Sunday, April 14, 2019

सतनाम साहित्य एक परिचय

सतनाम- साहित्य एक परिचय

  गुरुघासीदास द्वारा  सतनाम -पंथ  प्रवर्तन के साथ सप्त  सिद्धान्त ,४२  अमृतवाणी, २७ मुक्तक ९ रावटी व अनगिनत उपदेश  दृष्टान्त - अनुयायियों के सम्मुख अपने  श्री मुख से नि:सृत किये ।वही उनके विशिष्ट शिष्यों के कंठ में विराजमान हुए ।तथा   गुरुमुखी परंपरा के अनुरुप देश के अनेक भागों में  निरन्तर प्रचार प्रसार किए वही सब  पंथी गीत मंगल भजन चौका  आरती गीत व लयात्मक उक्तियों और बोध व दृष्टान्त कथाओ  के रुप में सतनाम साहित्य  धारा  जनमानस में अजस्र रुप से  प्रवाहित होने लगी। कलान्तर में यह  लिपिबद्ध होकर सर्व मंगल कामना से युक्त छत्तीसगढ़ी में शिष्ट साहित्य के रुप में चिन्हांकित हुई ।इन्हें  अन्य भाषाओँ में लाकर व्यक्ति स्वतंत्रता और स्वाभिमान की महक को सर्वत्र महसूस कराने की आवश्यकता हैं। क्योंकि  अठारहवीं सदी में भारतीय  नवजागरण का जो स्वर उभरे  उनमें  सतनाम साहित्य ही स्वर सर्वाधिक मुखर रहे हैं-

मंदिरवा मं का करे ज इबोन
  अपन घट के देव ल मनइबोन 
    कह जो जनजागरण की बाते कहीं गई वह अप्रतिम हैं।
  जनमानस में भाग्य भगवान के प्रति अनास्था  रुढ- मूढ प्रवृत्तियाँ और इनके नाम पर सामंत पंडे पुजारी व सुविधाभोगियों के विरुद्ध जो प्रतिरोधक  चीजें आई उनमें इसी सतनाम साहित्य और गुरुघासीदास उनके पुत्रों एंव संत-महंत द्वारा चलाए सतनाम जागरण  अभियान की भूमिका महत्वपूर्ण रहा हैं।  इसका प्रभाव अब भी कायम हैं। बल्कि ज्यो ज्यो समाज शिक्षित होते जा रहे गुरु की वाणी और उपदेश त्यो त्यो साफ साफ समझ आते जा रहे हैं ।
   गुरुघासीदास के समकालीन मेजर पी वान्स एग्नु  द्वारा सुबे के प्रतिवेदन में गुरुघासीदास के प्रभाव परिलक्षित होते हैं। उनके अन्तर्ध्यान  1850 के दो दशक बाद 1868-70  मे विभिन्न अंग्रेज लेखक व अधिकारी जिनमे मि चिशोल्म ब्रिग्स हैविट बेगलर लोर जैसे डेढ़ दर्जन लेखक अधिकारी गुरुघासीदास के सतनाम जागरण अभियान और उनकी उपदेश शिक्षा से समाज में जो प्रभाव पड़ा पर सूचनात्मक आलेख प्राप्त होते हैं।
   प्रदेश में सर्व शिक्षा  के तहत साक्षरता आई  तब अनुआईयों में  कंठ दर कंठ वाचिक परंपरा मे आई । गुरु की अमृतवाणियां, उपदेश आदि लिपिबद्ध होने लगे। पंथ की वाणी ही पंथी गीत के रुप में कठस्थ रहे ।यही सतनाम साहित्य के रुप में ख्यातिनाम हैं।
जो कि सर्व मंगल कामना से युक्त मानवता की यश गाती हुई अमृतवर्षा करती लोक मंगल की कामना लेकर प्रस्फुटित है । जहां न दंभ न दर्प अपितु संसार की छण भंगुरता जीवन की नश्वरता माया के विस्तार और अनेक भ्रामक व मिथकीय स्थापनों व  सडयंत्रों से बचाकर  सत्य को उद्घाटित करती सरल- सहज जीवन निर्वाह के सुन्दर उपाय हैं।

