Monday, December 29, 2025

सरकार

जीताएन तब ले भैरा हो गईन 
साहेब ल हमर गोठ नइ भाईन 
बिन भाषा के मूक हो गईन 
बटन चपक का चूक हो गईन 


करय तो अब भल का करय 
ले मांदर मंजीरा भजन करय 
बिगड़े हे इहलोक हमरे अब 
परलोक सुधारे जतन करय 

तउन खातिर आए सरग़ दूत 
दरस परस बर भारी जटाजूट 
जे भीखास के उवे नवा सुरुज 
चका चौंधा देख भारी अचरूज 

धरमे करमे बर बनाएं उन ल 
वोट दे के तय कमाएं पुन ल 
कटय जंगल के खीरय धरती 
चाहे परिया परे रहय तोर खेती 

बनगे मंदिर सज के दरबार 
फेर उजरे लगिन खेती खार 
न कहूं रोजी न कछु रोजगार
कोंदा भैरा अंधरा सरकार ...

नवा रायपुर में संपूर्ण छत्तीसगढ़ का स्मारक हो


रजत उत्सव के अवसर पर 

पुरखौती मुक्तांगन में मध्य छत्तीसगढ़  

  छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से 25 किमी दूर नवा रायपुर बसाया गया हैं जो सतनामी बाहुल्य 27 ग्रामों को हस्तगत किया गया हैं। यह परिक्षेत्र आरंग विधान सभा के अधीन हैं। मंत्रालय, संचालनालय, विधानसभा ,राजभवन मुख्यमंत्री, एवं मंत्रियों के निवास हैं। साथ ही अधिकारी कर्मचारी सहित आम लोगों के बसाहट हेतु 33  सेक्टरों में विभक्त हैं। वर्तमान में करीब 5 लाख लोगों की बसाहट की क्षमता से युक्त नवा रायपुर में बस, रेल, स्वास्थ सुविधा हेतु हॉस्पिटल, स्कूल कॉलेज हैं। साथ ही अनेक धार्मिक, प्राकृतिक  एवं सांस्कृतिक दर्शनीय स्थल विकसित किए जा रहे हैं। ताकि लोगों को आध्यात्मिक / धार्मिक आवश्यकताओं के पूर्ति के साथ साथ स्वस्थ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन हो सकें।
इनमें प्रमुखत: पुरखौती मुक्तांगन, जंगल सफारी, आदिवासी संग्रहालय, मॉल सिनेमागृह और फिल्मसिटी बनाए जाएंगे।
परन्तु छत्तीसगढ़ के मध्य भाग की सांस्कृतिक गतिविधियों और जनजीवन को संरक्षित करने का कोई खास संग्रहालय आदि के बारे में पता नहीं क्यों चर्चाएं नहीं होती। जबकि छत्तीसगढ़ की वैभव रायपुर दुर्ग राजनांदगांव मुंगेली कवर्धा , बिलासपुर, जांजगीर,बलौदाबाजार ,महासमुंद धमतरी जिलों में निवासरत करोड़ों लोगों की रहन सहन,सांस्कृतिक गतिविधियों, मेले,व्रत ,उत्सव आदि की जानकारी के लिए  स्मारक या संस्थान होनी चाहिए। इसकी कमी खलती हैं।
   बाहर से आए शैलानी एवं अन्वेषकों अध्येताओं को छत्तीसगढ़ का वास्तविक बोध नहीं हो पाता।

    छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से तीन भागों में विभक्त हैं। उत्तर में सरगुजा का पाट, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार । पूर्व में महानदी का पावन प्रवाह वाली लारियांचल तो पश्चिम में डोंगरगढ़ भोरमदेव सतपुड़ा मैकल श्रेणी में अवस्थित चिल्फी घाटी की हसीन वादियां हैं ।इन  जगहों की भाषा कला संस्कृति भी अलग हैं। प्रदेश की इन जगहों की विशेषताओं और महत्ता को बताने हेतु पुरखौती मुक्तांगन की परिकल्पना की गई ताकि प्रदेश की प्राचीन धरोहरों और जीवन स्तर लोक मान्यताओं को पर्यटन करते एक ही जगह उपस्थित होकर कुछ घंटों में  आधारभूत ढंग से सामान्य (मोटे )तौर पर समझा जा सके।
   यहां सरगुजा ,बस्तर प्रखंड तो हैं जहां परन्तु मध्य छत्तीसगढ़ नहीं। इस कारण यहां की सांस्कृतिक वैभव में अनेक कमियां नज़र आती हैं। बाह्य पर्यटकों को लगता हैं छत्तीसगढ़ आदिम जनजीवन और संस्कृति के ही संवाहक अत्यंत पिछड़ा  वनांचल राज्य हैं। जहां स्त्री पुरुष अर्ध विवृत जीवन जीने विवश और केवल नाच- गाने में मंद मऊहा सल्फी ताड़ी हड़िया कोसना में उन्मत लोग हैं।  मंचीय प्रस्तुतियों में भी लोक संस्कृति के नाम पर यहीं भाव प्रदर्शित होते हैं।
   जबकि मध्य छत्तीसगढ़ की गौरव शाली एवं सौंदर्यबोधक वस्त्राभूषण, साबुत अनाज (बिना सड़े गले खमीर आदि उठाएं) की खान पान ,रहन सहन किसी भी राज्य से कमतर नहीं। यहां की भाषा और उनमें उपलब्ध साहित्य दर्शन उत्कृष्ट हैं। लोक कलाएं विविधतापूर्ण और समृद्ध हैं। किसी राज्य की एक दो या पांच लोक नृत्य होंगे पर यहां स्त्री पुरुषों की पृथक और युगल दर्जनों नृत्य  शैलियां  है जिसमें पंथी,राउत,कर्मा, सुआ,शैला, रीलों,बार, सरहुल, ककसार ,डंडा, मांदरी, हरे राम हरे कृष्णा, रमसत्ता, रहस,  छैला नाच, देवार नृत्य जैसी विशिष्ट शैलियां हैं। शास्त्रीय नृत्य में रायगढ़ घराना और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय तो लोक और शास्त्रीय संगीत विविध ललित कलाओं की  साधना स्थली हैं जहां देश विदेश से कलावंत आते और सीख समझ कर जाते हैं।
     अनेक पर्व उत्सव मेले मड़ाई हाट बाजार पसरा हैं ।और जनजीवन तो अन्य जगहों के अपेक्षा  थोड़े में संतुष्ट संत संस्कृति के संवाहक हैं। जिनमें प्राचीन सहज यान महायान नाथ सिद्ध  शैव शाक्त वैष्णव बौद्ध जैन संस्कृति की समन्वय स्थली हैं जहां आर्य अनार्य संस्कृति का समागम होते हैं। दक्षिणा पथ के नाम से विख्यात सद्वाहों सतवहनो की धरती में अनेक ख्यातिनाम भट्ट प्रहरी हुए हैं। जिसमें सम्राट विजयस जिसके समय में बुद्ध का आगमन राजधानी सिरपुर में हुआ। वहीं नागार्जुन आनंद प्रभु, जैसे आचार्य हुए। वल्लभाचार्य,कबीर धर्मदास गुरुघासीदास, अमरदास ,विवेकानंद महेश योगी , संत गहिरा गुरु , ओशो ,स्वामी आत्मानंद , पवन दीवान  जैसे संत को जन्म और आकार देने वाली शस्य श्यामला धरती हैं ।इसलिए इसे उत्तराखंड  हिमाचल को जैसे देवभूमि कहते हैं ठीक यह संतो की धरती छत्तीसगढ़ को " संतभूमि"  कहते हैं। 
   सिरपुर राजिम, शिवरीनारायण गिरौदपुरी दामाखेड़ा तुम्मान, ताला,मल्हार चैतुरगढ़, डमरू खरचा, आरंग रीवा, खल्लारी, चंद्रपुर, डोंगरगढ़ भोरमदेव  रतनपुर दल्हा, जलेश्वर,  जैसे ऐतिहासिक धार्मिक नगरी आस्था के केंद्र हैं। छत्तीसगढ़ में तीन साक्षात् त्रिवेणी संगम राजिम , पंजनी पैसर और शिवरीनारायण हैं जहां कल्प कुंभ किए जा सकते हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। कोरबा भिलाई, चिरमिरी ,नगरनार, तमनार जैसे औद्योगिक तीर्थ नगरी और गंगरेल हसदेव जैसे विशालकाय बांध सागर जैसे दर्शनीय हैं।रायपुर बिलासपुर दुर्ग राजनांदगांव जगदलपुर  अंबिकापुर जैसे प्रशासनिक संवैधानिक और सांस्कृतिक नगर देश के अन्य नगरों से सदृश्य हैं।
     इनके संरक्षक बलिदानी राजाओं में कल्याण साय,गुरु बालकदास, गेंद सिंह, वीर नारायण सिंह,  गुण्डाधुर मूंदरा मांझी प्रवीण चंद्र भंजदेव जैसे रत्न हैं। 
  गौरक्षा आंदोलन 1915 के प्रणेता राजमहंत नयन दास महिलांग गुरु गोसाई अगमदास जंगल सत्याग्रह के नायकों में बूढ़ान शाह रामचरण दयावती कंवर , तो नहर सत्याग्रह में नारायण मेघवाले, छोटेलाल सामाजिक क्रांति और मंदिर प्रवेश के लिए प सुंदरलाल शर्मा, पंमिलऊ दास कोसरिया, प. तुलम तुलाई लोगों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि बनी। जिसमें मिनीमाता राधाबाई दयावती कंवर राजमोहिनी देवी जैसी मातृ शक्तियां भी बढ़ चढ़ हिस्सा ली और समाज / देश सेवा  के लिए स्वयं को समर्पित की 
   कला जगत में  मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर ,दानी दरवन, चम्पा बरसन हबीब तनवीर, शेख हुसैन, देवा दास बंजारे, सुकालदास भतपहरी, मेहतर साहू,  गंगाराम शिवारे नारायण वर्मा  झाडूराम देवागन,  सहित पंडवानी की पुरखिन दाई सुखबती, लक्ष्मी बंजारे तीजन बाई सुरुजबाई फ़िदाबाई, मालाबाई जैसी मौलिक सितारा कलाकार हैं। जिसकी अनुशरण कर लोग प्रसिद्धि की शिखर स्पर्श करते आ रहे हैं।
साहित्यकारों में  ठाकुर जगमोहन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पद्म श्री मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद, मुक्तिबोध,मनोहरदास नृसिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी, हरि ठाकुर , प्रमोद वर्मा केयूर भूषण मदनलाल गुप्त प सुकुल दास घृतलहरे, शाखा प्रसाद बघेल, शानी ,सुकाल दास भतपहरी , लक्ष्मण मस्तूरिया,  सुशील यदु श्यामलाल चतुर्वेदी लाल जगदलपुरी,हरिहर वैष्णव,इत्यादि अनेक साधक हैं। इन सबकी की यादें, मध्य छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण  ऐतिहासिक घटनाओं  और जीवन स्तर की झलकियां भी उक्त ओपन म्यूजियम / खुला संग्रहालय  "पुरखौती मुक्तांगन" में होना चाहिए। ताकि लोगों को छत्तीसगढ़ की विविधता और एक साथ आदिम जीवन और आधुनिक जीवन शैली का साक्षात्कार हो सके। प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसार एक  साथ 10 वी और 21 के जीवन शैली को देखना हो तो और उन्हीं के तकिया कलाम अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती छत्तीसगढ़ में स्वागत हैं।
    राज्य के पच्चीसवें वर्ष में रजत जयंती के पावन अवसर में राज्य की सर्वाधिक बसाहट वाले मध्य क्षेत्र की  सांस्कृतिक तत्व की जाने- अनजाने में अनदेखी न हो और देश के नागरिकों को राज्य की तीनों प्रखंडों की सांस्कृतिक वैभव का झलक पुरखौती मुक्तांगन प्रांगण में सहज दर्शनीय हो इनकी व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि अनेक विरोधाभासों का सम्यक समाधान तलाशा जा सकें। सुखी और समृद्ध छत्तीसगढ़ गढ़ा जा सकें।

