Sunday, June 28, 2026

शउर ( ग़ज़ल)

शउर तक नहीं जिन्हें प्याली उठाने के 
कैसे कैसे लोग चले आते हैं मयखाने में 

खा रहे बेतरतीब पर वे क्यों अघाते नहीं 
कोई नायाब नुस्खा मददगार हैं पचाने में 

मत जाओं वहां न कद्र और शोर हैं बहुत 
चुप अजनबी सा मौज किसी के जनाज़े में 

हर बार हसरतें जग उठती हैं बारिश में 
पर क्या बेबसी जमीं की बंजर है उगाने में 

शलिकादारो से न करो उम्मीद कुछ होगा नहीं 
चले बेशउर तलाशे अब नई मज़ा अफ़साने में

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