      सतनाम - पंथ ( धर्म ) से संदर्भित प्रकाशित रचनाओं व रचनाकारों  का उल्लेख निम्नांकित हैं-
प्रबंध काव्य/ महाकाव्यात्मक  स्वरुप
१ गुरुघासीदास चरित - पं सुखीदास
२ सतनामी महापुराण - पं सुन्दरलाल शर्मा १९०७

३ सतनाम - सागर - संत सतनाम दास १९२८
४ गुरुघासीदास नामायण - मनोहरदास नृसिंह १९६८
५अथ गुरुघासीदास सत्यायण - पं सखाराम बधेल ( १९७५)
६ सतनाम पोथी - सामायण - पं सुकुल दास धृतलहरे ( १९८९ )
७ गुरुबाबा घासीदास लीला - सुखरु प्रसाद बंजारे
८सतनाम धर्म ग्रंथ सतसागर - नम्मूराम मनहर २००४
९सत्यवंश सतनाम धर्म ग्रंथ - राजमहंत नंकेसर लाल टंडन २००४
१० श्री प्रभातसागर -  डा मंगत रविन्द्र
  
११सतनाम पोथी २०१२

१२सतनाम सरित प्रवाह - डा अनिल भतपहरी   अप्रकाशित पांडुलिपि में

खंडकाव्य -

१ सतनाम खंडकाव्य - डा मेधनाथ कन्नौजे
२ गुरुअम्मरदास जी - नम्मूराम मनहर
३ राजा गुरुबालकदास - नम्मुराम मनहर
४ सतनाम- संकीर्तन सुकाल दास भतपहरी
५ गुरु उपकार , गुरु उपकार - साधु बुलनदास
१९९२-९३
६ गुरुघासीदास सतवाणी - पुरानिक चेलक
७  गुरु घासीदास आरती संग्रह - नम्मुराम मनहर

८ मंगल भजन संग्रह - पं सखाराम बघेल
गुरुघासीदास पंथी मंगल - मनोहर दास नृसिंह
९ गुरुघासीदास चौका मंगल आरती 
१० एक था सतनामी भाग १-२-३ पुरानिक चेलक
   सहित अनेक पंथी मंगल भजन चौका आरती संग्रह प्रकाशित है।

गद्यात्मक सतनाम साहित्य -

१ सतनामी और सतनाम आंदोलन- डा शंकरलाल टोडर
२ सतनाम - दर्शन - इंजी टी आर खूंटे 
३ गुरुघासीदास अमृतवाणी मुक्तक व रावटी - राजमहंत नयनदास कुर्रे
४गुरुघासीदास संधर्ष समन्वय व सिद्धांत - डां . हीरालाल शुक्ल
५ सतनाम के अनुयाई - डा जे आर सोनी
६ परम पूज्य गुरुघासीदास जी सद्ग्यान
७ सतनाम की दार्शनिक पृष्ठभूमि - डा जे आर सोनी
८ सतनाम पोथी - डा जे आर सोनी
९ सतनाम रहस्य - डा जे आर सोनी
१० गुरुघासीदास की देन - श्रीकांत दूबे
११ छत्तीसगढ़ राज्य और सतनामी समाज
१२ राजा गुरुबालकदास - नम्मुराम मनहर
१३ गुरुघासीदास लीला - बाबू खान
१४ पंथीगीत और राष्ट्रीय चेतना - डा जे आर सोनी
१५ सतनाम दर्शन भाग एक व दो - भाऊराम धृतलहरे
१६ पांखी -- सेवकराम बांधे
सहित अनेक स्वतंत्र पुस्तकें
१७ गुरुघासीदास और उनका सतनाम आन्दोलन - साधु सर्वोत्तम साहेब
१८ छत्तीसगढ़ में सतनाम आन्दोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण - प्रो पी डी सोनकर
१९ गुरुघासीदास का सतनाम आन्दोलन एक जनक्रांति - डा. दादूलाल जोशी
२० छत्तीसगढ़ के निर्गुण संत साहित्य में गुरुघासीदास का योगदान - डा अनिल कुमार  भतपहरी ( शोध प्रबंध )

