Tuesday, February 24, 2026

सतनाम की त्रिचरण संगत पंगत अंगत

सतनाम धर्म के त्रिचरण: संगत पंगत अंगत 

सतनाम पंथ भारत वर्ष में एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय है। छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास ने इसे व्यवस्थित स्वरुप देकर  17वीं शताब्दी में प्रवर्तन किया इसके मुख्य तीन चरण इस प्रकार हैं: 

संगत 

- संस्थापक: सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास बाबा जी हैं, जो छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में पैदा हुए थे. और सोनाखान जंगल के मध्य छाता पहाड़ में 6 माह तक कठोर साधना करके  "सतनाम के सप्त सिद्धांत" का प्रतिपादन फागुन शुक्ल  सप्तमी को गिरौदपुरी में अपने प्रिय स्थल औरा धौरा तेंदू पेड़ के समक्ष समतल मैदान में एकत्र हजारों लोगों की उपस्थिति में किया। उन्होंने सतनाम के प्रमुख सप्त सिद्धांत एवं वाणी को जनमानस श्रद्धापूर्वक श्रवण किए यह प्रथम संगत था। फिर रामत रावटी करते संगत करते रहें।
 इस तरह उन्होंने धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध सतत सतनाम जागरण चलाए। उनमें मुख्यत: जातिगत भेदभाव के खिलाफ: गुरु घासीदास ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। वे "मनखे मनखे एक "कह अनेक जीवनोपयोगी उपदेश दिए। वे अपने सिद्धांत और उपदेश को जनजीवन को श्रवण की आजीवन रामत रावटी किए यह प्रथम चरण संगत का था। 

      पंगत 
     रामत रावटी में उपस्थित जनसमूह को  अलग अलग जातिय समूह थे और उनके रहन सहन खान पान में विविधताएं थी फलस्वरूप कभी संग साथ भोजन नहीं करते उन्हें सामूहिक रुप से एक ही पात्र में पके सात्विक भोजन प्रसाद को एक ही पात्र बड़ा थाल या गंज में परोस कर   तेलसीपुरी महासंगम स्थल में जहां अनेक जातियों के लोग स्वेच्छा पूर्वक सतनाम धर्म को अंगीकृत किया उन्हें खिलाएं गए।उसे पान प्रसाद कहते हैं। यह पान प्रसाद खिलाना ही सतनाम संस्कृति में पंगत हैं। जब सब संग साथ में ,संगत में कही गई बातें सुन समझ लिए और सब संग साथ में पंगत में परोसे गए पान प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दूसरा चरण पंगत के नाम से प्रसिद्ध हैं।
   श्रद्धालु आज भी गुरुद्वारा में जाकर मनौति मांगते हैं कि " हे सत्पुरुष साहेब तोर असीस ले मोरो घर शुभ  कारज होय चार संत मोर अंगना म पंगत करय मय अपन हाथ म पतरी उचावव।" 

अंगत 
    इस तरह सतनाम पंथ में 65-70 जातियों का समागम हैं जो कि गुरुघासीदास के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनी मूल जाति और मान्यताओं को छोड़कर सतनाम को अंगीकृत कर लिया हैं। ऐसा करना ही सतनाम संस्कृति में अंगत प्रथा हैं। अनेक जाति के लोग प्रेम विवाह इत्यादि के कारण बहिष्कृत हो जाने पर यहां आकर शरण लेते हैं। गुरुगोसाई चार संत की उपस्थिति में उन्हें सतनाम धर्म में मिला लेते हैं।
एक प्राचीन मंगल भजन इसी प्रक्रिया हेतु सृजित हैं -
बीच गंगा बहत हे मँझधारा हो मिले बर होही संतो मिल जहु न ...
समानता बराबरी और प्रेम सौहार्द भाव के कारण निरंतर सतनाम धर्म में अन्य धर्म जाति के लोगों को सहजता से आत्मसात या समागम करने की विधि विधान हैं। यह सतनाम धर्म का तीसरा चरण हैं।