      जय छत्तीसगढ़ 

डॉ. अनिल कुमार भतपहरी/ 9617777514

सेंट जोसेफ टाऊन अमलीडीह रायपुर छत्तीसगढ़ 

Wednesday, December 17, 2025

सतनाम शोभायात्रा

गुरु घासीदास जयंती पूर्व सतनाम शोभायात्रा की बाहर 

समाज में समानता एवं सौहार्द्र स्थापित करने सद्गुरु घासीदास बाबा जी की अमृतवाणियों /उपदेशों पर आधारित सार्वजनिक रुप से राजधानी रायपुर में 1995 से आरम्भ यह आयोजन देश के अनेक जगहों पर हर्षोल्लास पूर्वक आयोजित होने लगे हैं। आयोजको एवं सहभागियों के प्रति आभार एवं मानव समाज को हार्दिक बधाई।

   ज्ञात हो कि गुरु घासीदास जयंती की शुरुआत में ही धर्म ध्वज "पालो " जिसे संत /महंत/ भंडारी के घर तैयार करते हैं को परघा कर पंथी अखाड़ा सजाते हर्षोल्लास पूर्वक  जैतखाम तक शोभायात्रा करते आते हैं।उसी परंपरा को अब सार्वजनिक रुप से बड़े पैमाने पर मनाने की शुरुआत 1995 से हुई।

चित्र १आयोजन की परिकल्पना के समय का छायाचित्र गुरु घासीदास छात्रावास आमापरा रायपुर 
२ प्रथम आयोजन का विज्ञापन गुरु घासीदास का रेखाचित्र ( मेरे द्वारा रेखांकन)