पत्र/ पत्रिका -

सत्यध्वज -
संपादक दादूलाल जोशी
सत्यालोक - डी एल दिव्यकार
सतनाम - संदेश - डा अनिल भतपहरी
सत्यदर्शन - घनारा म ढिन्ढे
सत्यदर्शन - डा आई आर सोनवानी
सत्यकिरण
सत्यसंदेश
जयसतनाम -  प्रो पी डी सोनकर व देवचंद बंजारे
सतनाम पत्रिका १-१४ अंक संपादन - नम्मुराम मनहर

   इस तरह देखे तो छत्तीसगढ़ी और हिन्दी में सतनाम धर्म संस्कृति और गुरुघासीदास चरित तथा सतनामी समाज के प्रमुख व प्रभावशाली  व्यक्तित्व के ऊपर लेखन एक व्यक्ति स्वतंत्रता और सत्य निष्ठा पर आधारित सर्व कल्याण की मंगलकामनाएं करते लौकिक रुप से ऐतिहासिक उपलब्धि और घटनाओं का दस्तावेजी करण हैं।
    इन सबके अनुशीलन से समकालीन छत्तीसगढ़ का वास्तविक रुप से दिग्दर्शन किया जा सकता हैं। इनके आधार पर कलान्तर में और भी प्रभावशाली साहित्य सृजन की आपार संभावनाएँ है। अनेक विश्वविद्यालय सतनाम साहित्य के ऊपर अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित भी कर रहे जिससे शोधकर्ताओं ने इस पर गंभीरतापूर्वक कार्य कर अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर कर रहे हैं। जो कि प्रशंसनीय हैं।