- जैतखाम: 
सतनामी समाज में जैतखाम की मान्यता बहुत होती है, जो सतनामी पंथ के ध्वज का नाम है। इसे एक चबूतरे या प्रमुख स्थल पर खंभे में सफेद झंडा लगाकर पूजा जाता है.
- जीवनशैली:
 गुरु घासीदास ने अपने अनुयायियों को मांस खाने, शराब पीने, धूम्रपान करने या तंबाकू चबाने से दूर रहने को कहा। उन्होंने मिट्टी के बर्तनों के बजाय पीतल के बर्तनों का उपयोग करते हैं।
- संगठनात्मक संरचना: 
गुरु घासीदास ने गुरुओं की एक वंशावली निर्धारित की जो उनके बाद संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे। एक दो-स्तरीय संगठनात्मक संरचना विकसित हुई जिसमें गुरु सबसे ऊपर थे और उनके नीचे कई ग्राम-स्तरीय महंत साटीदार भंडारी पदाधिकारी हैं।
- वर्तमान स्थिति: 
सतनामी अब एक तेजी से मुखर राजनीतिक ताकत बन गए हैं और छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जाति आबादी पर उनका प्रभाव है। अपनी पुरुषार्थ से अनेक विकास के आयाम स्पर्श कर विविध क्षेत्रों में अवसर मिलने से देश दुनियां में सम्मानित होते आ रहें हैं।

सतनाम धर्म के अनुयायी को सतनामी कहें जाते हैं जिनकी अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक क्रियाएं हैं। यह समाज अपनी विशिष्ट सात्विक जीवन शैली और आदर्शों के लिए जाने जाते हैं। 

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

फागुन शुक्ल सप्तमी , मंगलवार तदानुसार दि 23-2-2026 

नारायणपुर छत्तीसगढ़ प्रातः 7.25

Monday, February 23, 2026

सतबोधिया गुरु घासीदास जिसके सतनाम सिद्धांत की विशेषता "सत्य सनातन " हैं।

सतबोधिया गुरु,सेत गुरु , सतगुरु 
 
         उक्त विशेषण घासीदास नाम के सम्मुख प्राचीन समय से चला आ रहा था। अनेक पंथी , मंगल भजनों में भी यह प्रचलित हैं। बोधि , बोधियां शब्द बौद्ध धम्म और पाली साहित्य के प्रभाव से आया हैं।सत्रहवीं सदी तक व्यापक रुप में यहां बौद्ध धम्म प्रचलित था। अनेक सिद्ध नाथ जोगी जती समाज में थे। उनका सबका उपस्थिति और प्रभाव समकालीन समाज में रहा हैं। फलस्वरूप समाज में समरसता रही और रोटी बेटी भी ग्रामों या समीप में होते रहें हैं। जातपात का ऐसा विकराल स्वरुप अपेक्षाकृत कम ही थे। दक्षिण कौशल में राजभाषा पाली एवं ब्राह्मी लिपि का प्रचलन था। जिसका साक्ष्य यहां के शिलालेखो/ ताम्रपत्रों में संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ी भी पाली प्राकृत का ही स्वरुप हैं।
     छत्तीसगढ़ में इसी समय मराठा अंग्रेजी कालखंड में उत्तर भारतियों का आगमन और पौराणिक कथा कहानियों का वृहत्तर  प्रचार प्रसार राजकीय संरक्षण आदि से पूर्व प्रचलित संस्कृति में अभूतपूर्व बदलाव आया। मैदानी क्षेत्रों में जातियां लामबंद हुई परस्पर भेदभाव और फिरकापरस्ती बढ़ी। 
   आजकल बस्तर बीहड़ जंगलों के सुदूर ग्रामों में जो पहले एक था कोई भेदभाव नहीं था वहां भी इन पर प्रांतिको के हस्तक्षेप से सामाजिक वैमनस्य और सांप्रदायिक उन्माद देखें जा रहे हैं।
   मैदानी क्षेत्र में बढ़ते जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध समाज सुधार के लिए गुरु घासीदास का अभ्युदय हुआ। उनकी सतनाम सिद्धांत और दिव्योक्ति" मनखे मनखे एक की अनुगूंज सर्वत्र होने लगी।"अनेक जातियां सतनाम पंथ में सम्मिलित होकर जात पात वर्ण भेद के कुचक्र से मुक्त होने लगे।
   हालांकि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने अनेक षड्यंत्र हुए पर सत्य को कोई रोक नहीं सकते उनकी अपनी प्रभा हैं जो स्वयं प्रसारित और प्रकाशित होते ही हैं।

