#anilbhattcg
उनका धर्म राजनीति हैं
जन्म जंगल में
कर्म जंगल में
पुरखों की तह
मिलेंगे जंगल में
काट कर भरुहा
बसाएं गांव बस्ती
आबाद रहें हरदम
नृत्य गान मस्ती
पर किसने कराया
भेद अपना पराया
वर्ण जात पात खेल
छल छद्म पेल ढकेल
छोड़ गांव बसे नगर
चालक धूर्त नट नागर
कहे ग्रामीण देहाती
हमारे उद्यम उत्पाद
हेर फेर कर बने उस्ताद
संचय कर धन आपार
राज सत्ता का कारोबार
जनसेवा हुआ व्यापार
बढ़ते रहे सदैव करारोपण
अब न होगा प्रकृति संरक्षण
बचाकर जंगल करेंगे क्या
ये जंगली अभाव से मरेंगे क्या
करना हैं विकास उजड़ेंगे जंगल
तभी तो होगा वहां नित्य मंगल
सीधे साधे भोले भाले
प्रकृति पुत्र जंगल रखवाले
टंगीये के बेठ बनकर
बनते उजाड़ने वाले
पर चलाने वाले कौन
परस्पर लड़ाने वाले कौन
बहुरूपिया बहुत पहुंचे हुए
मीठी बानी शहद से पागे हुए
हर तरफ वाग्जाल फैलाएं हुए
अरे वनवासी धरती आबा
भुइयां के भगवान तय किसान
गुड़ी कुटी मंदिर, तेरा ही काशी काबा
फूल कर कुप्पा गर्व से अज्ञानी
अरे अवघट अरे महादानी
पड़े रहो शव सा बिन शक्ति के
बिखरे हुए कलयुगे बिन संघ शक्ति के
डूबे रहों तुम मदिरा सी धर्म भक्ति हैं
भ्रम में रहो तुम कि इसी में मुक्ति हैं.
पता हैं उन्हें उनका धर्म ही राजनीति हैं
तुम भ्रम में रहो क्या धर्म रीति नीति हैं
-डॉ.अनिल भतपहरी/9617777514