     - डा. अनिल कुमार भतपहरी
       
     सहायक संचालक उच्च शिक्षा  विभाग रायपुर  छत्तीसगढ़ शासन छ

Thursday, April 11, 2019

जुगुलदास उर्फ चोर चरणदास

"जुगुलदास सतनामी उर्फ चरणदास चोर "
    विश्वविख्यात  छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य चरणदास चोर जिसे कई विद्वान  गुजराती लेखक विजयदान देथा कृत चोर-चोर कहानी से प्रेरित मानते हैं ।अभी -अभी‌ किशोर साहू सम्मान हेतु विख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल ने भी पद्मविभूषण हबीब तनवीर को उसी कहानी के बारे में बताने का जिक्र किया। इस तरह यह तेजी से विगत कुछ वर्षों से स्थापित होते जा रहे हैं कि चरणदासचोर गैर छत्तीसगढ़ी कथानक हैं।
      बाहरहाल यह देथा की काल्पनिक  कहानी से प्रेरित हो तो सकते हैं। पर छत्तीसगढ़ का जीवन्त पात्र जिनके सभी कारनामे यथावत इस नाटक में हैं। उस जुगुलदास सतनामी के संदर्भ में जानकारी देना इस आलेख का मुल प्रयोजन है।
        हमारे शिक्षक  पिताश्री सतलोकी सुकालदास भतपहरी बहुमुखी प्रतिभा के धनि थे और अपने स्कूल में अन्य सहयोगी शिक्षक और छात्रों को लेकर शौकिया अभिनय व  रंगमंच करते थे ।चरणदास चोर को वे तनवीर  साहब से अलग हर साल ८-१० बार १९७५-९५ तक रचते रहे। और  नये नये प्रयोग करते रहे । हमलोग बचपन से उनमें रमे रहे। उजागर रतन एंव गुरुबाबा जिसे साधु कहे गये का रोल हम निभाते रहे। पिताजी चरणदास  चोर बनकर  -पैलगी गुरुबबा कहते ....और हम  जीयत राह बेटा अम्मर राह कहते तो बाप बेटे की इस संवाद से दर्शकों में एक अलग समा बंधता ।  जब चरणदास को भाले से छेदकर मारने वाली करुण दृश्य आते तो लगभग सिहरते हुए कह ता - जीयत राह ....... बेटा ...... अम्म र .....राह तो दर्शक दहाड मार रोने लगते ..... महिलाओं की दशा दर्शनीय होते !  खैर करुणा और  संवेदना का वह मंजर हमने आजतक कही नहीं देखा न जिया ।
       एक बार धीवरा खरोरा में १९८२-८३ में टेडेसरा की नाच पार्टी चरणदास चोर गम्मत लेकर आए उसे देखने गये।स्वर्णकुमार वैद्य जो उसके संचालक थे ने चरणदास के संदर्भ में जानकारियाँ देने लगे कि यह जुगुलदास सतनामी के जीवनी से गढे गये लकनाट्य हैं। वे देशी राबिनहुड थे और धनिको से उनके धन  को लूटकर गरीबो मे  में बाटते थे। सतनामी धर्मगुरु से दीछा लेकर आजीवन सत्य को धारण कर ऐसा ही जनकल्याण करते रहे।
    यह बचपन की सुनी बाते जेहन में रहा। आगे जब जब इस पर चर्चा होते हम सविनम्र स्वर्णकुमार वैद्य जी के धीवरा मे कही बाते दुहराते। पर कोई साछ्य नहीं जुटा पाए न जुटाने की जहमत उठाए। हमने हबीबतनवीर व उनके कलाकार मंडली गोविन्द निर्मलकर आदि से डोंगरगढ के कार्यशाला में  १९९४ मे सी डी डोन्गरे स्टेशन मास्टर   के मार्फत मिले  जो कभी हबीब साहब के अजीज थे।पर इस संदर्भ में कोई जिक्र नहीं किए क्योकि तब यह बात ही नहीं था। और हम चरणदास को जुगुलदास की ही कथा समझते रहे।
पर विगत कुछ वर्षो से यह बात तेजी से फैलती जा रही हैं कि चरणदासचोर की कथानक गैर छत्तीसगढ़ी हैं। और यहां के जनजीवन से कोई वास्ता नहीं । तब हमारे बालपन से बसे वह बात भीतर भीतर मथने लगा कि ऐसे कैसे जुगुलदास को दफ्न कर दे।
   तब हमारी अपनी और सबकी मीडिया सोशल‌ मीडिया में इसे पोष्ट किया।सौभाग्यवश राजनांदगांव फरहद निवासी वरिष्ठ  कलाकार सेवानिवृत्त  व्याख्याता व रचनाकार डा दादूलाल जोशी सप्रमाण  कहे कि उनके पिता श्री जो सनाड्य व सम्मानिय रहे से मिलने जुगुलदास आया करते थे ।वे निर्धनो में अत्यन्त लोकप्रिय रहे। वे भी स्वीकृति दिए की जुगुलदास ही चरणदास रचने के प्रेरणा पुरुष थे। इस तथ्य को यहां के लोगों को भलीभांति समझना चाहिए। हबीब साहब को‌ कोई मौखिक में जुगुलदास के संदर्भ में बाताए भी होन्गे।जैसे बहादुर कलारिन, हिडमा और अन्य ऐतिहासिक पात्रों के संदर्भ में बताए और वह मंच में सजीव हो उठे।
     बाहरहाल जुगुलदास रायपुरा डौडी के निवासी थे और अपने आसपास राबिनहुड छवि के कारण जनमानस में लोकप्रिय रहे।और जीते जी किवदन्ती हो गये। उन्हे जनमानस जाने समझे और अन्वेषक इस दिशा  में गहनता से काम करे ऐसी आपेछा हैं।

      जय छत्तीसगढ़
डा. अनिल भतपहरी

Wednesday, April 10, 2019

इश्क

इस कदर डूबा तेरे इश्क़ में
हर रंग दिखा तेरे इश्क़ में
देखते ही झक सफेद
सूरज की किरण हुआ तेरे इश्क़ में

जीवन

"जीवन "
वन मे जी उसे कहते है जीवन
पर  विकल वहा सभी हैं बेमन
व्याकूल वन में भटकते वन्यप्राणी
पीने को न मिले  एक बुन्द पानी
चले  गांव जहां मिल जाय जिनगानी
पर भैय्ये यहां जीवन ही हैं  हलकानी
तो चले शहर चलकर देख ले
उखडती हुई  कुछ सांसे बचा ले ....