     नब्बे के दशक में  सिरपुर के आसपास 5-7 ग्रामों में बसे हम प्राचीन सहजयानी लोग जिनके पूर्वज सतनामी हो गए थे वे बुद्ध पूर्णिमा को आनंद प्रभु बुद्ध विहार प्रांगण में मेला लगाने एवं बुद्ध वंदना के लिए प्रयास किए। 
बाद में महासमुंद रायपुर बौद्ध समाज से सामंजस्य बिठाकर भंते आर्य नागार्गुन सुरई ससई गुरु दयावंत ,सरदार दिलीप सिंग होरा की आतिथ्य और हजारों सतनामी बौद्ध जनों की उपस्थिति में"बोधिसत्व गुरुघासीदास" कहें गए । 
   कालांतर में यह भावपूर्ण संबोधन प्रबुद्ध समुदाय में श्रद्धापूर्वक कहे जा रहें हैं। बुद्ध ने भंते संघ को उपदेशना देते त्रिशरण पंचशील अष्टमार्ग तय किए और उन्हें घोषित किया कि "येतो धम्मो सनंतनो" यह सिद्धांत ओर सूत्र मन वचन कर्म में धारनीय हैं। उन्हीं के अनुरुप गुरु घासीदास का  सप्त सिद्धांत, अमृतवाणी उपदेशना आदि सतनाम पंथ की शाश्वत सत्य विशेषता हैं जो कि अपरिवर्तनीय एवं नित नवीन  हैं। यह विशेषता सत्य सनातन हैं अर्थात सतनाम ही सनातन हैं।
         वर्तमान में सतनाम पंथ अपनी प्राचीन स्वरुप को जानने समझने और आत्मसात करने की ओर अग्रसर हैं। ताकि भारतीय समाज में जन्मना जातियां वर्ण आदि खत्म हो और बुद्ध कालीन समृद्धशाली समाज वैश्विक  मार्गदर्शक ( गुरु) होने की ओर सच में अग्रसर हो सके। केवल ख्याली पुलाव बनाते भ्रमित न रहें।

    भवतु सब्ब मंगलम 

       जय सतनाम नमो बुद्धाय

Saturday, February 21, 2026

महतारी भाषा दिवस

छत्तीसगढ़ी म  राजकाज,पढ़ई ,लिखई।
एकर बर जनांदोलन जरुरी हे मोर भई।।
भुला झन किन्दर हाट बाजार मेला मड़ई।
महतारी भाषा दिवस के हवे बिक्कट बधई।।

      -डॉ अनिल भतपहरी/9617777514

Friday, February 6, 2026

पृथक छत्तीसगढ़

पृथक छत्तीसगढ़ के लिए किए गए हर प्रयास जैसे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के मंत्री नकुल ढीढी एवं उनके सहयोगियों का 11 दिवसीय जेल यात्रा , डॉ खूबचंद बघेल का भातृसंघ गठन कर जनांदोलन करना, शंकर गुहा नियोगी/हरि ठाकुर का छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा,छत्तीसगढ़ समाज पार्टी का अखंड धरना, अजीत जोगी जी का पदयात्रा एवं छत्तीसगढ़ी सेवक में यहां के साहित्यकारों का अलख जगाना सौभाग्य वश इनमें मुझे भी छात्र जीवन में सहभागिता करने का अवसर मिला हैं।
अब राज्य के रजत काल में सम्यक मूल्यांकन का अवसर हैं कि किसके लिए और किसलिए राज्य बना ? क्या वह चरितार्थ हो रहे हैं कि समकालीन समय में हमारे पुरखों ने जो स्वपन देखें वह कहीं बिखर तो नहीं रहें हैं? देश की फेफड़ा कहे जाने वाले हसदेव और देश दुनिया से अछूते  अबूझमाड़, गढ़ बंगाल,रम्य  इंद्रावती की कछार एशिया का बेहतरीन ऑक्शीजोन कांगेर घाटी उजड़ रहे हैं। यहां के मूल वाशिंदे नक्सली और पुलिस के मुठभेड़ के शिकार हो रहें हैं। आउट सोर्सिंग से बेरोजगारी और उद्योग व्यापारिक जगत में पर प्रांतिकों का एकाधिकार वनांचल खासकर बस्तर में नक्सल मूवमेंट फिर सलवा जुडूम या शांति व्यवस्था के चलते विस्थापित हो छोटे बड़े शहरों में दर दर भटक रहे भोले भाले जनमानस कुली कबाड़ी कर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। औद्योगिक विकास के कारण रेगिस्तान और बंजर हो चुके राज्यों को संवारने ,उन्हें रॉ मटेरियल देने क्या शस्य श्यामला छत्तीसगढ़ उजड़ने विवश और बेबस हैं? राष्ट्रीयता के नाम पर छलते जा रहे छत्तीसगढ़िया।
  आज नवभारत के लोकप्रिय छायाकार भाई गोकुल सोनी जी यह छायाचित्र और लघु आलेख देख पढ़ कर वह मंजर स्मृत हुआ जिसका हम जैसे लोग बचपन और अध्ययन काल से साक्ष्य व सहभागी रहें हैं।

   डॉ. अनिल भतपहरी/ 9617777514