रतापी पुत्र बालकदास को जो सामाजिक संगठन के छेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे थे। उन्हे सोने की मूठ वाली तलवार हाथी और सैनिक रखने की अनुमति देते ८ गांव समर्पित कर राजा धोषित किए। राज्याभिषेक का स्वर्णिम पल ही कलान्तर में "गुरुदर्शन मेला "के रुप में परीणित हुआ।
छत्तीसगढ़ में सतनाम- धर्म संस्कृति की यह सर्वप्रथम महाआयोजन है। इनका शुभारंभ १८२० - २१ मे हुआ।
सतनाम धर्म -संस्कृति में राम- रावण युद्ध व रावण जलाने वाली दशहरा की प्रथा नही है।बावजूद गुरुदर्शन समागम को दशहरा कहे जाने लगे क्योकि यह दशहरा के ठीक दूसरे दिन मनाये जाने उत्सव थे फलस्वरुप जनमानस इसे "भंडार दसहरा मेला" कह कर संबोधित करने लगे।इस दिन राजा गुरुबालकदास भाई आगरदास पुत्र साहेब दास राजसी स्वरुप में हाथी घोड़े ऊंट आदि मे चढकर शोभायात्रा जुलुश निकालते और आखाड़ा प्रदर्शन , पंथी नृत्य करते अनुयाई हर्षोल्लास पूवर्क राज्याभिषेक का जश्न मनाते ।
कलान्तर में भंडारपुरी में किला (गढी) के साथ- साथ गुरुघासीदास के निर्देशन में सतनाम साधना व ध्यान सत्संग आदि के लिए भव्य चौखंडा मोती महल गुरुद्वारा का निर्माण १८३० में हुआ। उनके समछ सूरज- चांद नाम के विशाल जैतखाम स्थापित किए गये । तथा इसी क्वार शुक्ल एकादशी तिथि को ही आयताकार सत्यध्वज "पालो " चढा़ने और जयकारा लगाते असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनाने महोत्सव का सूत्रपात हुआ ।इस दिन लाखो अनुयाई को गुरु एंव गुरु पुत्र धर्मोपदेश देते हैं। अनेक तरह के सत्संग प्
Sunday, August 4, 2019
Tuesday, July 30, 2019
श्रमण -गुरुमुख सञस्कृति
आदिधर्म सतनाम श्रमण संस्कृति का अभिन्न श्रुति परंपरा हैं। इनमें वक्ता "गुरु" और श्रोता शिष्य या अनुयाई हैं। यह गुरु चेला के मध्य वार्तालाप परीक्षण प्रसंस्करण द्वारा जनमानस में अजस्त्र प्रवाहमान हैं। इसलिए यहा गुरुमुखी संस्कृति का दिग्दर्शन होते हैं-
गुरुमुख गुरुमुख पार उतरगे नेगुरा ह गये भुंजाय
जैसे साखी से यह प्रमाणित होते हैं। साधना सिद्धि कर कोई भी प्रग्यावान सतनाम के स्वरुप को जान समझकर गुरुत्व भार गुरुपद धारण करते है। तथा अपनी वाणी ध्यान स्पर्श व आशीर्वाद से शिष्य के अन्तर्मन को प्रकाशमान करता है। उनके अंदर की आत्महीनता तमस आलस्य प्रमाद को हटाकर उन्हे ओजस्वी तेजस्वी और विवेकी बनाते हैं।
ऐसे ही समर्थवान शिष्य ही गुरु के निर्देशानुसार जनकल्याण के निमित्त अनेक रचनात्मक कार्य में प्रवृत्त होते हैं।
मन वचन कर्म से यदि कोई व्यक्ति इन मह्ती कार्य को करे तो वह निर्मल यश के प्रतिभागी होकर जीते जी परमपद व सतलोक प्राप्त करता हैं।
यह सतनाम संस्कृति बौद्ध धम्म ,खालसा पंथ ,कबीर पंथ ,साध पंथ ,सतनामी पंथ, राधास्वामी मानव धर्म, प्रेम पंथ,जैसे अनेक मत पंथ सम्प्रदाय में अस्तित्व मान होकर इसी श्रुति परंपरा संगत पंगत अंगत द्वारा वैश्विक विस्तार की ओर अग्रसर है।
।।सतनाम ।।
संसार सतनाम मय हो
सतश्रीसतनाम
डा- अनिल भतपहरी
चित्र - सतनाम धाम नारनौल दोशी पहाड़ समीप नई दिल्ली भारत
Wednesday, July 24, 2019
छ ग मे कबीर - सतनाम पंथ
कबीर पंथ हिन्दू धर्म के ईश्वर के निर्गुण स्वरुप का उपासक लोगों के समूह थे और समाज मे व्याप्त यथास्थिति वाद के समर्थक व संवाहक भी उनके शिष्य धर्मदास जी कबीर की प्रखरता को साफ्ट हिन्दूत्व रुप दिए क्योकि वे आरंभ से वैष्णव थे वही छत्तीसगढ मे कबीर पंथ का प्रवर्तन ४२ वंश की आशिर्वाद लेकर किए फलस्वरुप कबीर के मूल स्वर यहां अनुगंजित नही हुई।बल्कि अनेक शाखाओं प्रशाखाओं में विभक्त वर्णाश्रम व जातिय व्यवस्था में आबद्ध रहे और कर्मकांड आदि संलिप्त भी ।
जबकि गुरुघासीदास ने ईश्वर के कथित सगुण - निर्गुण से परे बुद्ध की तरह नजरांदाज करके मानवीय व्यवहार व लोकाचार और कृत्रिम जात- पात से विमुक्त कराकर परस्पर सद्भाव व समानता से युक्त सतनाम पंथ प्रवर्तन किया फलस्वरुप अनेक प्रग्यावान और (अ)धर्म -कर्मकांड आदि से उत्पीडित लोग तिलांजलि देकर जातिविहिन वर्गविहिन सतनाम पंथ अंगीकृत कर लिए।
उनकी इस कदम से आह्त सुविधाभोगियों ने अपनी अस्मिता बचाने गुरुघासीदास व सतनामियों के प्रति अनेक तरह के नकरात्मक भ्रम फैलाए ताकि उनके आकर्षण से तेजी से हो रहे पंथ प्रवर्तन थम जाय ।इस अनुक्रम उनके पुत्र राजा गुरुबालक दास की हत्या और सतनामियों को ग्रामों से बेदखल और संपत्ति हडपने जैसे कुचक्र भी चला । १८५०-१९५० करीब १०० वर्षो तक निरंतर उत्पीड़न का दौर जारी रहा। कमोबेश अब भी इन समुदाय के प्रति नकरात्मक रुप से शेष अनुजाति वर्ग से अलग व्यवहार हिन्दुओं और उनके देखा देखी आदिवासी व अन्य प्रांतिक व धर्मी लोगों मे है।
छत्तीसगढ के ग्रामों मे हिन्दू बनाम सतनामी की अवस्था ठीक वैसे ही है जैसे अखिल भारतीय स्वरुप मे हिन्दू बनाम मुस्लिम यह स्पष्ट विभाजन आज भी देखे जा सकते है।