पर क्या शहरों में जीवन बचा है
मरने के कगार पर वह खडा है
तब से यह कहावत हुआ चरितार्थ
जब मौत समीप हो तो आते शहर की याद

(आज प्रात: सोनारदेवरी पलारी में प्यासे भालू भटकते आकर बेर पेड में चढ गये उसी से प्रेरित चंद पंक्ति)
- डा. अनिल भतपहरी
प्राध्यापक ,
शा बृजलाल वर्मा महा पलारी

छत्तीसगढ़ी साहित्य दसा अउ दिसा



छत्तीसगढी साहित्य समिति के प्रांतिय सम्मेलन  मं पढे़ आलेख के सार- 

"छत्तीसगढ़ी साहित्य दसा अउ दिसा "

                        -डा.अनिल भतपहरी 

छत्तीसगढ़ी के लिखित साहित्य के दसा हर तो बड़ सुघ्घर हवे‌।फेर ये समे म मौखिक या मुअखरा साहित्य के दसा जरुर बिगड़त हवे।

तंइहा समे मं त आनी- बानी कथा कहिनी गीत गोबिन्द भजन - कीर्तन होय। अइसे कौनो घर नइ रहिस होही जिहां बबा ढोकरी दाई या ममा दाई मन सो कथा कहिनी सुनके लरिका मन के नींद परत रहीस होही।

    बारो महिना तिहार बार मं संझाकन गुड़ी त कोन्हो बर पीपर या लीम अमली के तरी छांह मं ब इठ कत्कोन कथा -कहिनी , जन उला  भजन चलय ।अउ यही हर मनोरंजन के परमुख साधन रहय।

तिही पाय के हमर भाखा मं किसिम किसिम के मुंहावरा लोकोत्ति अउ संत महात्मा मन के बानी मिंझरे  अंतस ल उजास करय ।  भखा बोली बने राहय त घर गली गांव मं सुन्ता सम्मत रहय।

    सियान अउ बैठांगुर मन काकर घर का चलत हे काकर मन मं का हवे । तेकर आरो पता करत रहय।अउ जिकर मन मं इरखा दोष रहे या पले उन ल बरजय । ते पाय गांव सरग सही राहय।आज जाके पता करो सरग कहां बिलागे? 

     गांवेच म उपजन बाढे -पढे लिखे नौकरी पाय शहर -पहर घरे  मनखे आज गांव मं रहे नी सके। उहां के महौल अब पहिली सरीख न इ रहिगय। कोनो तिहार बार मं जाके देखव त मनचलहा बाल संगी मन गांव पहुचौनी के टेक्स मांगथे ... पहिली पिला खवा तब हमर सो गोठियाव ।ऐसे टाइप के अलकरहा महौल बन गय हे।

  चारी चुगरी -गारी गल्ला -इरखा दोष लड़ई -झगरा से घर परिवार गांव गांव हलकान हे । हर  दस बीस गांव के मंझोत म चौकी थाना खुगे बुलाक तहसील  म कोर्ट कचहरी बनगे ये सब जगा पुलिस  मुंसी वकील बाबू मन के तिकड़म चलत हे ।सबझन ल ऐसी पेशी म फसा के अपन रोजी रोजगार चलावत हे।अउ मनखे मंद जुआ के चाहली  फंसे लड ई झगरा कर करम ठठावत हवे।

      गांव मन म पुलिस पटवारी  अउ वकील के बड़ महातम बाढ़ गे अउ मास्टर बैद ग्राम सेवक सियान अउ संत  मन के पुछन्ता न इ रहिगे।  

        अइसे मे जनता के जैसे प्रवृत्ति रही ओकर भासा बोली उही रकम के विकसित होही।

      छत्तीसगढ़ी जनता  अब इही तरीका के ठोली बोली द्वि अर्थी अउ वाले सबद के चलागन बाढगे ।मन अउ आत्मा जुड़ावन बोली अब सुने बर कान तरसथे।

         अभी गुरुपरब के समे क ई  जगह  साहित्यिक आयोजन होईस ।एक जगा नेवताए के अवसर मिलिस .. उहा पहिचान के मिलय त सबो झन पुछय क इसे डा साहब का हालचाल हे? अउ प्रोफेसर साहेब बड मोटागे हस?  बड़ भोगा गे हस .? .देख ऊ न इ देस ? का खाथव जी ? आजकल एफ बी सोसल मीडिया म बड आथव ?  मै उकर प्रस्न सुन अकबका जंव? 

एक जुन्नटहा गीतकार अउ गायक मिलिस ... पैलगी करेंव पुछिस कब आय अनिल बाबु ? बाल बच्चा सब बने हे? कौनो केसेट किताब बनवाय कि नही ? मन परसन्न हो जाथे ।

       कहे के मतलब अब अइसन आत्मीयता नदावत हे व्यक्तित्व विकास अउ सुख सम्मत के गोठ दुरिहावत हे। ये म बड़ गुनान करे जाय कि अइसे गत काबर होय लगिस।

  चारो मुड़ा भौतिक संसाधन के उपलब्धता अउ उन पाय सेती बौरे सेती गलाकाट प्रतिस्पर्धा हर हर मनखे ल प्रतिस्पर्धी बना दय हे।सहर के कालोनी म जोन कृत्रिम सहयोग अउ आत्मीयता के वातावरण देखे बर मिलथे ओ पल भर के होथे।सब हाय हलो तक ही सीमित हे। अउ हमन ओही म मोकाय हन।  थोरिक आधु बढे म  पीठ पाछु आलोचना व प्रतिस्पर्धा मं लगे मनसे म सक सुबहा के सिवा कछु न इये।

       खैर वाचिक या मौखिक परंपरा मं जोन ममहावत शबद अउ भासा रहिस ओकर भले प्रचलन अब रदियावत जात हे काबर मनसे बस्सावत मंद पीके अत्तरमुहां कहरत बोली क इसे उच्चार सकही? एकर बेवस्था हमर सरकार अलगे राज बने से जोरदरहा कर दे हवे।हर चुन ई मं लोगन मं चुलुक लगा दिए जाथे ।तहां ले उन मन फाहर पुतर बोले के लाइसेंस पा जथे।पिए खाए हे कहिके अब तो माइलोगन मन तको सुने के बिबस अउ  अभियस्त हो गे हवे। 

लिखित रुप म छत्तीसगढ़ी ह ब्रिटिश जमाना ले चले आत हे।त कोनो मन कथे कि दंतेसरी मंदिर के सिलालेख जोन १३-१४ सदी के आय ओमा छत्तीसगढी हे। त ये हमर बड़ गौरव के बात हवे।

   महात्मा कबीर के सिस्य धरमदास के पद म छत्तीसगढी देखे बर मिलथे तिहि पाय के उन ल आदि कवि माने जात हे ।फेर ए सब लकर धकर के स्थापना आय। व इसे जबे त पद्मावत म तको छत्तीसगढी के ठेठ सब्द हवे जोन आजकल प्रचलन ले नंदावत हे ज इसे ओरवाती छेना दई सुआ   इत्यादि ।त का जायसी जी ल छत्तीसगढी के  आदिकवि माने जाय? 

घरमदास जी मातृभाषा बघेलखंडी आय जोन ह पेन्ड्रारोड बेलगहना यहां तक रतनपुर के आत ल फ इले हवय ।तेन पाय के हमला उकर पद  शब्द मन छत्तीसगढी लगथे।अउ उन आदि कवि कहे के मन करथे।उन मन बुढत काल इहा आइस अउ कुछेक साल बिता के चलदिन ।ओकर कोनो पद छत्तीसगढी म निये।

  बाहरहाल छत्तीसगढी मं निर्गुण बानी के बिजहा जरुर बो दे गिस आधु  चलके कबीर पंथ अउ सतनाम पंथ के  जोन पंथी  गीत भजन चौका आरती बनिन उन ल छत्तीसगढी आरंभिक साहित्यिक अउ शिष्ट सरुप माने जा सकते। गुरुघासीदास अउ गुरु अम्मरदास के उपदेश  दृष्टान्त बोधकथा पंथी भजन  जेन  म एक विशिष्ट दरसन अउ जीवन पद्धति के लेखा जोखा हवे।येन भी हस्तलिखित अउ मुअखरा  रहीस । शिछा के द्वार तो १८६० के बाद इहा खुलिस अउ लोगन पढे लिखे जानिस। (कुछ पर प्रातिन्क साछर मन राजा रजवाडा मन लिखे पढे बर लानिस उही मन आरंभिक जानकारी इहा के लिखिन ।जेमा रेवाराम खाडेराव दलपत राव ठाकुर जगमोहन आदि हवय फेर एमन छत्तीसगढी म न इ लिखिन। मराठा अउ अंगरेज  मन मालगुजारी अउ लगान वसुली बर बाहिर साछर लोगन ल बसाइस इही मन गांव म रहि के कुछ रचनात्मक प्रवृत्ति वाले मन छत्तीसगढी ल लेखन लानिस  ) छापाखाना आय से १९०० के आसपास छपे लगिस।

जेन म ब इबिल के कथा छत्तीसगढी अनुवाद ये गद्य सरुप म रहिस। 

छत्तीसगढी  बियाकरण म काव्योपधाय हीरालाल चंद्राहू त महाकाव्य अउ साहित्य लिखे म सतनाम दास पं सुखीदास  

सुन्दरलाल सर्मा मुकटधर पांडे लोचन पांडे  मनोहरदास नृसिह हरिठाकुर कुंज बिहारी चौबे नरेन्द्र देव वर्मा   पवन दीवान कपिलनाथ कश्यप गिरिवरदास वैष्णव  श्यामलाल चतुर्वेदी  केयुर भूषण , सखाराम बधेल सुकालदास भतपहरी ज इसे मन धर्म संस्कृति के संगे संग मानवीय प्रवृत्ति के बड़ सुघ्घर चितरन करिन।अउ छत्तीसगढी ल संवारिन साहित्यिक सरुप म ढालिन ।

     तेकर पाछु साञस्कृतिक आंदोलन म चंदैनी गोदा सोनहा बिहान सुकुआ के अंजोर अंजोरी रात जैसे सैकडो संस्थाए उनके गीत कार गायक व संगीतकार ६०-२००० तक ४० साल तक छत्तीसगढी को गीतात्मक स्वरुप में ढाल कर माधुर्य किए उनमे लछ्मण मस्तुरिया रामेश्वर वैष्णव सुशील यदु जीवन यदु राही पवनदीवान मुकुन्द कौशल मंगत रविन्द्र रमेश विश्वहार पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे वि‌नय पाठक शंकुनतला तरार निरुपमा शर्मा डा. सत्यभामा आडिल  सुधा वर्मा डा जे आर सोनी  देवधर महंत  अरुण निगम अनिल भतपहरी जैसे लोगो ने अविस्मरणीय योगदान दिए।और निरन्तर सिरजन म रत हवे।

    अलग छत्तीसगढ के बाद तो हर तरह के लेखन एमा बड़ तेज  गति ले सुरु होइस ।अउ छत्तीसगढी अकादमिक रुप ले पढ़े पढाय के बिसय बनिस । स्कूल कालेज के पाठ्यक्रम आइस ।अउ पीएससी / अन्य  राज स्तरीय प्रतियोगी परीछा म प्रश्न पत्र रखे गिस  ते पाय के  इनमे वृहत्तर लेखन होय लगे  हे। ये सेहरौनिक बात आय। छत्तीसगढी राजभासा आयोग के गठन होय ले साहित्यकार मन ल अनुदान मिले से साधक के रचना छपे लगिस ।बिजहा अउ माई कोठी जैसे योजना आय ले छत्तीसगढी साहित्य पोठाय लगिस। 

नाटक अउ सनीमा तको एक उद्योग कस लमियात हवे अउ कत्कोन कलाकार मन ल अपन परतिभा देखाय के अवसर मिले लगिस।

एखर बाद भी  छत्तीसगढी ह सरकारी कामकाज अउ आफिस म पढे लिखे लोगन म  बने जात के बौरात न इये ये सञसो के बात आय। आजो भी इहा के लोगन एखर सार्वजनिक उपयोग बर  कनउर मरथे ।या सबके आधु म अपढ या गांव के समझी कहिके ठोठकई / झिझक ई चलत हे । इहीच हर बड़ अलकरहा अचरुज  हवय ।हम सबन ल ये भाव ल बदलेच ल लगही।तभेच हम भासा के उपनिवेश अउ बौद्धिक आतंकवाद ल बाच के सम्मुन्नत विकास डहन रेन्गे ल परही।

      हमन ल आस हवे असनेच आयोजन ले अउ जुरियाय लिखंता पढंता गुनवंता मन के उदिम ले हमर भासा आठवी अनुसूची म संधर के अपन महातम के झञडा लहराही। छत्तीसगढ अउ छत्तीसगढी के मान सब डहन बगरही। 

जय छत्तीसगढ़ जय छत्तीसगढ़ी

       जय हिन्द 

डा. अनिल भतपहरी 

ऊंजियार -सदन अमलीडीह 

     रायपुर छग 

९६१७७७७५१४

आरक्षण

"आरछण पर एक विनम्र सार्वजनिक सुझाव "

आरछण से संबंधित एक बात हैं‌ जिसे अक्सर हमलोग जानते हुए प्रयोग नही करते ।
चार केटेगरी विभाजित समाज
को‌ अनु जाति sc अनु जनजाति को st ,अन्य पिछडा वर्ग को obc और सामान्य gen कहते हैं।
यही सामान्य या जनरल वाले बाकी बचे 50% पर अपना एकाधिकार रखे हुए हैं। और एन केन प्रकरेण शेष तीनों वर्गों को यहां आने के लिए रोडे डाले जा रहे हैं।
    जबकि वह ओपन या स्वतंत्र छेत्र हैं। हर भारतीय वहां जाकर अपना प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकता हैं।
    यदि वाकिय में इन तीनो वर्गों के बाद शेष बचे पर आरछण चाहिए तो उनकी जनसंख्या के आधार पर उन्हे ५-६% देकर जिसमे  क्रीमिलेयर रख सकते हैं। शेष  ४५-४४% जगह को स्वंतत्र या ओपन कैटेगरी मे रखे।
    इस तरह अब ५ वर्ग आरछण में हो।ताकि सभी आरछित व स्वतंत्र प्रतिस्पर्धी बन सके।
वर्ग इस तरह से विभाजित हो -
1 अनुसूचित जाति - sc
२ अनुसूचित जनजाति - st
३ अन्य पिछडा वर्ग - other backward class obc
४  शेष अगडा वर्ग other forward class ofc 
५ स्वतंत्र वर्ग opan class 
    अब इनकी संख्या के अनुरुप सभी छेत्रो मे आरछण लागु कर सबको आरछित व स्वतंत्र  वर्ग में सम्मलित करे।
सामान्य या gen. शब्द का विलोपन करे।

              - डा अनिल भतपहरी

Tuesday, April 9, 2019

गुरुघासीदास प्लाजा आमापारा रायपुर

"गुरुघासीदास प्लाजा आमापारा रायपुर "

          सतनामी समाज की धर्मगुरु माता मिनीमाता प्रथम महिला सांसद  के अभिनव प्रयास से उपलब्ध भूमि पर निर्मित (१९९५-९६ ) आमापारा रायपुर जी ई रोड पर भव्य  गुरुघासीदास प्लाजा को  एक पर प्रान्तिक मूल के बिल्डर ने कब्जा करके (लीज अवधि समाप्त होने के बाद भी ) रखे है!सतनामी समाज को सौपने हेतु  सर्व छत्तीसगढी समाज शासन -प्रशासन को अवगत कराने  यदि मिलकर अभियान चलाते  हैं तो यह सामाजिक समरसता का एक नायब उदाहरण होगा।
इस भव्य व्यवसायिक परिसर से प्राप्त आय से छात्रावास नि: शुल्क कोचिन्ग व्यवसायिक रोजगार मूलक पाठ्यक्रम निम्न आय वर्ग के सभी बच्चों के लिए संचालित कर एंव सराय आदि बनाकर गुरुघासीदास बाबा के स्वप्न " तय मंदिर मठ गुरुद्वारा झन बना तोला बनायेच बर  हे त धर्मशाला पाठशाला नियाला बना कुआ तरिया बना दुरगम ल सुगम बना । तब सचमूच में उनकी कथ्य  चरितार्थ होन्गे।वैसे वहा ९ कमरो का २० सीटर मिनी  छात्रावास संचालित हैं।
     ‌‌‌‌ऐसे मे क्या समाजिक समरसता के प्रशंसक और उन्हे संचालित करने वाले लोग ऐसा करने पहल कर करेन्गे? या आगामी चुनाव में सतनामी वोट बैंक को देखते  राष्ट्रीय पार्टी अपनी मेनोफेस्टो में रखेन्गे। क्या सतनामी समाज अपनी करोडो के बेशकीमती धरोहर को सहेजने अपनी राजनैतिक चेतना का सार्थक अनुप्रयोग कर सकेन्गे?
     इन प्रश्नों के सही  समाधान हेतु विद्वत समुह से सार्थक परिचर्चा के आकांछी है।
          -डा अनिल भतपहरी